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कल्याण विभाग पर ब्यूरोक्रेट्स का कब्जा, योजना नहीं सिर्फ बिलिंग के लिए फाइल आती है मंत्री के पास (1)

Akshay Kumar Jha
Ranchi: किसी भी विभाग के लोकतांत्रिक ढांचे को कायम रखने के लिए मंत्री और सचिव दोनों को करीब-करीब बराबर हिस्से में पावर शेयर की जाती है. लेकिन दोनों में से कोई इस ढांचे को दरकिनार करने की कोशिश करता है, तो ठीक वही होता है, जो इस वक्त राज्य के कल्याण विभाग में हो रहा है.

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कल्याण विभाग की मंत्री लुईस मरांडी हैं, जो नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेने को हराकर विधानसभा में दाखिल हुई हैं. ऐसा कहा जाता है कि वो अपने क्षेत्र में काफी सक्रिय रहती हैं. अपने टेबल पर फाइल को ज्यादा देर तक टिकने नहीं देती. लेकिन कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिससे उनकी बेबसी साफ झलक रही है. वो चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही हैं.

दरअसल ब्यूरोक्रैट्स के जाल में उनका विभाग फंसता जा रहा है. कुछ योजनाओं को चयन करते वक्त उनके पास फाइल नहीं आती है, सिर्फ पैसा निर्गत करने वक्त उनके पास फाइल आ रही है. क्योंकि पांच करोड़ से ज्यादा की राशि बिना मंत्री की अनुमति के नहीं पास की जा सकती है. लिहाजा उन्हें इस बार अपनी फाइल पर लिखना पड़ गया “क्या इस योजना के लिए मुझसे अनुमोदन लेना जरूरी नहीं है”.

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मंत्री के बिना अनुमोदन के ही फाइल भेज दिया केंद्र को

संविधान के अनुच्छेद 275 (1) में साफ तौर से कहा गया है कि केंद्र सरकार, उन राज्यों को ऐसी जगहों पर विकास करने के लिए राशि मुहैया कराएगी जो आदिवासी बहुल इलाका है. इस योजना के तहत करीब एक अरब रुपए कल्याण विभाग को केंद्र सरकार की तरफ से मिलता है. वहीं दूसरी योजना SCA to TSP यानि Special Component Assistance to Tribal Sub Plan.

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इसके तहत भी करीब एक अरब सालाना विभाग को मिलता है. विभाग राज्य से योजनाओं को अनुमोदित कर केंद्र सरकार को भेजती है और केंद्र योजनाओं के अनुसार, पैसा राज्य को देता है. योजनाओं के चयन के लिए एक हाई लेवल कमेटी बनाए जाने का प्रावधान है. यह कमेटी योजनाओं को तय करने का काम करती है.

फिलहाल इस कमेटी को हेड सीएस कर रहे हैं. वित्त वर्ष 2017-18 और 2018-19 के लिए जो राशि केंद्र सरकार ने राज्य की योजनाओं के लिए भेजी उन योजनाओं के लिए मंत्री लुईस मरांडी से अनुमोदन लिया ही नहीं गया. सीएस की अध्यक्षता में योजनाएं तय होकर सीधा केंद्र सरकार को भेज दी गयी और वहां से राशि राज्य के कल्याण विभाग में आ गयी.

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विभाग मंत्री के जिले को आदिवासी बहुल मानता ही नहीं

झारखंड के 13 जिलों को TSP (Tribal Sub Plan) जिला माना जाता है. बाकी के 11 जिलों को OSP (Other Sub Plan) माना जाता है. 2018-19 में जो योजनाएं, केंद्र सरकार को विभाग के सचिव हिमानी पांडे की तरफ से भेजी गयी उसमें 13 में से नौ जिले शामिल हैं. लेकिन गौर करने वाली बात है कि जो जिला उपराजधानी सिर्फ इसलिए मानी जाती है, क्योंकि वो एक आदिवासी बहुल जिला है.

एक ऐसा जिला जहां से आदिवासी और जनजाति की राजनीति झारखंड में शुरू हुई. उस जिला दुमका का नाम ही योजनाओं में शामिल नहीं है. यहां यह भी जानना जरूरी है कि कल्याण विभाग की मंत्री लुईस मरांडी इसी जिले के विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर विधायक और मंत्री बनी हैं.

कल पढ़ेः मजबूर होकर क्या लिखना पड़ा फाइल पर मंत्री को और कल्याण विभाग की राशि खर्च कहां कर रहा है विभाग

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