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मैनहर्ट घोटाला-10: विधानसभा समिति ने रघुवर दास के संदिग्ध आचरण के बारे में नगर विकास विभाग को बताया, कार्रवाई का निर्देश दिया, जो अब तक नहीं हो पाया

Saryu Roy

कार्यान्वयन समिति की जांच-

मैनहर्ट की नियुक्ति में अनियमितता के आरोपों की जांच करने के लिए गठित विधानसभा की सात सदस्यीय विशेष जांच समिति के प्रतिवेदन की अनुशंसा के बारे में कार्यान्वयन समिति ने नगर विकास विभाग के सचिव से जानना चाहा कि विभाग ने इस अनुशंसा का क्रियान्वयन किस प्रकार किया है? सचिव ने बताया कि समिति की उपर्युक्त अनुशंसा के आलोक में कतिपय बिन्दुओं की तकनीकी समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय तकनीकी समिति गठित कर दी गयी. जांचोपरांत इस समिति ने प्रतिवेदन दिया और अपनी अनुशंसा में बताया कि रांची के सिवरेज ड्रेनेज निर्माण के लिये मैनहर्ट की नियुक्ति में कोई अनियमितता नहीं हुई है. उच्च स्तरीय तकनीकी समिति की यह अनुशंसा निम्नवत है –

Catalyst IAS
SIP abacus

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MDLM
Sanjeevani

‘‘उच्चस्तरीय तकनीकी समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि परामर्शी की नियुक्ति में विहित प्रक्रियाओं का अनुपालन हुआ है. पारदर्शिता अपनाते हुए सभी को इस कार्य में भाग लेने का अवसर दिया गया है. तकनीकी उपसमिति ने सभी प्रस्तावों को स्वतंत्र रूप से आरएफपी में निहित शर्तों एवं सभी निविदादाताओं का मूल्यांकन विहित प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए किया है. निगोसिएशन की प्रक्रिया भी पारदर्शी रही है तथा निविदा की दर भी कार्यभार एवं निर्धारित समय सीमा के आलोक में इकोनॉमिकल एवं व्यावहारिक प्रतीत होती है.’’ इसके बाद विभाग ने मैनहर्ट को कार्यादेश दे दिया. इसके लिए मंत्रिपरिषद की स्वीकृति प्राप्त की गयी. कार्यान्वयन समिति ने नगर विकास सचिव से जानने का प्रयास किया कि नगर विकास विभाग ने विशेष समिति की सहायता करने के लिए उसे कौन-कौन से कागजात उपलब्ध कराये. इस पर सचिव ने बताया कि विभाग ने विशेष समिति का पूरा सहयोग किया, समिति ने जो भी कागजात मांगें, उसे दिया गया. विभागीय सचिव ने कार्यान्वयन समिति के समक्ष मैनहर्ट नियुक्ति प्रकरण के संबंध में विभागीय प्रतिवेदन का एक सार संक्षेप प्रस्तुत किया. यही सार संक्षेप उनके द्वारा विधानसभा द्वारा गठित विशेष जांच समिति को भी दिया गया था. इसमें गौर करने लायक बात थी कि नगर विकास विभाग ने और विभाग के मंत्री ने विधानसभा से लेकर विधानसभा द्वारा गठित विशेष जांच समिति तक के सामने यही बताया था कि निविदा दो मुहरबंद लिफाफों में आमंत्रित की गयी थी. एक लिफाफा तकनीकी विवरण का था और दूसरा वित्तीय विवरण का था. उन्होंने बड़ी सफाई से एक महत्वपूर्ण तथ्य को छुपा लिया था कि परामर्शी चयन के लिए निविदा दो नहीं बल्कि तीन मुहरबंद लिफाफों में मांगी गयी थी. तीसरा लिफाफा योग्यता का था. नगर विकास विभाग के सचिव एवं अन्य अधिकारियों द्वारा कार्यान्वयन समिति के सामने और उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के सामने प्रस्तुत किये गये विषयवस्तु के सार संक्षेप में भी उन्होंने ऐसा ही किया था. सार संक्षेप का अध्ययन करने पर पाया गया कि इसमें भी यही कहा गया है कि निविदा दो मुहरबंद लिफाफों में मांगी गयी थी. एक लिफाफे में तकनीकी विवरण और दूसरे में वित्तीय विवरण. नगर विकास विभाग के स्वनामधन्य मंत्री श्री रघुवर दास ने भी विधानसभा में विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए यही कहा था कि निविदा दो मुहरबंद लिफाफों में मांगी गयी थी, एक में तकनीकी क्षमता के प्रमाण थे और दूसरे में वित्तीय भार का विवरण था. विधानसभा सचिवालय ने झारखंड विधानसभा में हुए वाद-विवाद को पुस्तक के रूप में छपवाया है. इसके भाग 32 के पृष्ठ 247 और 248 पर नगर विकास विभाग के तत्कालीन मंत्री श्री रघुवर दास के भाषण का यह अंश देखा जा सकता है जिसका उल्लेख इस पुस्तक के खण्ड-1 में किया गया है. नगर विकास विभाग ने पहले विधानसभा की विशेष जांच समिति के सामने और बाद में कार्यान्वयन समिति के सामने मैनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति संबंधी प्रतिवेदन का जो सार-संक्षेप भेजा था उसका प्रासंगिक अंश निम्नवत है :-

