
Pravin kumar
रांची: क्या झामुमो में पार्टी सुप्रीमो शिबू सोरेन की अनदेखी हो रही है. क्या भीतरखाने में भी कुछ सही नहीं चल रहा. पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता इस अनदेखी से क्षुब्ध हैं. इसका ताजातरीन नमूना इसी सप्ताह सामने आया. दुमका के जरमुंडी में सभा करते हुए गुरुजी ने कहा कि 6500 स्कूलों को बंद कर गांव में रहने वाले बच्चों को अनपढ़ और मूर्ख बनाये रखना चहती है सरकार. राज्य के जनमनस को हो रही परेशनी के खिलाफ बड़ा आंदोलन करना होगा. साथ ही सभा में गुरू जी ने कहा की सरकारी संपत्ति का नुकसान पहुंचे उसकी चिंता नहीं करें, क्योंकि अब हमारे पास आंदोलन के अलावा अपने दुखों की समस्याओं को सरकार के समक्ष रखने का दूसरा जरिया नहीं बचा. लेकिन शिक्षा से जुड़े इतने बड़े बयान पर पार्टी के नेता और कार्यकर्ता खामोश रहे. यही नहीं विपक्षी दलों ने भी इस बयान पर साथ नहीं किया. कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आई.
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एक जमाना वो भी था
एक जमाना वह भी था जब जब शिबू सारेन की आवाज पर झारखंड के सुदूरवर्ती गावों में डुग-डुगी बजने लगती थी. और लोग सड़कों पर निकल पडते थे. फिलहाल शिबू का यह बयान ऐसे समय में आया है जब संताल परगना के गोड्डा में आदिवासियों के साथ क्रूर व्यवहार किया जा रहा है. संताल झामुमो का गढ़ माना जाता है. लेकिन इस मसले पर झामुमो के कद्दावर नेता भी चुप्पी साधे हुए हैं. यह सवाल पैदा करता है कि क्या गुरुजी की अनदेखी हो रही है. गोड्डा के किसानों के अकेले क्यो छोड दिया गया है. अडाणी के लिए प्रशासन ने जिस तरह की कार्रवाई की है. उसके खिलाफ राज्यव्यवापी प्रतिरोध क्यों नहीं खडा कर पा रहे हैं? सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि विपक्षी राजनीतिक दलों ने भी क्या सत्ता पक्ष से मिलकर इस पर सहमति बना ली है. या और कोई वजह है?
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गोड्डा मामले में सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया
गोड्डा के किसानों पर हो रहे अत्याचार को लेकर सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रिया भी हुई है. झामुमो विपक्ष की सबसे बडी ताकत है और संताल परगना में उसका आधार भी मजबूत है. शिबू सोरेन ने धनबाद के टुंडी से जिस आंदोलन की शुरूआत की थी वह संतालपरगना में ही परवान चढा. जमीन के सवाल को लेकर ही हुए आंदोलन ने झारखंड में एक नयी चेतना जनमानस के बीच पैदा किया. लेकिन पिछले कुछ समय से जमीन पर जनता के हक के मुद्दे पर झामुमो की वह आक्रमकता नहीं रही. सीएनटी-एसपीटी में हुए संसोधन के सवाल पर पार्टी आंदोलन के रूख में आई. लेकिन भूमि अधिग्रहण कानून आने के बाद इसमें बरती जा रही किसी अनियमितता के सवाल पर झामुमो कोई स्वतंत्र आंदोलन खडा नहीं कर पाया है. विपक्ष की सबसे बडी ताकत होने के बावजूद विधान सभा के बाहर उसकी उपस्थिति कम ही देखी गयी.
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आंदोलन ही रहा है झामुमो का मजबूत पक्ष
झामुमो का मजबूत पक्ष जल जंगल जमीन को लेकर हुए आंदोलन ही रहा है. आंदोलन के कारण ही झामुमो ने अपना विस्तार किया है. झारखंड आंदोलन को नयी दिशा देने में शिबू की धनकटनी आंदोलन ने बडी भूमिका निभायी. जमींदारों और साहूकारों के खिलाफ आंदोलन ने झारखंड आंदोलन को न केवल नया तेवर दिया बल्कि आंदोलन को जमीन के सवाल से जोडा. झारखंड आंदोलन ने पहली बार समाज सुधार और आर्थिक सवालों को उठाया. झारखंड की राजनीति में यह हुल और उलगुलान के बाद पहला अवसर था जिसमें राजनीतिक संदर्भ आर्थिक और समाज सुधार के सवाल को नयी दिशा दे रहा था. लेकिन अब जब कि झारखंड में कई तरह के राजनीतिक संकट दिखते हैं झामुमो अपनी इसी भूमिका से पिछड़ता जा रहा है. पिछले कई सालों की चुनावी राजनीति के कारण पार्टी की क्षमता प्रभावित हुई है.
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क्या कहते है पार्टी के पूर्व पदाधिकारी
नवीन चंटल: झारखंड मुक्ति मोर्चा युवा मोर्चा के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष नवीन चंचल कहते हैं. गुरुजी के एक आह्वान पर हम लोग सड़कों पर उतर आते थे. वर्तमान दौर में पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के आदेश का इंतजार किया जाता है इसके बाद ही वर्तमान पार्टी कैडर सक्रिय होते हैं. जो की पार्टी के लिए घातक है.
राजेश कुमार: झारखंड मुक्ति मोर्चा युवा मोर्चा के पूर्व केंद्रीय महासचिव राजेश कुमार कहते हैं कि जब अलग राज्य हुआ था उस दैर में एटीआइ को विधानसभा बनाने की बात हो रही थी. गुरुजी इस पर असहमत थे. तब बिना कोई निर्णय के ही पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एटीआई को विधानसभा बनने से रोक दिया. पार्टी का यह तेवर संथाल परगना से लेकर पूरे राज्य में स्थापित कराया. राज्य की जो परिस्थिती है उसमें पार्टी को पुराने तेवर में आने की जरूरत है तभी भाजपा को सही विकल्प झारखंड मुक्ति मोर्चा दे सकती है.
अनुज तिवारी: पूर्व केंद्रीय समिति के सदस्य पलामू प्रमंडल युवा मोर्चा के प्रभारी रहे अनुज तिवारी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि पार्टी में आज सिर्फ नेताओं के जीहुजूरी में कार्यकर्ता लगे रहते है. पार्टी नेतृत्व को सही विषय से अवगत नहीं कराया जाता है. कार्यकर्ता भी पहले की तरह नहीं रहे.जबकि पूर्व में पार्टी में वैसे लोग जड़तें थे जो झारखंड का मर्म और पीड़ा को महसूस करते थे. वर्तमान दौर में पार्टी में घेराबंदी कर दी गई है जिससे जन समस्याओं से रूबरू होने के लिए पार्टी नेतृत्व को माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है और जमीनी कार्यकर्ता हाशिए पर चले पर रहते है. एक दौर था जब झामुमो के कार्यकार्ता ओर नेता संघर्ष की बुनियाद पर ही अपनी पहचान बनाते थे और चुनावों में भी इसका सकारात्मक प्रभाव पडता था. आज वह दौर पार्टी में नहीं दिख रहा है.

एक जमाना वो भी था
गोड्डा मामले में सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया
आंदोलन ही रहा है झामुमो का मजबूत पक्ष


