
Amit Jha
Ranchi: राज्य में पारंपरिक खेलों को प्रोत्साहन देने की कवायद नये सिरे से शुरू हुई है. खेल कैलेंडर 2023-24 में इसके लिए पहल की गयी है. खासकर जनजातीय समाज में लोकप्रिय रहे पुराने और परंपरागत लोकप्रिय खेलों को इसमें शामिल किया गया है. असल में इसके पीछे सबसे बड़ी वजह केंद्र सरकार की खेलो इंडिया योजना है. खेलो इंडिया गेम्स के अंतर्गत अलग-अलग राज्यों में खेले जाने वाले ग्रामीण स्वदेशी खेलों को भी शामिल किया जा रहा है.
झारखंड में 5 अक्टूबर से 12 अक्टूबर के बीच इसके लिए स्पेशल स्पोर्ट्स इवेंट्स होंगे. अभी पहले चरण में गुलेल के अलावे तीरंदाजी, मटका दौड़, गेड़ी दौड़, भारा दौड़ और सेकोर जैसे 6 विशेष खेलों के लिए ग्रामीण तथा स्वदेशीय जनजातीय खेल प्रतियोगिता का आयोजन होगा. इसके अलावे भविष्य में अन्य पारंपरिक खेलों को भी शामिल किए जाने की योजना है. इस संबंध में खेल निदेशालय, झारखंड के स्तर से सभी जिलों के जिला खेल पदाधिकारी को सूचना दी गयी है.
जनजातीय खेल प्रतियोगिता के लिए यह होगी तैयारी
खेल निदेशालय के मुताबिक आदिवासी एवं ग्रामीण स्तरीय खेल का विकास योजना पर सरकार का ध्यान है. इसके जरिये गांवों में फेमस तथा स्वदेशी जनजातीय खेलों को प्रोत्साहित किया जाना है. इसके लिए ग्रामीण तथा स्वदेशी जनजातीय खेल प्रतियोगिता का आयोजन होगा. खेल कैलेंडर के मुताबिक जिला स्तर पर 5 अक्टूबर से 7 अक्टूबर के बीच किसी एक डेट में एक दिवसीय आयोजन निर्धारित 6 खेलों के लिए होना है. संबंधित जिले के किसी स्थान पर इसका आयोजन होगा जिसे जिला खेल पदाधिकारी तय करेंगे. इसके लिए एक लाख रुपये (प्रति जिला) तय किया गया है.
इसके अलावा प्रमंडल स्तर पर 9 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक पांचों प्रमंडलों (कोल्हान-चाईबासा, पलामू-पलामू, उ छोटानागपुर-हजारीबाग, द छोटानागपुर-रांची और संथाल परगना-दुमका) में स्वदेशी जनजातीय खेल प्रतियोगिता का आयोजन होना तय है. इस आयोजन के लिए सभी प्रमंडलों को 5 लाख रुपये की मदद दी जायेगी. हालांकि प्रमंडल स्तर के बाद राज्य स्तरीय आयोजन के लिए अभी तिथि तय नहीं की गयी है.
जानें इन पारंपरिक खेलों की बुनियादी बातों को
झारखंड में तीरंदाजी (व्यक्तिगत खेल स्पर्धा) लोकप्रिय खेलों में शामिल रहा है. यहां के एससी एवं एसटी बहुल एरिया में इसे खूब पसंद किया जाता है. इसमें बांस का धनुष और लोहे के फल वाले बाण का उपयोग होता है.
गुलेल (व्यक्तिगत खेल स्पर्धा) द्विभागी लकड़ी के टुकड़े को काटकर ट्यूब रबर द्वारा तैयार किया जाता है. इससे गोली, कंचे के द्वारा निशाना लगाया जाता है. मटका दौड़ (व्यक्तिगत खेल स्पर्धा) में सिर पर मटका (पानी, दूध के साथ) ले जाने का रोमांचक आनंद देखने को मिलता है. यह जनजातियों की स्वाभाविक गतिविधियों में भी शामिल है.

बरसात में गांवों के कीचड़ भरे रास्ते से निकलने के उद्देश्य से बांस की गेड़ी बनाकर उसका प्रयोग किया जाता है. कालांतर में हरेली (हरियाली) त्योहार के समय गेड़ी चढ़ने की परंपरा शुरू हुई. ऐसे में गेड़ी दौड़ (व्यक्तिगत खेल स्पर्धा) का भी अपना रोमांच है.
धान की फसल कटने के बाद कांवर के दोनों तरफ धान का गट्ठा खेत से घर पहुंचाने के दौरान युवा वर्ग आपस में जल्दी पहुंचने का खेल करते हैं. भारा दौड़ (व्यक्तिगत खेल स्पर्धा) के खेल-खेल में यह महत्वपूर्ण कार्य आनंद के साथ संपन्न हो जाता है.
सेकोर खेल झारखंड के कोल्हान क्षेत्र के हो जनजातियों का एक पारंपरिक खेल है. यह खेल पारंपरिक रुप से गर्मी के महीनों (अप्रैल से जून) में खेला जाता है. ऐसी मान्यता है कि सेकोर खेल से बारिश के देवता प्रसन्न होते हैं. इससे बारिश होती है.