निविदा की प्रमुख शर्तें :-

  1. निविदा दो मुहरबंद लिफाफों (तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्तावों के लिए अलग अलग) में आमंत्रित की गयी.
  2. विश्व बैंक की मार्गनिर्देशिका के आधार पर दो लिफाफा पद्धति अपनाते हुए गुणवत्ता आधारित चयन (क्वालिटी बेस्ड सेलेक्शन) प्रक्रिया के अनुसार योजना कार्य कराने का निर्णय लिया गया. इस प्रक्रिया में तकनीकी रूप से सर्वोच्च अंक पाने वाले निविदादाता का ही वित्तीय बिड खोला जाता है तथा दर वार्ता करके शुल्क का अंतिम रूप से निर्णय होता है.
  3. तकनीकी उपसमिति के सभी सदस्यों द्वारा निविदा में उल्लेखित मानदंडों के आधार पर प्राप्त निविदाओं का मूल्यांकन करते हुए अंक दिया गया, जिसमें सर्वोच्च अंक मेसर्स मैनहर्ट सिंगापुर प्रा. लिमिटेड ने प्राप्त किया.
  4. मुख्य समिति ने उपसमिति की अनुशंसा को मानते हुए विभागीय मंत्री से परामर्शी चयन के द्वितीय चरण का कार्य करने की अनुमति प्राप्त की.

