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आरपीएन सिंह के इस्तीफे और भाजपा में शामिल होने से झारखंड की सत्ता के समीकरण पर पड़ सकता है प्रभाव

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Ranchi : पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के झारखंड प्रभारी आरपीएन सिंह के इस्तीफे और भाजपा में शामिल होने से यूपी विधानसभा चुनाव में क्या नफा नुक्सान होगा इसका आकलन कांग्रेस और भाजपा को करना है. लेकिन झारखंड की राजनीति में इनके इस्तीफे से पड़नेवाले प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है. आरपीएन सिंह झारखंड में वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पटकनी देने के लिए तैयार की गयी रणनीति के एक बड़े रणनीतिकार थे. इनकी ही रणनीति का हिस्सा था कि झारखंड में पिछले चुनाव में झामुमो, कांग्रेस और राजद का महागठबंधन बना.

भाजपा के दर्जनों राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की फ़ौज को रौंदते हुए कमल को कुम्हलाने पर विवश किया और महागठबंधन के सिर पर ताज चमका. अलग राज्य बनने के बाद न सिर्फ कांग्रेस का बल्कि झामुमो का भी सबसे बेहतर प्रदर्शन पिछले चुनाव में रहा. इसमें कहीं न कहीं आरपीएन सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

झारखंड में महागठबंधन को आकर देनेवाले और सत्ता शीर्ष तक ले जानेवाले नेताओं में से एक आरपीएन सिंह के भाजपा ज्वाइन करने के बाद सूबे की सत्ता के समीकरण पर भी प्रभाव पड़ेगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.

झारखंड की राजनीति में बड़ा उथल-पुथल होगा, इससे भी इग्नोर नहीं किया जा सकता. वजह साफ है कि झारखंड कांग्रेस के विधायकों के साथ-साथ कार्यकर्ताओं पर आरपीएन सिंह की मजबूत पकड़ है. आरपीएन ने चार प्रदेश अध्यक्षों के साथ काम किया. सबसे लम्बे समय तक प्रदेश कांग्रेस प्रभारी रहने का रिकार्ड भी इन्हीं के नाम है.

जुलाई 2017 में कांग्रेस आलाकमान ने आरपीएन सिंह को झारखंड कांग्रेस का प्रभारी बनाया था. उस समय से आजतक यानी पांच वर्षों तक वे झारखंड कांग्रेस के प्रभारी रहे.

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पहली बार 16 विधानसभा सीटों पर जीती कांग्रेस

अलग झारखंड राज्य बनने के बाद से विधानसभा में क्रमवार कांग्रेस विधायकों की संख्या कम होती जा रही थी. झारखंड में कांग्रेस पार्टी गुटबाजी के लिए जानी जाती थी. अनुशासन एक तरह से ख़त्म था. ऐसे में वर्ष 2017 के जुलाई महीने में कांग्रेस आलाकमान ने आरपीएन सिंह को झारखंड कांग्रेस का प्रभारी बना कर भेजा.

प्रभारी बन कर आने के बाद इन्होंने सबसे पहले पार्टी में व्याप्त गुटबाजी को समाप्त किया. साथ ही कार्यकर्ताओं को अनुशासन का पाठ भी पढ़ाया. इनके नाम चार पूर्व अध्यक्षों के साथ काम करने का भी रिकॉर्ड है.

कांग्रेस को अपने पॉकेट की पार्टी समझनेवाले नेताओं को औकात में लाया. निर्णय लेने में भी आरपीएन का कोई सानी नहीं था. वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव, आरपीएन ने अपना सिक्का चलाया.

लोकसभा चुनाव के समय झामुमो से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस का प्रत्याशी होना इसका उदाहरण है. विधानसभा चुनाव से पहले हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा भी आरपीएन ने ही की थी. इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को बड़ी सफलता मिली.

कांग्रेस पहली बार 16 विधानसभा सीटें जीती. इतना ही नहीं यह आरपीएन सिंह का ही करिश्मा था कि जब बाबूलाल मरांडी ने झाविमो को भाजपा में विलय किया तो झाविमो के दो विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की को कांग्रेस में शामिल कराया.

