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सरकार के नये टेंडरों में SOR बना रोड़ा, 4 महीने में इंजीनियरों की कमेटी नहीं कर पायी तैयार, रोजगार पर पड़ रहा असर

Akshay Kumar Jha

Ranchi: जनवरी के आखिरी महीने में पथ निर्माण विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ. वित्त विभाग को पथ निर्माण विभाग में कई तरह की अनियमिताएं मिलीं. जिसके बाद तत्कालीन विकास आयुक्त सुखदेव सिंह की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी बनी. जांच कहां तक पहुंची है, इसकी जानकारी अभी समिति की तरफ से साझा नहीं की गयी है.

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पथ निर्माण विभाग पर आरोप लगा था कि वहां बीते तीन साल के टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है. गड़बड़ी एसओआर (Schedule Of Rate) को लेकर हुई है. एसओआर एक तरह का रेट चार्ट होता है. जिसमें निर्माण से जुड़ी चीजों का दर तय रहता है. इसी दर पर टेंडर कितने का होगा, इसका आंकलन किया जाता है. सरकार की तरफ से एसओआर तैयार करने के लिए इंजीनियरों की एक टीम तैयार की गयी. टीम का अध्यक्ष वीजिलेंस के चीफ इंजीनियर राजदेव को बनाया गया.

चार महीना बीता, दर तय नहीं कर पाये हैं इंजीनियर

एसओआर तैयार करने वाली टीम में टेंडर निकालने वाले हर विभाग के इंजीनियर सदस्य हैं. सभी को मिलकर एक रेट चार्ट तैयार करना है, जो सभी तरह के निर्माण कार्यों में लागू होगा. लेकिन चार महीना बीतने के बाद भी यह रेट चार्ट इंजीनियर की टीम तैयार नहीं कर पायी है.

जिससे पथ निर्माण, भवन निर्माण, जल संसाधन समेत कई विभाग टेंडर की प्रक्रिया को पूरा नहीं कर पा रहे हैं. पथ निर्माण विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि अगर इंजीनियर की टीम चाहती तो एक महीने के अंदर यह रेट चार्ट तैयार किय़ा जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

रोजगार से जुड़ा है मामला

कोरोना संकट काल में हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर वापस झारखंड आये हैं. अपने घर-गांव में वो बेरोजगार बैठे हुए हैं. निश्चित तौर पर रोजगार देने के लिए सरकार कई तरह की योजनाओं पर काम कर रही है. लेकिन उन योजनाओं से सभी प्रवासी मजदूरों को काम मिल जाये ये संभव नहीं. ऐसे में अगर राज्य में सरकारी निर्माण कार्य शुरू होते तो लौटे प्रवासी मजदूरों को रोजगार मिलने में सहूलियत होती. लेकिन एसओआर तैयार नहीं होने की वजह से ऐसा नहीं हो पा रहा है.

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जानें कैसे टेंडर के नाम पर हो रहा था भ्रष्टाचार

–      पथ निर्माण विभाग ने सड़क निर्माण के लिए सूरत की यूनिक कंस्ट्रक्शन कंपनी को बिना टेंडर डाले 51.62 करोड़ का ठेका दे दिया गया था. कंपनी को मोबिलाईजेशन अमाउंट के रुप में पहले ही 4 करोड़ रुपये दे दिये गये थे. सितंबर 2019 तक कंपनी को कुल 7.65 करोड़ रुपये का भुगतान हो गया. योजना एंव वित्त विभाग की समीक्षा के दौरान अपर मुख्य सचिव ने इस बात का खुलासा किया.

–      जब ऑडिट में आपत्ति की गयी तब पथ निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता ने उक्त ठेकेदार को डिबार कर दिया. इस मामले को लेकर यूनिक कंस्ट्रक्शन कंपनी को नोटिस किया गया. नोटिस का जवाब देते हुए कंपनी ने बताया कि कंपनी झारखंड में कोई काम कर ही नहीं रही है. न ही पथ निर्माण विभाग से कोई एडवांस लिया है. साथ ही उक्त कंपनी ने मामले की जांच के लिए आग्रह भी किया. लेकिन, अभियंता प्रमुख ने कोई कार्रवाई नहीं की. जांच कमिटी ने इसे सीधे सरकारी राशि का गबन माना.

–      योजना एवं वित्त विभाग ने जांच में पाया कि पथ निर्माण विभाग के विभिन्न टेंडरों में एमओआर बढ़ाकर करोड़ो रुपये का घोटाला किया गया. जांच में पाया गया कि दर्जनों ठेका निविदा की दर से 30 प्रतिशत कम रेट पर दे दिया गया. नियमों के तहत निविदा दर से 10 फीसदी नीचे कोट किये गये टेंडर ही वैलिड होते हैं. दस फीसदी अधिक दर पर रेट कोट होने पर कैबिनेट की स्वीकृति जरुरी होती है.

लेकिन कई मामलों में 30 फीसदी रेट कम कोट करने पर भी टेंडर दे दिया गया. 30 दिसंबर 2019 को योजना एंव वित्त विभाग की समीक्षा के दौरान इस घोटाले का खुलासा किया गया. इसके अलावा जुडको में भी एसओआर बढ़ाकर मनमाने तरीके से टेंडर करने और कई मामले में मनमाना मोबिलाईजेशन अमाउंट देने की शिकायत सरकार को मिली है. आदेश के अनुसार 01 अप्रैल 2016 के बाद हुए सभी टेंडरों की जांच के आदेश हैं.

ऐसे हुआ खुलासा

पथ निर्माण विभाग के इंजीनियरों ने फर्जी कागजात पर कई कंपनी को ठेका दिया. योजना वित्त विभाग की समीक्षा के दौरान पता चला कि एक समान काम के लिए पथ निर्माण विभाग और ग्रामीण कार्य विभाग की अलग-अलग दर हैं.

इस वजह से ही बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता सामने आयी. इससे राज्यकोष की कितनी हानि हुई यह जांच के बाद पता चलेगा. शिड्यूड ऑफ रेट समिति के अध्यक्ष अभियंता प्रमुख को इस मामले में दोषी पाया गया है. उन्हें सस्पेंड भी कर दिया गया है.

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