
Chandan Choudhary
Ranchi : राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के सिर्फ ढोल पीटे जाते है. राज्य के मुखिया स्वास्थ्य के क्षेत्र में झारखंडवासियों को तमाम तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराने का भाषण देते है, राज्य के सभी निवासियों को निरोग बनाने की भी बात कहते है. लेकिन स्वास्थ्य के क्षेत्र में राज्य कितना आगे बढ़ रहा है यह रांची स्थित संक्रामक रोग अस्पताल की हालत देख कर सहज ही लगाया जा सकता है. राज्य बने 18 वर्ष बीत गए लेकिन यह अस्पताल आज भी बदहाली की आसूं बहा रहा है. राज्य भर में मात्र एक ही संक्रामक रोगों के ईलाज के लिए अस्पताल है. यह रांची के ईस्ट जेल रोड में स्थापित है. अधिकांश राज्यवासियों को इस अस्पताल के बारे में पता भी नहीं है. लेकिन पूरे राज्य भर के अस्पतालों से संक्रमित मरीजों को यहां रेफर किया जाता है. लेकिन अस्पताल में ईलाज के नाम पर कॉटन तक उपलब्ध नहीं है.
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दवा भी बाहर से खरीद कर लाते हैं मरीज के परिजन
अस्पताल में ईलाज करा रहे चुनमुन के पिता जगदीश चेरा ने बताया कि उनका लड़का टेटनस के संक्रमण से प्रभावित है. काफी जगह ईलाज कराने के बाद गढवा से संकमण अस्पताल रांची रेफर किया गया था. यहां ईलाज के लिए प्रतिदिन दवाईयां मगवाते है. दवाईयां बाहर से ही खरीद कर लाना पड़ता है. अबतक पांच सौ रुपए की दवाई मंगवा चुके हैं. इन्होंने कहा कि हम मजदूर लोग हैं, ज्यादा जानकारी नहीं है. लेकिन जब गरीबों के लिए यह अस्पताल बना है तो यहां तो सभी सुविधाएं भी हमे नि:शुल्क ही मिलनी चाहिए.
अस्पताल के बार में लोगों को मालूम तक नहीं
मरीज के पिता ने बताया कि इस अस्पताल के बारे में जानकारी भी नहीं था. दोस्त के माध्यम से पता चला था कि ऐसा कोई अस्पताल है जहां संक्रमण का ईलाज होता है. काफी भटकते-भटकते यहां पहुंचे हैं. ईस्ट जेल रोड में अवस्थित इस अस्पताल के बारे में अधिकांश लोगों को पता भी नहीं है. यहां मिलने वाली सुविधा और संक्रमण रोगों का ईलाज होता है इससे भी लोग अनभिज्ञ हैं.
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भवन हो चुका है जर्जर, बेड और स्लाइन स्टैंड भी दैयनीय
अस्पताल के कर्मचारियों ने बताया कि इस अस्पताल का भवन काफी पुराना है. यह भी अब जर्जर हो चुका है. अस्पताल के कर्मचारी बताते है कि भवन की कभी मरम्मति नहीं किया गया. यह भवन कब का बना है यह भी जानकारी नहीं है. लेकिन देखने से लगता है कि यह अंग्रेजों के शासनकाल के वक्त का ही बना हुआ. ऐस्बेस्टस के इस भवन में 12 बेड का अस्पताल है. वहीं अस्पताल के बेड, स्लाईन स्टैंड, और टेबल की भी स्थिति दैयनीय हो चुकी है. बरसात के मौसम में पानी भर जाता है और छत से पानी टपकता है सो अलग. लाइट के नाम पर यहां सिर्फ एक ट्यूब लाइट है. एक पंखा है, वह भी नहीं चलता है. दिन-रात, मच्छरों का प्रकोप बना रहता है. पानी पीने के लिए एक हैंडपंप है, उसमें से भी लाल पानी आता है.
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दो डॉक्टर के भरोसे है अस्पताल
अस्पातल में मरीजों के ईलाज के लिए मात्र दो डॉक्टर है. एक डॉ शबनम कुमारी जो स्त्री रोग विशेषज्ञ है और दूसरे डॉ. एके मिश्रा जो रेडियोलॉजिस्ट है. ऐसे में सिर्फ दो डॉक्टरों के भरोसे यह अस्पताल चल रहा है. अस्पताल में 24 घंटे मरीजों का उपचार किया जाता है. सुबह नौ से तीन बजे तक ओपीडी चलता है. वहीं अस्पताल में दो किरानी समेत लगभग 10 स्टॉफ हैं. इनके मानदेय पर महिने का लगभग 6 लाख रुपए खर्च होता है. इतना होने के बावजूद मरीजों का इलाज भगवान भरोसे है.
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क्या कहते हैं डाक्टर
डॉक्टर एके मिश्रा ने बताया कि अस्पताल में संसाधनों की कमी है यह तो पूरी तरह से सत्य है. लेकिन कम संसाधनों के बीच ही हमलोग मरीजों का ईलाज कर रहे है. जो दवाईयां उपलब्ध होता है वह दे दी जाती है लेकिन जो नहीं होता उसे बाहर से मंगवाया जाता है. वहीं डॉ शबनम कुमारी ने कहा कि यहां आकर हैंडीकैप महसूस करती हूं. पहले मैं सदर अस्पताल में थी वहां लगभग सभी संसाधन मौजूद होते थे, लेकिन यहां काफी सारी चीजों की कमी है.