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कांग्रेस के समर्थन से चल रही हेमंत सोरेन सरकार

झारखंड की हेमंत सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही है. बंधु तिर्की और प्रदीप यादव के पार्टी में आ जाने से कांग्रेस विधायकों की संख्या 18 है. हालांकि अभी तक विधानसभा में बंधु तिर्की और प्रदीप यादव को कांग्रेस विधायक की मान्यता नहीं मिली है. इस नजरिये से भी देखा जाये तो कांग्रेस की यहां महत्वतपूर्ण भूमिका नजर आती है.

कांग्रेस नेता आरपीएन सिंह के दल बदलने से झारखंड में कांग्रेस कमजोर तो होगी ही, झारखंड में राजनीतिक उथलपुथल मच सकती है. हेमंत सोरेन की सरकार के लिए कई मुश्किलें सामने आ सकती हैं.

झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार गिराने की साजिश की बात अक्सर सामने आती रही है. खुद झामुमो के विधायक समय-समय पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा के इशारे पर कुछ लोग झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार गिराना चाह रहे हैं. झामुमो और कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं.

झामुमो के विधायक रामदास सोरेन तो इस संबंध में प्राथमिकी तक दर्ज करा चुके हैं. इतना ही नहीं वर्ष 2021 में पुलिस ने रांची में छापेमारी कर कुछ लोगों को एक होटल से गिरफ्तार किया था. यह गिरफ्तारी कांग्रेस विधायक अनूप सिंह द्वारा कोतवाली थाने में दर्ज करायी गयी प्राथमिकी के आधार पर हुई थी.

उन पर आरोप लगा था कि झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार को गिराने की साजिश रच रहे हैं. आरोपित जेल भेजे गये थे. बाद में झारखंड हाइकोर्ट से उन्हें जमानत मिली थी. हालांकि यह जांच अभी तक पूरी नहीं हो सकी है.

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सभी दलों की नजर झारखंड की राजनीतिक सरगर्मी पर केन्द्रित

आरपीएन सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद अब सभी दलों की नजर यहां की राजनीतिक सरगर्मी पर केन्द्रित हो गयी है. भाजपा के साथ-साथ झामुमो की नजर भी कांग्रेस विधायकों के रुख पर टिकी हुई है. सत्ता समीकरण में अविश्वास का माहौल व्याप्त है. भाजपा को यह लग रहा है कि आरपीएन सिंह के पार्टी में आने से झारखंड में सत्ता पर काबिज होने का मार्ग बन सकता है.

झामुमो को यह डर सता रहा है कि कहीं कांग्रेस के विधायकों का एक धड़ा जो पूर्व में कुछ मुद्दों को लेकर नाराज चल रहा था, वो पलटी ना मार दे.

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार आरपीएन के भाजपा में जाने के बाद झामुमो के रणनीतिकार कांग्रेस विधायकों पर पैनी नजर रख रहे हैं. हालांकि कांग्रेस के विधायकों का अबतक जो बयान आया है उसमें आरपीएन के खिलाफ ही बोल हैं.

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झारखंड का सत्ता समीकरण

  • झारखंड मुक्ति मोर्चा – 30
  • कांग्रेस – 16
  • भाजपा – 25
  • जेवीएम – 03
  • आजसू पार्टी – 02
  • एनसीपी – 01
  • सीपीआइ एमएल – 01
  • राजद – 01
  • निर्दलीय – 02

झामुमो के 30, कांग्रेस के 16, राजद के एक, झाविमो छोड़ कांग्रेस में आये दो विधायक यानी 49 विधायकों के समर्थन के साथ हेमंत सरकार अभी मजबूत स्थिति में है. झारखंड में सरकार बनाने के लिए 42 विधायकों का समर्थन चाहिए. भाजपा के पास 25 और आजसू के दो विधायकों का समर्थन है. यदि भाजपा प्रयास भी करती है तो उसे 15 विधायकों का समर्थन चाहिए जो फिलहाल दिख नहीं रहा है.

बहरहाल राजनीति आंकड़ों का खेल है. जिसके पास आंकड़े हैं वो पास और जिसके पास नहीं वो फेल. देखना दिलचस्प होगा कि आरपीएन के आने के बाद झारखंड में सत्ता का ऊंट किस करवट बैठता है.

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