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निगम में सारी खुदाई एक तरफ और साहेब के साले एक तरफ

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Ranchi: कहावत है सारी खुदाई एक तरफ और जोरू का भाई एक तरफ. लेकिन निगम में यह चरितार्थ भी हो रहा है. कहानी रांची नगर निगम की है. दरअसल हुआ कुछ ऐसा कि साहेब को मन मुताबिक पोस्टिंग नहीं मिलने की वजह से मजबूरन रांची नगर निगम में आना पड़ा. आते ही वो सरेंडर मोड में चले गए.

उन्होंने अपना सारा पावर अपने जूनियर अधिकारी को दे दिया. कहने को तो बड़े, लेकिन बड़प्पन जैसी कोई बात नहीं. खैर, समय ठीक ही बीत रहा था.

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बीच में ना जाने रिश्तेदारी कहां से आ गयी. बदकिस्मती कि साहब के चहेते साले भी उसी विभाग के अधिकारी. अब जब बात साले साहब की आती हो, तो आखिर कोई क्या करे.

दुनिया जानती है कि सभी धर्मों से ऊपर ससुराल का धर्म होता है. साले साहब की भी लॉटरी लगी. दिन-रात जीजाजी-जीजाजी करना गर्व की बात समझने लगे.

आखिर साहब के साले जो ठहरे

हुआ ऐसा कि निगम की एक व्यवस्था कायम करने में साले साहब खूब रुचि दिखाने लगे. अब साहब के साले को रोके तो कौन रोके. एक बड़े मीडिया हाउस ने उनकी कारस्तानी को आधा पन्ना छाप दिया.

लेकिन यह लिखा नहीं कि आखिर पूरे मामले में कारिस्तानी किसकी है. अब एक अखबार में छपने के बाद आखिर दूसरे अखबार वाले कैसे रुकते.

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लगा धड़ाधड़ छपने. मामला तूल पकड़ा. तूल पकड़ते ही जीजाजी गुस्सा हो गए. अब साले साहब किसी तरह मामले को मैनेज करने लगे. साले के प्रकोप में आकर पूरा निगम मामले पर मिट्टी डालने लगा.

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लेकिन मीडिया को मसाला मिल चुका था. छोड़ता भी क्यों. आखिरकार कार्रवाई हुई. गलत नहीं समझना है. कार्रवाई साले साहब पर नहीं हुई, बल्कि कुछ ऐसे लोगों पर हुई जिन्हें व्यवस्था से फायदा मिलना था.

यह बात जग-जाहिर हो गयी कि साले साहब ने ही सारा रायता फैलाया था. फिर भी उन्हें कुछ नहीं हुआ. होता भी कैसे आखिर साले साहब जो ठहरे.

अब साले साहब को फेयरवेल देने की है तैयारी

मामले ने इतनी गंध फैला दी थी, कि साहब नए-नए आइडिया पर काम करने लगे. साले साहब को घर बुलाते, खूब डांटते. लेकिन आखिर दीदी के सामने डांट भी कितना सकते थे.

तो एक आईडिया आया. क्यों नहीं साले साहब के फेयरवेल की व्यवस्था की जाए. सांप भी मर जाएगा और लाठी भी सलामत. अब इसकी तैयारी जोरों पर है.

इस बीच खबर आ रही है कि वो बाबा के दरबार में हाजिरी लगा सकते हैं. या कहीं और भी भेजा जा सकता है. लेकिन फेयरवल तय है. कर ले जो मीडिया को करना है.

और जब साहब नहीं कर पाए तो मीडिया क्या बिगाड़ लेगा. आखिर में फिर से एक बार वो कहावत यहां दोहराना मौजूं है कि सारी खुदाई एक तरफ और जोरू का भाई एक तरफ.

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