Opinion

कोरोना मरीजों की प्रतिदिन बढ़ती संख्या सरकारी आंकड़ों और उसकी तैयारियों को बेपर्दा कर रही है

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Faisal Anurag

‘जैसा कि हम सब कोविड 19 महामारी के दौर से गुजर रहे हैं. झूठ और गलत सूचनाओं के आधार पर इससे नहीं लड़ा जा सकता है. बुनियादी सच को सामने आने से रोकने और लोकलुभावन बातें करने की एक सीमा होती है. और यह सीमा अब एक्सपोज हो रही है. ‘ जर्मनी की चांसलर मार्केला एजेंल की यह टिपप्णी दुनिया के अनेक देशों के नेतृत्व पर भी है जो अपने देशों में कोविड19 के सच व वास्तविक स्थिति को न केवल झुठला रहे हैं बल्कि पिछले चार महीनों में अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को चुस्त-दुरूस्त करने में नाकामयाब रहे हैं. बार-बार मुद्दे बदल कर लोगों का ध्यान एक सीमा से ज्यादा भटकाया नहीं जा सकता है.

और न ही खतरे को कम किया जा सकता है. कोविड19 में भारत की छलांग पिछले चार महीनों की उन तैयारियों को बेपर्दा कर रही है, जिसका दावा करते हुए स्वस्थ्य सेवा को हर मुसीबत के लिए पर्याप्त बताया जा रहा था. पटना में एक पूर्व अधिकारी एम्स पटना के बाहर जिस तरह दम तोड़ गये और जगह खाली होने के बाद भी उन्हें भर्ती नहीं किया गया, इकलौती घटना नहीं है. उनके पुत्र ने ठीक ही कहा है कि उन्हें कोविड19 ने नहीं भूख ओर लापरवाही ने मारा है. यह केवल बिहार का सच नहीं है. बल्कि देश के अन्य राज्यों में मरीजों की बेबसी और परेशानी की अनेक घटनाएं सामने आ चुकी हैं.

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आंकड़ों के खेल के बावजूद इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता कि इस महामारी से निपटने की दिशा में पर्याप्त तैयारी का अभाव है. जो संकेत मिले हैं वे बताते हैं कि आने वाले दिनों में भारत में पॉजिटिव मरीजों की संख्या में छलांग तय है. इस बीच गुजरात और महाराष्ट्र से जिस तरह कोविड की रोकथाम के लिए उपयोग में लायी जा रही एंटी वायरल दवाओं की कालाबजारी की सूचनाएं आयीं हैं, उसने गरीब और मध्यवर्ग के लोगों की मुसीबतों को बढ़ा दिया है. रेमडेसिवर जैसी दवा जो कि अभी भी ट्रायल के दौर में है, ब्लैक मार्केट रैकेट के पास कैसे पहुंचा है,

यह एक गंभीर सवाल है. केंद्र के निर्देश के अनुसार इसे सिर्फ मरीज और अस्पताल तक प्रिसक्रिप्सन व आधार कार्ड की जांच के बाद ही देने का निर्देश दिया गया है. इस दवा की गुजरात और  महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर कालाबजारी हो रही है. काला बाजार रैकेट इसे 55 से 80 हजार में बेच रहा है. क्या भारत के मध्यवर्ग की क्षमता है कि वह इसे ब्लैक मार्केट से ले सके? सरकारों का नियंत्रण किन हालतों में कमजोर हुआ है. यह तो जांच का विषय है, लेकिन केंद्र की चुप्पी का क्या मतलब लगाया जा सकता है. आखिर कोविड 19 की दवाइयों की सहज पहुंच को उचित दर पर सुगम क्यों नही बनाया जा सकता है. इस पर चर्चा करने से बचा जा रहा है.

होना तो यह चाहिए था कि सरकार कोविड19 महामारी की गिरफ्त में आये तमाम मरीजों का मुफ्त इलाज करती. और पिछले चार महीनों में सुविधाओं का इतना प्रबंध करती कि किसी मरीज को इलाज की कमी का शिकार नहीं होना पड़ता.

लेकिन जैसे-जैसे पॉजिटिव होने की दर बढ़ रही है, सरकार के हाथपांव फुल रहे हैं. अब तो प्रतिदिन मरीजों की संख्या औसत 28 हजार हो रही है. यह संख्या सामान्य नहीं है. इसके और बढ़ने का अंदेशा है. जानकार मान रहे हैं कि जिस तेजी से मरीज निकल रहे हैं उस गति से टेस्ट नहीं हो रहे हैं. शुरू में ट्रेंसिंग, टेस्ट और ट्रीटमेंट का जो सूत्र बार-बार कहा जा रहा था, उसे अब नजरअंदाज किया जा रहा है. आइएमसीआर का कंफ्युजन भी अब चर्चा का विषय बना हुआ है.

