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दर्द-ए-पारा शिक्षक: कर्ज बढ़ा तो पत्नी ने कौशल विकास के तहत कर ली नौकरी, मगर उस काम से  महुआ चुनना बेहतर

Ranchi : कौशल विकास योजना में मिली नौकरी से अच्छा है कि जंगल के वनोत्पादों पर निर्भर रहें. पत्नी को नौकरी करने के लिए  योजना के तहत भेज तो दिया, लेकिन वेतन इतना कम कि, एक आदमी का भी गुजारा न हो. पारा शिक्षक की नौकरी का भी हाल कुछ ऐसा ही है. किसी भी परिस्थिति में जी नहीं सकते. ये कहना है पारा शिक्षक बंधु सिंह मुंडा का. जो 2009 से पारा शिक्षक की नौकरी कर रहे हैं. ये गवर्मेंट अपग्रेडेड मिडिल स्कूल ककड़ा में कार्यरत हैं. पारा शिक्षक की नौकरी से परेशान होकर पिछले साल बंधु और इनकी पत्नी ने तय किया कि दोनों अब कोई दूसरी नौकरी करेंगे.

इसके लिए बंधु ने पत्नी को कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षण का फॉर्म भी भरवाया. जिसके बाद इन्हें तीन माह का प्रशिक्षण रांची में दिया गया. इसकी जानकारी देते हुए बंधु ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद इनकी पत्नी का चयन गुजरात के वेल्सपन कंपनी में सुपरवाइजर की नौकरी में  हुआ.  इनकी पत्नी ने बताया कि वेतन 7,500 था. जिसमें से काटकर 4,500 मिलता था. इतने पैसे में ही घर में भेजना और अपना भी खर्च चलाना मुश्किल था. तो नौकरी छोड़ दी.

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बीज चुनकर चलता है घर, हंसते हैं लोग

इन्होंने बताया कि स्कूल से समय मिलने पर ये जंगल में जाकर पिहर पिठोर, करंज आदि के बीज चुनते हैं. जिन्हें बेचने पर स्थानीय बाजार में अच्छी कीमत मिलती है. वहीं पिहर पिठोर के प्रति किलो 60 रूपये मिलते हैं. जिससे काफी सहारा है. सिर्फ घर में अनाज उग जाने से नहीं होता. सब कुछ कैसे भी चल सकता है. लेकिन खाली पेट कभी नहीं रहा जा सकता. इन बीजों को बेचकर ही घर की जरूरतें पूरी होती हैं.

इन्होंने बताया कि महुआ के पांच पेड़ हैं. इन पेड़ों से बीज चुनकर ही गर्मी छुट्टी में गुजारा हो रहा था. इसे बेचकर प्रति किलो 20 से 25 रूपये की कमायी हो जाती है. आंखें नम करते हुए बंधु ने कहा कि पेट के कारण सब कुछ करना पड़ता है. लोग तो हंसते हैं, लेकिन पेट की स्थिति किसको दिखायें. कभी-कभी समय नहीं मिलने पर परिवार वाले भी बीज चुनते हैं. तब तो और जगहंसाई होती है. पिछले साल की घटना बताते हुए इनकी पत्नी ने कहा कि साल 2018 में इनकी तीन महीने की बच्ची का इलाज के अभाव में देहांत हो गया. चूंकि पैसों का अभाव था तो इलाज नहीं करवा पाये.

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राशन दुकानदार को टालते रहते हैं

घर का जिक्र करते हुए बंधु ने बताया कि, पांच-पांच माह से मानदेय रोक दिया जाता है. ऐसे में परेशानी बढ़ जाती है. राशन दुकानदार को बार-बार जवाब देना पड़ता है. उधार चुकाने का जो समय दुकानदार को देकर आते हैं, उस समय तक पैसे दे नहीं पाते हैं. राशन कार्ड तो है, जिससे कुछ राशन मिलता है. बाकि खेती से कुछ धान होता है, जिसे बेचकर घर का कुछ खर्च निकल जाता है.

फरवरी से मानदेय रोक दिए जाने के दौरान तो धान भी बहुत बेचा क्योंकि दूसरा कोई चारा नहीं था. घर के उपरी खर्च चलाने के लिए उधार ही एक विकल्प है. चूंकि मानदेय समय से मिलता नहीं है. ज्यादा समय तक राशन दुकान का उधार नहीं चुकाने पर दुकानदार भी दस बातें बोलता है.

ऐसे में रिश्तेदारों से कर्ज लेकर उधार चुकाना पड़ता है. एक बच्चा है, जो स्कूल भी जाने लगा है. रीएडमिशन के बाद से बच्चे की फीस 900 रूपये बकाया है. जब भी ज्यादा जरूरत पड़ती है तो  महिला समिति से लोन लेते हैं.

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गैस चूल्हा तभी भराते हैं जब मानदेय मिलता है

गैस चूल्हा का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि जब मानेदय मिलता है, तभी गैस भरवाते हैं. ऐसे तो गैस भरा रहता है. गांव में रहते हैं इसलिए लकड़ियां मिल जाती हैं. फरवरी से मानदेय नहीं मिला तब तक चूल्हा बंद था. पिछले दिनों अप्रैल माह का मानदेय मिला तो इसी से गैस भराया.

बातचीत के दौरान इन्होंने कहा कि किसी को बताने में शर्म आती है कि पारा शिक्षक हैं. मेहमान आते है, तब भी थोड़ी परेशानी होती है, क्योंकि लोग सोचते हैं शिक्षक हैं. ऐसे में अस्त-व्यस्त घर देखकर लोग दस तरह की बातें करते हैं. लेकिन कौन समझे कि ऐसी स्थिति में रहना किसे पसंद है. परिवार में पत्नी और बेटे के साथ माता पिता भी हैं. सबका भरण पोषण करना है. ऐसे में काफी मुश्किल होता है घर चलाने में.

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सरकार का रवैया पारा शिक्षकों के लिए सही नहीं

अगर नियमित मानदेय मिले तो घर चलेगा. लेकिन जरूरतें ज्यादा हैं और हर जरूरत इतने कम मानदेय में पूरी नहीं हो सकती. इससे आगे बंधु ने कहा कि यदि मानदेय नियमित मिले तो थोड़ा बहुत करके परिवार चल जायेगा. लेकिन पिछले कुछ महीनों से तो एकदम परेशान हो गये हैं.

सरकार का रवैया वर्तमान में पारा शिक्षकों के लिये सही नहीं है. सरकार पारा शिक्षकों का बिलकुल दमन कर रही है. इन्होंने कहा कि सुदूर गांवों में पारा शिक्षक पढ़ाते हैं. कुछ पारा शिक्षक तो ऐसे भी हैं, जिन्हें अपने गांव से चार से दस किलोमीटर की दूरी तय करके स्कूल जाना होता है. जिससे वो  भी एक अलग परेशानी होती है. इससे आगे कहा कि मैं जिस स्कूल में हूं, वो तो गांव में ही है, जिससे थोड़ी राहत है.

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