कहावत है कि एक झूठ को सौ बार दुहराइये तो लोग उसे सच मानने लगते हैं. हिटलर के प्रचार मंत्री गोयेबल्स ने यह कथन प्रतिपादित किया था. नगर विकास विभाग के तत्कालीन मंत्री से लेकर अधिकारीगण तक मैनहर्ट की अनियमित नियुक्ति के मामले में गोयेबल्स की इसी कहावत को चरितार्थ करने में जुटे थे. उन्हें पता था कि मैनहर्ट के चयन में उन्होंने गलती की है और यह गलती उनसे अनजाने में नहीं हुई है. यह गलती उन्होंने जान-बूझकर की है. यानी उन्होंने भ्रष्टाचार किया है. इसलिए वे इस मामले में पूरी तरह सजग थे. हर जगह जहां उन्हें गलती पकड़े जाने की आशंका थी, लिखित रूप में भी और मौखिक स्वीकृति में भी, उन्होंने गलती को छुपाने का भोंडा प्रयास किया. विधानसभा में मंत्री श्री रघुवर दास ने यही किया, विधान सभा की विशेष जांच समिति के सामने नगर विकास विभाग ने यही किया, विधान सभा की विशेष जांच समिति की अनुशंसा के तकनीकी बिन्दुओं की जांच के लिए गठित उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के सामने भी इन्होंने यही किया. अब इसी झूठ को वे कार्यान्वयन समिति के सामने भी परोस रहे थे. उनकी कोशिश थी कि कार्यान्वयन समिति भी भ्रमित हो जाय और यह झूठ पचा ले, उनके भ्रष्ट कुकृत्य पर सवाल नहीं उठाये. जनता का विश्वास जीत कर सदन का सदस्य बनने वाले अधिकांश जनप्रतिनिधियों के साथ यही विडम्बना है कि कागजातों के अध्ययन और विश्लेषण के बारे में वे नौकरशाही पर निर्भर हो जाते हैं. उनके सामने जो बातें लिखित या मौखिक रूप में रखी जाती हैं, उनकी विवेचना अपने स्तर से करने और विषयवस्तु की तह तक पहुंचने के लिए उसमें से क्या ग्रहण करने लायक है और क्या छोड़ देने लायक है, इसकी मीमांसा करने में समय लगाने के प्रति वे तत्पर नहीं रहते हैं. इसका जिम्मा वे बुद्धिमान अधिकारियों पर छोड़ देते हैं. जो जनप्रतिनिधि ऐसा नहीं करते, उन्हें नुक्ताचीनी करनेवाला, बाल की खाल निकालने वाला, मीन-मेख निकालने वाला कहा जाता है.पार्टियों का नेतृत्व भी ऐन मौके पर उनसे हिसाब-किताब चुकता कर लेता है. कोशिश होती है कि वे फिर से सदन का मुंह नहीं देखें और जनता की कृपा से चुनकर आ भी गये तो उन्हें सरकार में, समितियों में, वाद-विवाद में शामिल होने का मौका नहीं मिले. मैनहर्ट परामर्शी नियुक्ति प्रकरण इस मामले में एक यादगार वृतांत है. कार्यान्वयन समिति के साथ हुई बैठकों में नगर विकास विभाग के अधिकारियों के साथ हुई वार्ता और उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकला कि इनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में विरोधाभास और झूठ है. इन्होंने तथ्य के साथ घालमेल किया है. इनकी टालमटोल की प्रवृति को देखते हुए समिति ने इस विषय में एक अलग प्रतिवेदन देने का निर्णय किया. इस बारे में माननीय सभा अध्यक्ष से वार्ता हुई, संसदीय मामलों में संदर्भ ग्रंथ के रूप में राष्ट्र स्तर पर मान्य ‘‘कॉल एंड शकधर‘‘ लिखित पुस्तक ‘‘संसदीय पद्धति एवं प्रक्रिया‘‘ का प्रासंगिक संदर्भ लिया गया और तय हुआ कि समिति इस मामले में एक अलग प्रतिवेदन देगी तथा निविदा मूल्यांकन के लिए गठित तकनीकी उपसमिति और उच्चस्तरीय समिति के सदस्यों को बुलाकर जानकारी हासिल करेगी. इस संदर्भ में ‘‘कॉल एंड शकधर’’ के संदर्भ ग्रंथ ‘‘संसदीय पद्धति एवं प्रक्रिया’’ का प्रासंगिक अंश निम्नवत है :-

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विशेष प्रतिवेदन देने की शक्ति :