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दिल्ली सकरार ने सबसे पहले सामुदायिक फैलाव के लक्षण की चर्चा कुछ समय पहले की थी. तब केंद्र ने उसे नकार दिया था. केंद्र ने कहा था कि अभी तक ऐसे संकेत नहीं है कि सामुदायिक फैलाव हो रहा है. लेकिन अब केरल के मुख्यमंत्री विजयन से साफ तौर पर कहा है कि कोविड19 के सामुदायिक फैलाव के संकेत हैं. उन्होंने कहा है कि हम अभी कोविड प्रकोप के सबसे अहम दौर में प्रवेश कर चुके हैं. जो सामुदायिक फैलाव के बेहद करीब है. सवाल उठता है कि आईएम सीआर या केंद्र सरकार इन तथ्यों की छानबीन कर स्थिति क्यों नहीं स्पष्ट करती है. बिहार ने पूरे राज्य में लॉकडाउन लगा कर यही तो संकेत दिया है. भारतीय जनता पार्टी के पटना कार्यालय से 75 पॉजिटिव का मिलना बेहद खतरनाक संकेत है.

मार्च में जब दिल्ली के मरकज का मामला आया था तो खूब सांप्रदयिक बातें की गयी. और उन्हें कोविड 19 के प्रसार का सूत्र बता दिया गया. लेकिन अब जिस तरह की गति प्रसार में आयी है, उसे ले कर सजगता कम क्यों दिख रही है. इस तथ्य को भी नहीं नकारा जा सकता कि भारत पेरू और ब्राजील देशों से भी कम टेस्ट  कर रहा है. प्रति दस लाख पर पॉजिटिव रेट लगभग दस प्रतिशत छुने को है. पहले बचे रहे पूर्वोत्तर के लगभग सभी राज्यों में जिस गति से मरीज बढ़ रहे हैं, उससे हालात के और गंभीर होने का अनुमान है. उन राज्यों की स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का रोना पहले से ही है.

बीते 24 घंटे या एक दिन में संक्रमण के नए मामलों की बात करें तो बीते 13 जुलाई को इनकी संख्या 28,701 थी, जो अब तक की सर्वाधिक संख्या थी. 12 जुलाई को 28,637 , 11 जुलाई को 27,114, 10 जुलाई को 26,506, नौ जुलाई को 24,879, आठ जुलाई को 22,752, सात जुलाई को 22,252, छह जुलाई को 24,248 और पांच जुलाई को रिकॉर्ड 24,850 थी. 14 जुलाई ने तो अब तक के सारे रिकार्ड तोड दिए हैं. 14 जुलाई को 29,427 मामले आए. इससे साफ है भारत का संकट तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन उसके हेल्थ सिस्टम को विकसित नहीं किया जा रहा है.

लॉकउाडन के बाद एकतरफ लोगों की आर्थिक परेशानी बढ़ी है. वहीं दूसरी ओर जीवन सहज गति में नहीं आ पा रहा है. डिस्टेंस बनाने या हाथ धोते रहने की प्रवृति में भी कमी है. शादियों के मौसम में तो भीड़भाड़ को रोका नहीं जा सका. वहीं बिहार, बंगाल और राजस्थान में राजनीतिक ड्रामे इस बचाव उपायों की धज्ज्यिां उड़ा रहे हैं. बिहार के भाजपा के कार्यालय की घटना बताती है कि किस तरह की भीड़ वहां मौजूद है. और सोशल डिस्टेंसिंग का भी अभाव है.

चूंकि बिहार में चुनावी सरगर्मी तेज हो चुकी है. अन्य दलों के कार्यालयों में भी सुरक्षा व बचाव के उपायों का नहीं होने की संभावना बनी हुई है. इससे वायरस के प्रसार में मदद ही मिलेगी. लॉकडाउन मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार को गिराने के बाद लगा था. अब अनलॉक होते भारत में राजस्थान का पालिटिकल सर्कस हो रहा है. इस समय जरूरत राजनीतिक तामशों के बजाय कोविड के खतरे को कम करने की है. इस चुनौत से निपटने के लिए राज्यों की राजनीतिक स्थिरता भी जरूरी है.

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