
Girish Malviya
एक सर्वे के मुताबिक, दुनिया में इटली के बाद भारत में सबसे ज्यादा एनपीए हैं. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की 31 मार्च, 2018 की स्थिति के मुताबिक, 9.61 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक का एनपीए अब तक हो चुका है, अब कमाल देखिए कि इस एनपीए में केवल 85,344 करोड़ रुपये कृषि और संबंधित क्षेत्र का है, बाकी सारा NPA बड़े पूंजीपतियों के खाते में गया है.
मोदी सरकार के वित्तीय सेवा सचिव राजीव कुमार ने कुछ दिनों पहले सिड्बी द्वारा लघु ऋण पर आयोजित राष्ट्रीय कांग्रेस में कहा था कि पूरे बैंकिंग सेक्टर के लोन बुक को देखने पर पता चल जायेगा कि बैंकों का एनपीए इस (एसएमई) सेक्टर ने पैदा नहीं किया है. एनपीए मुश्किल से 300-400 बड़े कॉर्पोरेटों ने पैदा किये हैं.
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बीजेपी से राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘साल 2012 में आई क्रेडिट सुइस की एक रिपोर्ट के मुताबिक बैंकों की तरफ से दिये गये 55 लाख करोड़ रुपये के कर्जों में 98 फीसद हिस्सेदारी देश के 10 कंपनी समूहों की थी. इस साल 6 अप्रैल को लोकसभा में वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने बताया कि 31 मार्च 2015 तक सरकारी बैंकों का एनपीए 2 लाख 67 हज़ार करोड़ था. 30 जून 2017 तक सरकारी बैंकों का एनपीए 6 लाख 89 हज़ार करोड़ हो गया और अब यह 10 लाख करोड़ के आसपास पुहंच गया है… तो वो लोग कौन हैं, जो इतनी तेजी से यह पैसा डुबोए जा रहे हैं, आप चाहे मोदी समर्थक हों या मोदी विरोधी अपने दिल पर हाथ रखकर बताइये कि यह जानने का हमें हक है या नहीं कि ये लोग कौन हैं? क्या यह सवाल पूछा नहीं जाना चाहिए कि 2015 में जो एनपीए ढ़ाई लाख करोड़ था, वो 10 लाख करोड़ कैसे हो गया. क्या इसके लिए सिर्फ यूपीए सरकार ज़िम्मेदार है या मौजूदा सरकार की भी कोई जवाबदेही है ?
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ऐसा नहीं है कि टॉप ब्यूरोक्रेसी में यह सवाल नहीं उठे! रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने 4 फरवरी 2015 को एनपीए के बड़े घोटालेबाजों के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा था. आरबीआई के मुताबिक, राजन ने सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय ही नहीं,बल्कि वित्त मंत्रालय को भी ये सूची भेजी थी, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई.
रघुराम राजन ने पीएमओ को इस बात से भी अवगत कराया था कि किस तरह से ‘बेईमान प्रमोटरों’ द्वारा आयात ओवर-इनवॉयसिंग का इस्तेमाल करके पूंजीगत उपकरणों के लागत मूल्य को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया. यह सारी बातें अभी इसलिए सामने आयीं, क्योंकि संसद की प्राक्कलन समिति (एस्टीमेट कमेटी) के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी की गुज़ारिश पर रघुराम राजन ने 6 सितंबर 2018 को समिति के सामने 17 पन्नों का एक संसदीय नोट दिया, जिसमें राजन ने अपने इस पत्र के बारे में खुलासा किया है.
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वायर में स्वाति चतुर्वेदी ने अप्रैल 2015 के हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट का ढूंढ निकाली अखबार के अनुसार राजन ने 17,500 करोड़ के फ्रॉड के बारे में सूचना दी थी. इसमें विनसम डायमंड एंड ज्वेलरी, जूम डेवलपर्स, तिवारी ग्रुप, सूर्य विनायक इंडस्ट्री सहित कुछ कंपनियों के नाम दिए थे. अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा था. क्या रिजर्व बैंक को अब यह नहीं बताना चाहिए कि प्रधानमंत्री कार्यालय को 17,500 करोड़ के फ्रॉड की जो लिस्ट दी गई, उसमें किस-किस के नाम हैं. किस-किस के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई है. क्या प्रधानमंत्री कार्यालय को नहीं बताना चाहिए कि जब लिस्ट सौंपी गई तो क्या कार्रवाई हुई.
यह तो हुई रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर की बात, जिसे सरकार ने कोई वजन नहीं दिया और उन्हें रिजर्व बैंक से दूध में आई मख्खी की तरह निकाल के बाहर फेंक दिया, लेकिन ऐसा भी नही है कि अन्य लोगों ने इस लूट के खिलाफ आवाज नहीं उठाई. 2015 में जब आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने भारतीय रिजर्व बैंक से पूछा था कि लोन नहीं देने वालों के नाम बता दीजिए तो रिजर्व बैंक ने इंकार कर दिया था. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने नाम बताने के लिए कहा था.
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साफ है कि इन प्रकरणों में मोदी सरकार की मंशा दुर्भावनापूर्ण थी, उन्होंने बड़े पूंजीपति घरानों को लोन डुबो देने के बावजूद भी बैंको से लोन दिलवाना जारी रखा और आज जब इन लोन से पूरी देश की पूरी अर्थव्यवस्था ही डूबने के कगार पर पुहंच गयी है, तो मोदी सरकार चाहती है कि रिजर्व बैंक का लगभग ढ़ाई लाख करोड़ का कॉन्टिजेंट फंड इस्तेमाल कर लिया जाए, जिसके लिए उस पर दबाव बनाया जा रहा है.
(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)