‘‘समिति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि वह ठीक समझे, तो किसी ऐसे विषय पर, जो उसके कार्य के दौरान उत्पन्न हो या प्रकाश में आये और जिसे समिति अध्यक्ष या सभा, यथास्थिति के ध्यान में लाना आवश्यक समझे, विशेष प्रतिवदेन दे सकती है, चाहे ऐसा विषय समिति के निदेश मदों से प्रत्यक्षतया संबंधित न हो अथवा उसके अंतर्गत नहीं आता हो या उनसे आनुषंगिक नहीं हो.’’ कार्यान्वयन समिति ने 4 अगस्त, 2006 को तकनीकी उपसमिति और उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के सदस्यों को तलब किया. इसके प्रतिक्रिया स्वरुप नगर विकास विभाग के मंत्री श्री रघुवर दास ने एक पत्र विधानसभा अध्यक्ष को लिखा, जिस पर विमर्श करने का निर्देश सभा अध्यक्ष ने कार्यान्वयन समिति के सभापति को दिया. सभाध्यक्ष के साथ विमर्श हुआ. 4 अगस्त 2006 को बुलायी गयी बैठक यथावत रही. माननीय सभा अध्यक्ष ने बैठक करने की अनुमति दी. परंतु दोनों समितियों के सदस्य इस बैठक में उपस्थित नहीं हुए. समिति ने इस बैठक से सदस्यों की अनुपस्थिति और मंत्री श्री रघुवर दास द्वारा माननीय सभा अध्यक्ष को लिखे गये पत्र पर विचार किया. नगर विकास मंत्री श्री रघुवर दास ने कार्यान्वयन समिति द्वारा तकनीकी उपसमिति और उच्चस्तरीय समिति के सदस्यों को बुलाने का विरोध किया. उन्होंने माननीय विधानसभा अध्यक्ष को जो पत्र लिखा था, वह अर्द्ध सरकारी पत्र सं.- 1285 हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है :-

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

  1. गत सत्र में रांची में समेकित सिवरेज-ड्रेनेज के निर्माण हेतु परामर्शी चयन के मामले की जांच करने के संबंध में कुछ माननीय सदस्यों की मांग पर आपके द्वारा विधान सभा की विशेष समिति का गठन किया गया. विशेष समिति का जांच प्रतिवेदन प्राप्त होने पर नगर विकास विभाग द्वारा तदनुसार कार्रवाई करते हुए उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का गठन कर तकनीकी बिन्दुओं की जांच करायी गयी. तकनीकी समिति का जांच प्रतिवेदन कैबिनेट द्वारा अनुमोदन होने के पश्चात परामर्शी का चयन किया गया और रांची नगर निगम द्वारा चयनित परामर्शी को कार्यादेश निर्गत किया गया. परामर्शी द्वारा कार्य भी प्रारंभ कर दिया गया है.
  2. विधान सभा की क्रियान्वयन समिति द्वारा विशेष समिति की अनुशंसा के क्रियान्वयन को लेकर कई बैठकें की गयी हैं. नगर विकास विभाग द्वारा क्रियान्वयन समिति को विशेष समिति की अनुशंसा के क्रियान्वयन की लिखित सूचना दे दी गयी है तथा उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का जांच प्रतिवेदन भी उपलब्ध करा दिया गया है. मैं समझता हूं कि क्रियान्वयन समिति को अब नगर विकास विभाग से प्रासंगिक मामले में और किसी सूचना की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए.
  3. क्रियान्वयन समिति द्वारा दिनांक 4.8.2006 को पुन: निविदा की तकनीकी मूल्यांकन के लिए गठित तकनीकी समिति एवं विशेष समिति की अनुशंसा के आलोक में तकनीकी बिन्दुओं की जांच के लिए गठित कमिटि के सदस्यों को अलग-अलग समय पर बुलाया गया है. मैं समझता हूं कि समिति को अब तकनीकी समिति के सदस्यों को बुलाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि विभाग द्वारा विशेष समिति की अनुशंसाओं को क्रियान्वित कर दिया गया है. मेरी जानकारी के अनुसार क्रियान्वयन समिति का कार्यक्षेत्र विधानसभा की समितियों द्वारा की गयी अनुशंसाओं को संबंधित विभागों द्वारा क्रियान्वयन कराने का है.
  4. कार्य करने वाले पदाधिकारियों द्वारा कार्य के दौरान मानवीय भूल भी हो सकती है और बार-बार अनावश्यक रूप से समिति के समक्ष उपस्थित होने पर उनमें कार्य के प्रति अभिरूचि कम हो जाती है. प्राय: सभी पदाधिकारियों द्वारा भी व्यक्तिगत रूप से मेरे समक्ष इस बात की चिन्ता व्यक्त की गयी है.
  5. उपरोक्त तथ्यों के आलोक में मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि इस संबंध में आवश्यक मार्गनिर्देशन देने की कृपा की जाय.

