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दर्द-ए-पारा शिक्षक: उधार बढ़ने लगा तो बेटों ने पढ़ाई छोड़कर शुरू की मजदूरी, खुद भी सब्जियां बेच निकाल रहे खर्च

इंटर तक पढ़ी हैं दो बेटियां, मानदेय नहीं मिलने के कारण आगे नहीं पढ़ा पा रहे

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Ranchi : एक शिक्षक और पारा शिक्षक दोनों काम एक ही करते हैं. लेकिन जहां बात जीवन स्तर की आती है, तो दोनों में काफी अंतर पाया जाता है. किसी भी शिक्षक के लिए ये काफी शर्म की बात होगी, अगर उनके आईटीआई पास बेटे मजदूरी करें. सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अपने बच्चों को इतने पैसे नहीं दे पा रहे हों, ताकि बच्चे फॉर्म भरें. ये स्थिति है अनगढ़ा ब्लॉक के टाटीसिंगारी गांव में पारा शिक्षक भोलानाथ बेदिया की. राज्यकीयकृत मध्य विद्यालय टाटीसिंगारी में ये बच्चों को पढ़ाते हैं. इनके परिवार में इनकी पत्नी के साथ दो बेटे और दो बेटियां है.

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भोलानाथ ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए कहा कि अपने दो बेटों को आईटीआई कराया है. वो भी बेटों ने खुद मजदूरी करके आईटीआई पास किया. अभी भी दोनों बेटे रांची में मजदूरी करते हैं. भोलानाथ ने बताया कि बेटे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तो करते हैं. लेकिन बच्चे फॉर्म नहीं भर पाते और न ही परीक्षा दे पाते हैं.

साथ ही बताया कि हजारीबाग में कोल माइंस में बड़े बेटे ने परीक्षा पास कर ली थी. पैसे के अभाव में समय पर नहीं पहुंच पाये और नौकरी नहीं लगी. ऐसे में दोनों बेटे रांची में किराये के मकान में रहते हैं. मात्र 600 रूपये प्रतिमाह किराया है, लेकिन एक साल तक वो किराया नहीं देने के बाद बच्चों को मजदूरी करना पड़ा. जो अब तक कर रहे हैं. अभी भी पांच हजार रूपये किराया बकाया है.

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कटहल, आम, बकरी बेचकर घर चलाते हैं

भोलानाथ का कहना है कि फरवरी से मानदेय बंद होने की वजह से वे भी गांव में ही मजदूरी करते हैं. क्योंकि दूर जाना उनके लिए संभव नहीं है. इसके बारे में इन्होंने बताया कि घर चलाना काफी मुश्किल है. फरवरी से मानदेय बंद होने के दौरान इन्होंने कटहल, आम, पपीता बेचा. इन्होंने बताया कि कई बकरी भी बेचे हैं. लेकिन फरवरी से मानदेय बंद होने के बाद से अब तक बकरी नहीं बेचे हैं. क्योंकि इस दौरान कटहल बेचकर काम चल जा रहा था.

इन्होंने बताया कि इनके उपर कर्ज अधिक है. वहीं मानदेय रोक दिया जा रहा है. थोड़ी बहुत खेती करते हैं, लेकिन वो भी इतना नहीं होता कि उससे सालभर काम चल जाए. जिससे काफी मुश्किल होता है. इन्होंने बताया कि छह सौ रूपये किराया नहीं भर पा रहे बच्चों का. बच्चे मजदूरी करके जो कमाते हैं, वो हमें भी भेजते हैं. जिससे सहयोग मिलता है. बातचीत के दौरान इन्होंने कहा कि पिछले पांच माह से गैस सिलेंडर नहीं भरवाया है. गांव में घर है तो लकड़ी से काम चल जाता है.

उम्मीद थी बच्चों को पढ़ायेंगे, लेकिन दो बेटियों को नहीं पढ़ा पा रहे

उन्होंने कहा कि बहुत उम्मीद थी कि सभी बच्चों को पढ़ाएं. बच्चों को कई बार कहा भी कि मजदूरी करना भी पड़े तो करेंगे, लेकिन सभी बच्चों को पढ़ाएंगे. लेकिन मानेदय नहीं मिलने की वजह से   स्थिति ऐसी हो गयी है कि बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि बहुत अफसोस होता है, जब बच्चों को मजदूरी करते देखते हैं. अब तो उम्र भी इतनी नहीं रही कि कोई दूसरा काम करें.

भोलानाथ ने कहा कि रिटार्यमेंट तक पहुंच गये हैं. जब पारा शिक्षक की नौकरी पकड़े थे, तो उम्मीद थी कि अपने बच्चों को अधिक से अधिक पढ़ांएगे, जो कोर्स बच्चे चाहें कराएंगे. उन्होंने बताया कि अपनी बेटियों को इन्होंने इंटर तक पढ़ाया है. इसके आगे ये बेटियों को नहीं पढ़ा पा रहे हैं. जबकि एक बेटी नर्सिंग करना चाहती थी जो पैसे की कमी के कारण से नहीं करा पाएं.

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पहले अधिक सम्मान मिलता था गांव में

गांव में मिलने वाले सम्मान की बात करते हुए इन्होंने कहा कि साल 2003 में जब पारा शिक्षक के लिए चयनित हुए थे. तब गांव में अधिक सम्मान मिलता था. तब और अब की स्थिति में काफी अंतर है. लोग शिक्षक के रूप में सम्मान दिया करते थे. वहीं सरकार की ओर से मानदेय भी समय में ही मिलता था. कम ही था, लेकिन समय पर मिल जाता था.

इन्होंने बताया कि घर की जरूरतें पूरी हो जाती थीं. इतना कर्ज भी नहीं रहता था कि लोग जाने की हम उधार में राशन लेते हैं. लेकिन अब तो हमेशा मानदेय रोक दिया जा रहा है. चार-पांच माह का मानदेय रोककर एक माह का मानदेय दिया जा रहा है. पहले महंगाई भी अधिक नहीं थी. अब तो पैसा बढ़ा दिया गया है और पैसा मिलता भी नहीं. साल 2016 से ऐसी ही स्थिति है.

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बच्चें पढ़ें ये सोचते हैं मगर खाली पेट में कितना करें

नम आंखों से इन्होंने कहा कि पारा शिक्षकों और उनके परिवार की स्थिति काफी दयनीय हो चली है. अपने बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि चाहते हैं कि गांव के बच्चे पढ़ें और इसके लिए मेहनत भी करते हैं. लेकिन पेट में अनाज रहे तब तो. खाली पेट में कितना बच्चों को पढ़ाएं.

उन्होंने बताया कि टाटीसिंगारी जनजातिय बहुल इलाका है. जहां जनजातियों की संख्या ज्यादा है. ऐसे में जरूरी है कि ऐसे इलाकों में बच्चों को सही शिक्षा मिलें. जरूरी है कि शिक्षक भी संतुष्ट रहें, तभी ये संभव है. जब सुदूर गांवों की स्थिति ऐसी होगी तो अन्य इलाकों की स्थिति कैसी रहेगी.

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