Lead NewsLITERATURE

प्रेमचंद का नाम मुंशी प्रेमचंद नहीं सिर्फ प्रेमचंद ही था, जानें कैसे शुरू हुआ कंफ्यूजन

कथा सम्राट प्रेमचंद की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : आज से सवा सौ साल पहले एक साधारण से दिखनेवाले दुबले पतले शख्स ने हिंदी कथा साहित्य का रंग-रूप बदल कर रख दिया था. ये धनपत राय उर्फ प्रेमचंद थे. इससे पहले का कथा साहित्य यथार्थ से काफी दूर था ऐयारी की कहानियां, राजा-रानी के काल्पनिक किस्सों की भरमार थी. प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में भारतीय समाज के कई रंगों को दिखाना शुरू किया.

इसे भी पढ़ें :बिहार में कोरोना के बढ़ते केस पर हाइकोर्ट सख्त, अस्पतालों की व्यवस्था पर मांगी सरकार से जानकारी

घूसखोरी की दास्तान नमक का दारोगा

नमक का दारोगा कहानी में सरकारी नौकरी में ब्रिटिशकाल में भी फैली घूसखोरी को बड़े ही बेबाक ढंग से पेश किया है. इसमें एक पिता अपने बेटे को समझाता है कि नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है. निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए. ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो.

मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है. ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है. वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती. ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ.

इसे भी पढ़ें :Tokyo Olympics महिला हॉकी में वंदना की हैट्रिक, भारत ने द. अफ्रीका को 4-3 से हराया, जानिये अब आगे का सफर किस पर निर्भर

मार्मिक कहानी कफन

वहीं कफन भी काफी मार्मिक कहानी है. इसमें घीसू और माधव जैसे कामचोर और आलसी बाप -बेटे हैं. ये किस तरह माधव की पत्नी को प्रसव पीड़ा से मरने के लिए यूं ही छोड़ देते हैं इसकी दुख भरी दास्तां है. ये इतने बेगैरत हैं कि कफन के पैसे मांगकर लाते हैं और उसे दारू और खाने-पीने में उड़ा देते हैं.

वहीं पूस की रात, पंच परमेश्वर, ईदगाह जैसी दर्जनों यादगार कहानियां प्रेमचंद ने रची. मानसरोवर उनकी अनमोल कहानियों का संग्रह है.

प्रेमचंद ने एक से बढ़कर एक उपन्यास भी लिखें है . सेवासदन 1918, प्रेमाश्रम1922, रंगभूमि 1925,निर्मला, कायाकल्प 1927, गबन 1928,कर्मभूमि 1932, गोदान 1936 तथा मंगलसूत्र (अपूर्ण). मंगलसूत्र को उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया था.

इसे भी पढ़ें :पटना कॉलेज की खाते से निकाले गये 62.80 लाख रुपए, अकाउंटेंट सस्पेंड

ग्रामीण भारत का महाकाव्य गोदान

इनमें से गोदान को भारतीय हिंदी उपन्यास का सबसे अनमोल रत्न माना जा सकता है. यह ब्रिटिशकालीन तत्कालीन भारतीय समाज का आइना है. खासकर ग्रामीण भारत का तो यह महाकाव्य है. होरी, गोबर, धनिया और मेहता-मालती ऐसे यादगार पात्र हैं जिन्हें हिंदी साहित्य में थोड़ी भी रूचि रखनेवाला व्यक्ति ताउम्र याद रखेगा.

हमारे कृषि प्रधान देश के गांवों में बसनेवाले लोगों का इतना वास्तविक और विस्तृत वर्णन शायद हिंदी के किसी अन्य उपन्यास में नहीं है. गोदान एक साधारण से खेतीहर होरी के परिवार के जीने की जद्दोजहद की मार्मिक कहानी है.

इनकी कहानी के बहाने ग्रामीण भारतीय समाज का मुक्कमल रेखाचित्र प्रेमचंद खिंच देते हैं. गोदान में गांव के साथ-साथ शहरी भारत की कहानी भी समानांतर ढंग से चलती है और कहीं-कहीं ये दोनों थोड़ी बहुंत आपस में मिलती हुई भी चलती हैं. गोदान की भाषा भी मिट्टी से जुड़ी है. इस उपन्यास की अपील भी काफी व्यापक है. इसलिए ही इसे कालजयी रचना माना जाता है.

इसे भी पढ़ें :नाटक में भगत सिंह की फांसी के सीन की रिहर्सल करते समय फंदा कसा, बच्चे की मौत

ऐसे जुड़ा मुंशी नाम

प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य की सबसे प्रसिद्ध पत्रिकाओं में शुमार हंस शुरू की थी. इसमें उनका साथ दे रहे थे केएम मुंशी. प्रेमचंद औऱ केएम मुंशी की इस जुगलबंदी को मुंशी प्रेमचंद लिखा जाता है. इससे ही लोगों को कंफ्यूजन शुरू हुआ.

प्रेमचंद की पत्नी ने भी उनके बारे में लिखा है लेकिन उन्होंने भी मुंशी प्रेमचंद नाम का जिक्र नहीं किया है.
स्केच : प्रभात ठाकुर, आर्ट डॉयरेक्टर, बॉलीवुड

इसे भी पढ़ें :पांच अंचल निरीक्षक सह कानूनगो का तबादला

Related Articles

Back to top button