सादर,

आपका

रघुवर दास, 01.08.2006

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सेवा में,

श्री इन्दर सिंह नामधारी

अध्यक्ष, झारखण्ड विधान सभा.

मंत्री श्री रघुवर दास के इस पत्र पर कार्यान्वयन समिति ने गहराई से मंथन किया और इस पर अपने मंतव्य से माननीय सभा अध्यक्ष को अवगत कराया, जो निम्नवत है :-

‘‘माननीय मंत्री, नगर विकास विभाग का एक पत्र, जो माननीय सभाध्यक्ष को लिखा गया है, उसे माननीय सभा अध्यक्ष द्वारा सभापति, कार्यान्वयन समिति को विमर्श के लिए भेजा गया. यह पत्र संचिका में रखा गया है. इस पत्र पर माननीय सभा अध्यक्ष से विमर्श हुआ. इस पत्र में माननीय मंत्री, नगर विकास विभाग का यह कहना है कि कार्यान्वयन समिति को विशेष समिति की अनुशंसा के क्रियान्वयन के बारे में विभाग द्वारा लिखित सूचना दे दी गयी है तथा उच्चस्तरीय तकनीकी समिति की जांच प्रतिवेदन भी उपलब्ध करा दिया गया है. समिति को इस प्रासंगिक मामले में नगर विकास विभाग से और किसी सूचना की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए. अपने पत्र के कंडिका-3 में माननीय मंत्री ने कहा है कि कार्यान्वयन समिति का कार्य क्षेत्र विधानसभा की समितियों द्वारा की गयी अनुशंसाओं का संबंधित विभागों द्वारा क्रियान्वयन कराने का है. इसलिए समिति को मैनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति के संबंध में गठित तकनीकी उपसमिति एवं उच्च स्तरीय समिति के सदस्यों को बुलाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए. आगे उन्होंने कंडिका-4 में कहा है कि कार्य करनेवाले पदाधिकारियों द्वारा कार्य के दौरान मानवीय भूल भी हो सकती है और बार-बार शारीरिक रूप से समिति के समक्ष उपस्थित होने पर उनकी कार्य के प्रति रुचि कम हो जाती है. संबंधित सभी पदाधिकारियों ने व्यक्तिगत रूप से मेरे समक्ष इस बात की चिन्ता व्यक्त की है. अध्यक्ष महोदय, ‘‘कार्यान्वयन समिति के कार्य क्षेत्र के बारे में समिति पूरी तरह अवगत है और अभी तक कार्य क्षेत्र के अंतर्गत ही अपनी कार्यवाही का संचालन करती रही है. विगत् 28 जुलाई, 2006 को हुई समिति की बैठक में यह स्पष्ट किया गया है कि विधान सभा की विशेष जांच समिति की अनुशंसा क्या है. इस अनुशंसा में निहित तकनीकी पहलुओं की जांच कराने के बाद ही आगे की कार्यवाही करने की बात कही गयी है. चूंकि तकनीकी पहलुओं की जांच के नतीजे पर ही आगे की कार्रवाई निर्भर करती है, इसलिए समिति निविदा मूल्यांकन करने वाली तकनीकी उपसमिति के सदस्यों से उनके मूल्यांकन के तरीके ओर निष्कर्ष के बारे में और विभाग द्वारा उन्हें उपलब्ध कराये गये दस्तावेजों के बारे में जानकारी चाहती है. वैसे विधानसभा की किसी भी समिति को यह अधिकार प्राप्त है कि अपनी कार्यवाही के दौरान अगर कोई ऐसा विषय आता है जिसका संबंध प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रासंगिक विषय से