Opinion

कर्ज लेकर विदेश भागे कारोबारियों में ऐसी क्या खास बात है जो रिजर्व बैंक इतनी नरमी दिखा रहा है

FAISAL ANURAG

दो बडी खबरें नजरअंदाज कर दी गयीं. दरअसल यह न्यू नार्मल का दौर है जहां मीडिया प्रहरी के बजाय प्रचारक की भी भूमिका का रूप धारण कर चुका है. यह बदलाव लोगों के सूचना पाने के लारेकतांत्रिक अधिकार का हनन तो है ही एक स्वतंत्र व निष्पक्ष सूचनादाता के दौर के कमजोर हो जाने का संकेत भी है. पहली खबर उस कर्ज की माफी यानी बट्टा खाता (right off) की है जिसे रिजर्व बैंक ने अंजाम दिया है. जिन लोगों के नाम इस सूची में हैं उसमें मेहुल चौकसी भी हे.

ये वही मेहुल चौकसी हैं जो प्रधानमंत्री मोदी के साथ फ्रंट रो में बैठते रहे हैं और जिन्हें नरेंद्र मोदी मेहुल भाई कह कर संबोधित करते रहे हैं. हीरों का इस बदनाम व्यापारी के कारण भारत की बैंकिंग व्यवस्था की न केवल साख प्रभावित हुई है बल्कि भरात की अर्थव्यवस्था पटरी से भी उतरी है. केंद्र सरकार कहती रही है कि कर्ज ले कर विदेश भागे सभी लोगों को कानून के तहत सजा दिलायी जाएगी. विदेशों में चैन आराम फरमा रहे चौकसी के कर्ज माफ कर दिये गये.

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यह कोई सामान्य बात नहीं है. कोरोना वायरस के कारण अर्थव्यवस्था के संकट पर चिंता प्रकट की जाती रही है. हालांकि प्रधानमंत्री भारत की अर्थव्यवस्था को ले कर किसी भी तरह की चिंता नहीं करने की बात करते रहे है. पहले से ही जीडीपी के दर में गिरावट दर्ज की जाती रही है. अब अुनमान में बताया जा रहा है कि भारत की जीडीपी 1.2 प्रतिशत रह सकती है. जबकि कुछ जानकार तो अब यह भी कहने लगे हैं कि भारत की विकास दर निगेटिव में भी जा सकती है.

ऐसे समय में इस तरह की कर्ज माफी का आधार और औचित्य क्या है. यह बताने में रिजर्व बैंक स्पष्ट नहीं दिख रहा है. भारत के आर्थिक संकट को तो पहले से ही रिजर्व बैंक के रिजर्व खाते से सरकार को धन दिए जाने के कारण कई तरह की चिंताएं प्रकट की गयी हैं. सवाल उठता है कि आखिर कर्ज ले कर विदेश भाग गए व्यपारियों में ऐसी क्या खास बात है कि कि उन्हें दंडित करने के बजाय कर्ज माफी दे कर पुरस्कृत किया जा रहा है.

मीडिया इस सवाल को पूछने से बाज आ रहा है. इसके गहरे अर्थ को भी समझे जाने की जरूरत है.

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भारत के किसान तो लंबे समय से कर्ज माफी की मांग करते रहे हें. किसानी की हालत लगातार खराब होती रही है और इस कारण उत्पादकता भी प्रभावित हुई है. लेकिन 2008 के बाद से किसी भी सरकार ने किसानों के दर्द को नहीं समझा है. 2008 में डा मनमोहन सिंह की सरकेार ने किसानों के कर्ज को माफ किया था. इससे माहराष्ट्र सहित कई राज्यों के किसानों को पटरी पर आने का मौका मिला था.

यह वहीं दौर था जब किसान बड़ी संख्या में  आत्महत्या कर रहे थे. पिछले पांच सालों में ही हजारों किसानो ने आत्महत्या की है. लेकिन किसी को भी उनके दर्द का एहसास नहीं है. सरकार ने हर तीन माह पर दो हजार की राहत किसानों को जरूर दी है. लेकिन उस भुगतना के भी अपने संकट देखने को मिले हैं. इस बीच मध्यप्रदेश की सरकार ने कर्ज माफी का एक छोटा कदम जरूर उठाया. लेकिन उसे भी पूरी तरह अमल में नहीं लाया जा सकता. पिछले पांच सालों में ही किसानों के कई बड़े  आंदोलन हुए लेकिन उनके कर्ज को माफ करने की दिशा में कदम नहीं उठाया गया.

सवाल यह है कि  सरकार और उसकी एजेंसियों के रुख उन लागों के प्रति नरम क्यों हैं. जिन्होंने बैंको को कंगाल बनाने का प्रयास किया है. एक आम आदमी तक पर इसका असर है. और यह साफ है कि भारत के अनेक बैंक एनपीए की वजह से संकट में हैं.

दूसरी खबर है कि  में धार्मिक स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाली अमरीकी संस्था यूएस कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ़्रीडम (USCIRF)  ने साल 2020 के लिए अपनी सालाना रिपोर्ट जारी की है. कहा है कि भारत में अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न बढ़ा है. भारत को उन 14 देशों के साथ रखने का सुझाव दिया गया है जो धार्मिक स्वतंत्रता के नजरिए से बदनाम हैं.

कोरोना वायरस के बढते प्रभाव के बीच यह खबर भारत के लिए उस हालात में परेशानी का सबब है जब मध्यपूर्व के देशों ने खुल कर  इसी आशय की बात कही है. बीबीसी ने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किए गए ट्वीट में लिखा है, “साल 2004 के बाद ये पहली बार है जब USCIRF ने भारत को ‘कुछ ख़ास चिंताओं’ वाले देशों की सूची में शामिल करने का सुझाव दिया है.”

USCIRF की उपाध्यक्ष नेन्डिन माएज़ा ने कहा, “भारत के नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी से लाखों भारतीय मुसलमानों को हिरासत में लिए जाने, डिपोर्ट किए जाने और स्टेटलेस हो जाने का ख़तरा है.” इस खबर को भी मीडिया ने नजर अंदाज किया है. या वो स्पेस नहीं दिया, जिसकी जरूरत थी.

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