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लोकसभा चुनाव में रघुवर की रणनीति मानी जा रही सटीक, लेकिन विस चुनाव में होगा रिपीट टेलीकास्ट, जरूरी नहीं!

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Akshay Kumar Jha

Ranchi : सीएम बनने के बाद से ही रघुवर दास ने अपनी पूरी ताकत संथाल में झोंक दी. राजनीतिक चश्मे से देखेंगे तो परिणाम में अंतर है. अप्रैल 2017 में संथाल के लिट्टीपाड़ा विधानसभा के उपचुनाव में बीजेपी की लाख रणनीतियों के बावजूद जेएमएम के साइमन मरांडी करीब 13000 वोटों से जीत जाते हैं. और हारते हैं बीजेपी के हेमलाल मुर्मू.

2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से बीजेपी के हेमलाल मुर्मू को राजमहल सीट पर जेएमएम के विजय हांसदा से हार मिलती है. लेकिन संथाल में बीजेपी अपनी पकड़ को मजबूत करते दिखती है. संथाल की पहचान कही जाने वाली दुमका लोकसभा सीट पर विपक्षी पार्टी के सबसे बड़े नेता शिबू सोरेन को बीजेपी पटखनी देती है.

बीजेपी की इस जीत की वजह चाहे जो हो, फिलहाल इसे मुख्यमंत्री रघुवर दास की रणनीति का असर माना जा रहा है. झारखंड में सारे दावों को दरकिनार करते हुए बीजेपी पिछली बार से ज्यादा मजबूती से ऊभरी है. संथाल में दो सीट के अलावा दूसरे क्षेत्रों से 10 जीतने के बाद झारखंड में रघुवर दास की पीठ पार्टी थपथपा रही है.

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मोदी फैक्टर से रघुवर दास की रणनीति को मिला बल

जिस तरह के चुनाव के नतीजे आए हैं, उससे कहा जा सकता है कि निश्चित रूप से मोदी लहर थी. इस बार के चुनावी नतीजों ने साफ कर दिया है कि राज्य ही नहीं बल्कि देश की राजनीति से जातिवाद खत्म होते दिख रही है. इसी बात का झारखंड में बीजेपी को बखूबी फायदा हुआ.

बात आदिवासी बहुल्य क्षेत्र की हो, या फिर महतो बेल्ट की. मिशनरी का गढ़ कही जाने वाली खूंटी में भी बीजेपी ने झंडा गाड़ा. रांची में मोदी का रोड शो हो या चाईबासा और जमुआ में मोदी की सभा. सारी रणनीति परिणाम में तबदील हुई.

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लेकिन विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव का होता है अलग फ्लेवर

ऐसे कई सारे उदाहरण हैं जिससे राजनीति की यह तस्वीर साफ होती है कि लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में काफी अंतर होता है. झारखंड की ही बात करें तो 2014 की लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 12 लोकसभा क्षेत्र में जीत मिली थी. दो लोकसभा क्षेत्र दुमका और राजमहल बीजेपी हार गयी थी.

दुमका लोकसभा क्षेत्र में छह और राजमहल विधानसभा क्षेत्र में छह विधानसभा सीट है. इस लिहाज से झारखंड में जेएमएम को सिर्फ 12 विधानसभा सीट पर जीत मिली और बीजेपी को 69 सीटों पर जीत मिली. लेकिन लोकसभा चुनाव के चंद महीनों के बाद जब विधानसभा चुनाव हुआ तो आंकड़े बिलकुल बदले हुए थे.

बीजेपी भले ही राज्य की सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन लोकसभा के मुकाबले विधानसभा सीटों की संख्या 69 से घटकर 37 हो गयी. वहीं जेएमएम की सीटों की संख्या लोकसभा के मुकाबले 12 से बढ़कर 19 हो गयी. तर्क यह भी दिया जा रहा है कि 2014 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से झारखंड में गोड्डा, पांकी, लिटीपाड़ा, गोमिया, सिल्ली, लोहरदगा और कोलेबीरा समेत सात उपचुनाव हुए. एक गोड्डा सीट को छोड़ दी जाए तो बाकी सभी सीट पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है.

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राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में नवंबर से मई तक ऐसा क्या हो गया?

जिन तीन राज्यों में कांग्रेस ने सरकार बनाई उनमें लोकसभा सीटों के आंकड़ों को जोड़ दिया जाए तो कुल सीट होती हैं 65. इनमें से 62 सीटों को बीजेपी ने मजबूती के साथ जीता है. ये 2014 में भाजपा के प्रदर्शन का रिपीट टेलीकास्ट है. वो भी तब जब कांग्रेस न सिर्फ तीनों राज्यों में सरकार चला रही है बल्कि किसान कर्ज माफी के दावे को हकीकत में बदलने पर अपनी पीठ हर मंच पर थपथपा रही है.

मध्यप्रदेश को नवंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में 230 सीटों में 114 सीट आयी थी. राजस्थान में 200 में से 99 सीट और छत्तीसगढ़ में 90 में से 68 सीट. लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में राजस्थान में 25 सीटों पर एडीए क्लीन स्वीप करती है. एमपी में 29 सीटों में बीजेपी को 28 सीट पर जीत मिली. वहीं छत्तीसगढ़ में 11 सीटों में से 9 सीट बीजेपी को मिलती है.

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