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Jamshedpur : इस वर्ष हम अपने देश की आजादी के 75 साल पूरे होने का जश्न अमृत महोत्सव के रूप में मना रहे हैं. भारत सरकार 13 अगस्त से 15 अगस्त तक ‘हर घर तिरंगा’ अभियान चलाकर लोगों को अपने घरों पर तिरंगा लगाने के लिए प्रेरित कर रही है, लेकिन अजादी के प्रतीक इस तिरंगे को शान से फहराने के लिए हजारों लोगों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी. लाखों लोगों ने यातनाएं सहीं अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. सरकारें हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को स्वतंत्रता सेनानियों को याद करती है, उन्हें सम्मानित करती है, लेकिन इसी समाज में ऐसी भी बलिदानी महिलाएं हैं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में हर कदम पर पति का साथ दिया, लेकिन आज जब उनके पति नहीं हैं, तो समाज और सरकार उन्हें भूल गये हैं. जमशेदपुर के बागबेड़ा में ऐसी ही 94 साल की एक महिला रहती है. जिसका पति अजादी की लड़ाई में तीन बार जेल गया. अंग्रेजी हुकूमत ने उसके पति की उंगलियां अपने बूटों चले कुचल डालीं, लेकिन उसने हमेशा अपने पति का हौसला बढ़ाया. कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया. उसके पति अब नहीं रहे. आजादी के उस परवाने की वह निर्भीक जुझारू पत्नी जीवन की आखिरी दहलीज पर एसबेस्टस के छतवाले एक छोटे से घर में रहती है. लेकिन जिस तिरंगे के लिए उसके पति ने जेल जाना और अंग्रेजी हुकूमत की यातना सहना मंजूर किया, वह तिरंगा आज भी उसके दिल में बसता है. आज भी वह जमशेदपुर के बागबेड़ा स्थित घर के आंगन में 15 अगस्त 26 जनवरी को अपने कांपते हाथों से तिरंगा फहराकर पुरानी यादों को ताजा करती हैं.

पैसों के अभाव में नहीं हो पाता इलाज
आज हम बात कर रहे हैं, ऐसे ही एक महान स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय प्रभाष चंद्र ठाकुर की पत्नी सरोजा देवी की. सरोजा देवी जमशेदपुर के बागबेड़ा में रहती है. स्वतंत्रता संग्राम में पति प्रभाष चंद्र ठाकुर का हर कदम पर साथ निभानेवाली सरोजा देवी पति के निधन के बाद नितांत अकेली पड़ गयी हैं. पति के गुजरने के बाद बेटा और बहू भी चल बसे. वृद्धावस्था में कोई देखरेख करनेवाला नहीं था, तो बेटी के पास रहने आ गयीं. आज 94 साल की सरोजा देवी बेटी और दामाद के साथ बागबेड़ा एक छोटे से घर में रहती हैं, जिसकी छत एसबेस्टस की है. सरकार की तरफ से पेंशन के रूप में मिलनेवाले थोड़े से पैसों से गुजारा हो रहा है. सरोजा देवी फिलहाल कई बीमारियों से भी ग्रसित हैं, लेकिन पैसों के अभाव में बेहतर इलाज नहीं करवा पा रहीं. लेकिन आज भी 15 अगस्त 1947 की उस आजाद सुबह को याद कर उनकी बूढ़ी आंखें भर आती हैं.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मुलाकात
सरोजा देवी बताती हैं कि महात्मा गांधी से उनकी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी. बापू की प्रेरणा से उनके पति प्रभाष चंद्र ठाकुर आजादी के आंदोलन में शामिल हो गये थे. वह कहती हैं कि बापू से मुलाकात एवं उनकी कही हुई बातों को भूलना मुश्किल है. उनकी वे बातें आज भी मेरे कानों में गूंजती हैं. महात्मा गांधी ने कहा था – ‘प्रभाष बहुत जल्द हमें आजादी मिलेगी’. और उनकी यह बात सच हो गयी.
तीन बार गिरफ्तार हुए थे प्रभाष चंद्र ठाकुर
आजादी के आंदोलन में भाग लेने के दौरान प्रभाष चंद्र ठाकुर तीन बार गिरफ्तार हुए थे. हजारीबाग और भागलपुर जेल के बारे में अपने पति से सुनी बातें सरोजा देवी को अभी भी याद हैं. वह बताती हैं कि कैसे अंग्रेजी सरकार द्वारा जेल में स्वतंत्रता सेनानियों को भर कर रखा जाता था और उन्हें यातनाएं दी जाती थीं. उन्हें बाकी कैदियों से अलग-थलग रखा जाता था, लेकिन फिर भी आजादी के इन दीवानों का हौसला तोड़ने में अंग्रेज नाकाम रहे.
15 अगस्त 1947 की आजाद सुबह
94 वर्षीय सरोजा देवी बताती हैं कि 15 अगस्त को जब देश आजाद हुआ था, तब घर से अकसर गायब रहनेवाले उनके पति प्रभाष चंद्र ठाकुर अचानक कहीं से उसी सुबह घर आये थे. उस वक्त बागबेड़ा की आबादी बहुत कम थी, लेकिन बरामदे में बैठे उनके पति को सभी लोग बधाई दे रहे थे. दोपहर के समय कुछ लोग गाड़ी से उनके घर आये और उनके पति को गुलाल लगाया और फिर लड्डू बांटे गये.
मंदिरों में आरती के बाद राष्ट्रगान और देशभक्ति गीत गाये गये
सरोजा देवी के अनुसार, उस दिन पति के चेहरे की चमक देखने लायक थी. उनके पति ने सबसे पहले कुलदेवी की पूजा-अर्चना कर घर पर खीर-पूरी बनवायी. प्रभाष चंद्र ठाकुर के दायें हाथ की उंगलियों को एक अंग्रेज अधिकारी ने आंदोलन के दौरान अपने बूट से कुचलकर तोड़ दिया था. इन उंगलियों को देखकर उनके पति हमेशा मंद-मंद मुस्काते थे और कहते थे कि ये आजादी के लिए उनकी कुर्बानी की निशानी है. सरोजा देवी बताती हैं कि 15 अगस्त की शाम सभी मंदिरों में आरती के बाद राष्ट्रगान और देशभक्ति गीत गाये गये थे.
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