
Ranchi: राज्य के 37 हजार स्कूलों में मध्याह्न भोजन बनानेवाली रसोईया के घरों का चूल्हा पिछले आठ माह से ठंडा पड़ा हुआ है. उन्हें बीते आठ माह से मानदेय नहीं दिया गया है.
वेतनमान निर्धारण को लेकर लंबे समय तक आंदोलन में रहने के बाद केवल आश्वासन ही हाथ लगा है. गौरतलब है कि राज्य में 1 लाख 20 हजार रसोईया राज्य के 24 जिलों के 37 हजार स्कूलों में मध्याह्न भोजन बनाती हैं. इनका काम केवल भोजन बनाना ही नहीं, बल्कि इनके जिम्मे पूरे स्कूल का किचन होता है.
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एक दिन के काम के बदले मिलता है मात्र 42 रुपये
जानकारी के मुताबिक राज्य में जितनी भी रसोईया हैं, उन्हें मनरेगा मजदूरी से चार गुणा से भी कम रुपये मानदेय के रूप में दिये जाते हैं.
मनरेगा मजदूरी दर 172 रुपये प्रतिदिन है, वहीं रसोईया को एक दिन के काम के एवज में महज 42 रुपये ही मिलते हैं. ऐसे में आठ माह से मानदेय नहीं मिलने की वजह से बच्चों की पढ़ाई तो छूट ही रही है, साथ ही हर दिन के खाने पर भी आफत आन पड़ी है.
रसोईया संघ का कहना है कि पिछले आंदोलन के बाद केवल आश्वासन ही दिया गया. मांग तो पूरी की नहीं गयी जो मानदेय मिलता था, उसे भी बीते आठ माह से नहीं दिया गया है.
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हर बार करना पड़ता है आंदोलन
गौरतलब है कि मानदेय को वेतनमान बनाने और नियमित भुगतान को लेकर एक लाख से अधिक रसोईया को हर बार आंदोलन करना पड़ता है. बीते पांच साल में एक दर्जन से अधिक बार आंदोलन करना पड़ा है. सिर्फ 2019 में आंदोलन की बात करें तो रसोईया संघ की ओर से जून, अगस्त और फिर नवंबर माह में आंदोलन किया गया.
अहम बात यह है कि राज्य में एक लाख 20 हजार रसोईया में से केवल 88 हजार रसोईया को ही शिक्षा विभाग की ओर से मानदेय दिया जाता है. उन्हें 12 माह की जगह 10 माह का ही मानेदय मिलता है.
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