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#CAA के बाद हिंसा: गृहमंत्री के रूप में अमित शाह की दूसरी बड़ी विफलता है यह

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Surjit Singh

Citizen Amendment Bill 2019 लोकसभा में पेश होने के बाद से देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं. देश के अधिकांश राज्यों में इस बिल का हिंसक विरोध हो रहा है. अब तक हुई हिंसा में 15 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

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तो क्या गृह मंत्रालय ने इस बिल को लाने से पहले इससे उत्पन्न होने वाली स्थितियों के बारे में सही आकलन नहीं किया. अगर किया भी गया तो उस लायक सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की गई. ना ही देश की राजधानी दिल्ली में और ना ही पूर्वोत्तर समेत देश के दूसरे राज्यों में.

राज्यों में हालात सामान्य नहीं है. विरोध-प्रदर्शन रुक नहीं रहे हैं. तो क्या सरकार ने इस बिल के लाने के पहले इस बारे में आकलन नहीं किया था. अगर किया था तो क्या जानबूझ कर देश व राज्य को हिंसक विरोध में झोंकने का काम किया गया.

भलें ही भाजपा समर्थक और आरएसएस इस बिल के लाने से खुश हों. पर अगर विरोध और तेज होता है, तो हालात उनके लिये भी बेहतर नहीं होंगे. बात चाहे जो भी हो, घटनाक्रम जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, उससे यह लगने लगा है कि हड़बड़ी में इस बिल को लाना और उसे पास करा लेना, फिर विरोध व हिंसा को सही तरीके से काबू नहीं कर पाना गृह मंत्री के रूप में अमित शाह की दूसरी विफलता है.

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ऐसा देखा जा रहा है आपातकालीन स्थिति में गृह मंत्री अमित शाह और गृह मंत्रालय के अधिकारी समय पर सक्रिय नहीं हो पाते हैं. इस कारण स्थिति बिगड़ती है. अगर ऐसा ही होता रहा तो अमित शाह इस देश में विफल गृह मंत्रियों में से एक साबित होंगे.

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इससे पहले यही सवाल दिल्ली में वकील-पुलिस विवाद के दौरान उठा था. जब पुलिस की पिटाई हुई थी. महिला आइपीएस अफसर के साथ दुर्व्यवहार हुआ था. उनका सरकारी हथियार छीन लिया गया. पुलिस प्राथमिकी दर्ज नहीं कर सकी और सरकार भी कुछ नहीं कर सकी.

दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधिन काम करती है. और गृह मंत्री चुपचाप सबकुछ देखते रह गये. तब यह कहा गया था कि दिल्ली में वकील-पुलिस विवाद की घटना गृह मंत्री के रूप में अमित शाह की पहली बड़ी विफलता है.

अब बात Citizen Amendment Bill 2019 की. भाजपा के समर्थित लोग भले ही सोशल मीडिया पर इस बिल को सिर्फ हिन्दु-मुस्लिम का मामला बनाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं, पर यह बिल देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह से लोगों को प्रभावित कर रहा है.

हिन्दी पट्टी के राज्य यूपी, बिहार, झारखंड के लोग इस बिल को लेकर हिन्दु-मुस्लिम विवाद के रूप में सोंचते हैं. जबकि पूर्वोत्तर के राज्य इस बिल को अपने धरोहर, पर्यावरण, समाज और अस्तित्व पर हमले के रूप में देखते हैं.

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तमिलनाडू में इस बिल को लोग किसी अन्य कारण से विरोध कर रहे हैं. तो देश का एक बड़ा वर्ग इस बिल को संविधान के खिलाफ मान रहा है. सभी तरफ के लोग अलग-अलग कारणों से विरोध में सड़क पर आ गये हैं. कहीं हिंसक तो कही अहिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं.

ऐसे में सरकार क्या कर रही है. शायद कुछ नहीं. बिल के आने के तुरंत बाद पूर्वोत्तर में प्रदर्शन शुरू हो गये. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह चुप रहे. पूर्वोत्तर में जब स्थिति थोड़ी ठीक हुई, तब देश के दूसरे राज्यों में प्रदर्शन शुरू हो गये. पर देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री चुप ही रहे. ऐसा लगता है कि सब कुछ पुलिस के भरोसे छोड़ दिया गया था. जब देश भर में प्रदर्शन शुरू हुए तब 19 दिसंबर से केंद्र सरकार और गृह मंत्री सक्रिय हुए.

केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों की सरकारें जिस आवाज में बातें कर रहे हैं, उससे वहां की पुलिस का रवैया जाहिर होता है. यही कारण है कि ज्यादा हिंसा भी उन्हीं राज्यों में हो रहे हैं, जहां की सरकार और पुलिस प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कठोर रवैया अपना रही है. हालांकि कर्नाटक में लोगों ने अहिंसक प्रदर्शन कर अलग उदाहरण पेश किया है. पर भाजपा शासित राज्यों की सरकार और पुलिस की भाषा एक जैसी नजर आती है.

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तो क्या केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बिल पारित होने के बाद की स्थिति का आकलन नहीं किया था. या किया था तो गलत आकलन किया गया. क्या गृह मंत्रालय ने यह मान लिया था कि जिस तरह फौज और टेक्नोलॉजी के बल पर जम्मू-कश्मीर को बंद कर दिया गया, उसी तरह पूर्वोत्तर के राज्यों के लोगों को भी घर में दुबकने को मजबूर होना पड़ेगा.

क्या केंद्र सरकार ने यह मान लिया था कि वह जनता की राय जाने बिना कोई भी फैसला ले लेंगे और लोग उसे मान लेंगे. अगर ऐसा था तो यह केंद्र सरकार और गृह मंत्री के रूप में अमित शाह की सबसे बड़ी भूल थी.

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