
Ranchi: राजधानी रांची में एक होटल में पंचायतीराज विभाग, झारखण्ड की ओर से राष्ट्रीय पेसा दिवस समारोह का आयोजन किया गया. इस दौरान राज्य के अलग अलग हिस्सों और अनुसूचित क्षेत्र से आये ग्राम प्रधानों (पारंपरिक) ने राज्य में अविलंब पेसा एक्ट को लागू करने की पुरजोर वकालत की. समारोह के दौरान प्रेस कॉन्फ्रेंस में विजय कुजूर, पंचानन सोरेन (पेसा एक्ट के लिए सुझाव प्रदाता), महादेव मुंडा, कलावती समेत टाना भगत समाज के प्रतिनिधियों ने राज्य में अबतक पेसा एक्ट लागू नहीं किए जाने पर निराशा जताई. विजय कुजूर ने कहा कि राज्य में पेसा नियमावली को लागू नहीं किए जाने से गांवों का विकास प्रभावित हो रहा है. तमाम सुझावों, सुधारों के बाद नियमावली तैयार है पर राज्य सरकार की उदासीनता से इसे धरातल पर नहीं उतारा जा सका है. ग्राम सभा के सचिव का चयन ग्राम सभा की अनुशंसा के आधार पर किए जाने समेत अन्य बिंदुओं पर सहमति बन चुकी है. अगर पेसा नियमावली को जल्द से जल्द लागू किया जाए तो पंचायतें आत्मनिर्भर बनेंगी. लघु माइंस (बालू वगैरह) पर गांव के नियंत्रण से इसकी लूट रूकेगी. राजस्व वृद्धि होगी. पारंपरिक न्याय व्यवस्था प्रभावी होगी और कोर्ट, थाना पर से भार कम होगा. केंद्र सरकार की पहल पर अगले वर्ष 2025 तक भी अगर पेसा को यहां प्रभावी बना दिया जाये तो झारखंड के हित में अच्छा होगा. विजय ने इस एक्ट को लागू किये जाने में बाधक बन रहे लोगों को सकारात्मक रवैया अपनाने, गंभीरता से इसका अध्ययन करने और पंचायतों के विकास में इसे धरातल पर उतारे जाने में सहयोग करने की भी सलाह दी.
बेरोजगारी, पलायन का समाधान संभव: पंचानन
पंचानन सोरेन ने कहा कि 1996 में ही देश में पेसा एक्ट बना. देश के 10 आदिवासी बहुल राज्यों में इसे लागू भी कर दिया गया है पल जल, जंगल, जमीन से पहचान रखने वाले झारखंड जैसे राज्य में ही इसे 28 सालों में भी लागू नहीं किया जाना चिन्ताजनक है. राज्य में पहले से एसपीटी- सीएनटी एक्ट वगैरह लागू है. इसे और प्रभावी बनाने में पेसा नियमावली बड़ी भूमिका निभा सकती है. यहां के जल, जंगल और दूसरे संसाधनों को बचाने में भी इस एक्ट का उपयोग सार्थक होगा. नियमावली को विधि विभाग, झारखण्ड से पारित किए जाने, हाईकोर्ट, राजभवन की पहल के बावजूद इसे यहां लागू नहीं किया जाना सवाल खड़े करता है. राज्य के 24 में से 13 जिले अनुसूचित क्षेत्र वाले जिले हैं. इनमें पेसा नियमावली को लागू कर दिए जाने से पारंपरिक ग्राम स्वशासन व्यवस्था प्रभावी होती. बेरोजगारी, पलायन का समाधान भी होता. महिलाओं को मंईयां सम्मान के जरिए 1000-1000 या 2500 रुपया दिया जाना उनकी आत्मनिर्भरता का ठोस जरिया नहीं हो सकता भले सरकार की मंशा अच्छी हो.
महादेव मुंडा ने कहा कि 24 दिसंबर 1996 को PESA अधिनियम लागू किया गया था. इसके बाद भारत सरकार द्वारा सभी दस पेसा राज्य को 24 दिसंबर के दिन पेसा दिवस मनाने का निदेश दिया गया. इसी आलोक में यहां राज्य भर से अलग अलग जनजाति समाज के प्रतिनिधि जुटे हैं.
केंद्र सरकार की भागीदारी
गौरतलब है कि झारखंड में राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन केंद्र की विशेष पहल पर हुआ. इसकी अध्यक्षता विवेक भारद्वाज, सचिव (पंचायती राज विभाग, भारत सरकार) ने की. इस दौरान पंचायती राज निदेशक, झारखण्ड निशा उरांव की भी मौजूदगी रही. सबों ने उम्मीद जताई कि जल्द ही झारखंड में भी पेसा एक्ट को लागू किया जायेगा. मध्य प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश से भी टीम ने इस कार्यशाला में भाग लिया. कार्यक्रम में राज्य के विभिन्न जनजातीय समाज मुंडा, उराँव, संथाली, हो, खड़िया तथा अन्य के प्रतिनिधियों ने अपने अपने पारंपरिक व्यवस्था (ग्राम सभा तथा पारंपरिक संरचना) पर प्रस्तुति दी. PESA पर पद्मश्री मुकुंद नायक के आवाज में तैयार PESA गीत को लॉन्च किया गया.