है तो समिति इस संबंध में अलग प्रतिवेदन दे सकती है. विगत 28 जुलाई 2006 की बैठक में समिति ने इस विषय पर अध्यक्ष महोदय से भी मार्गदर्शन की अपेक्षा की है. जहां तक कार्य करने वाले पदाधिकारियों द्वारा कार्य के दौरान मानवीय भूल करने की बात है, समिति यह स्पष्ट करना चाहती है कि समिति ने मैनहर्ट परामर्शी के योग्य नहीं होने के संबंध में उपलब्ध तथ्यों को विभाग और सभा अध्यक्ष के समक्ष रखा है. इन्हें मानवीय भूल के रूप में लेना सही नहीं है. या तो तकनीकी पदाधिकारियों ने जान-बूझकर तथ्यों की अनदेखी की है अथवा नगर विकास विभाग ने तकनीकी समितियों के समक्ष सम्पूर्ण तथ्यों को प्रस्तुत नहीं किया है. विधानसभा की विशेष जांच समिति के समक्ष नगर विकास विभाग द्वारा उपलब्ध कराये गये प्रतिवेदन में कहा गया है कि निविदा केवल दो मुहरबंद लिफाफों में आमंत्रित की गयी थी, एक तकनीकी और दूसरा वित्तीय. जबकि निविदा प्रपत्र के दस्तावेज में स्पष्ट रूप से अंकित है कि निविदा प्रस्ताव तीन मुहरबंद लिफाफों में प्रस्तुत किया जायेगा. पहले मुहरबंद लिफाफे में निविदादाताओं की योग्यता अंकित रहेगी. योग्यता के किसी भी मापदंड पर अगर निविदादाता का प्रस्ताव खरा नहीं उतरता है तो उसे आगे के किसी भी मूल्यांकन में शामिल नहीं किया जायेगा. इस तथ्य को नगर विकास विभाग ने विधानसभा की विशेष जांच समिति के समक्ष रखे गये विवरण में ओझल कर दिया है, जिसके कारण विधानसभा की विशेष जांच समिति किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचने में कामयाब नहीं हो सकी. नतीजतन, समिति ने अनुशंसा की है कि कतिपय तकनीकी पहलुओं की जांच आवश्यक प्रतीत होती है. इसलिए तकनीकी पहलुओं की जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाय. माननीय सभा अध्यक्ष को लिखे गये पत्र में माननीय नगर विकास मंत्री द्वारा यह कहा जाना उचित नहीं है कि बार-बार अनावश्यक रूप से समिति के समक्ष पदाधिकारियों को उपस्थित होने के लिए कहा जाता है. कार्यान्वयन समिति द्वारा केवल एक बार नगर विकास विभाग के सचिव को उपस्थित होकर समिति के सामने वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने के लिए कहा गया था. इसके बाद दूसरी बार समिति ने आज तकनीकी उपसमिति और मुख्य समिति दोनों समितियों के सदस्यों को उपस्थित होकर निविदा मूल्यांकन के बारे में समिति के सामने वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के लिए बुलाया था. ऐसी स्थिति में विभागीय पदाधिकारी अगर विधानसभा की समिति के समक्ष उपस्थित नहीं होते हैं और इस बारे में माननीय मंत्री के समक्ष अपनी चिंता व्यक्त करते हैं और माननीय मंत्री इस बारे में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखते हैं तो यह न केवल दुखद है, बल्कि ऐसे अधिकारियों की कर्तव्यपरायणता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है. कार्यान्वयन समिति के समक्ष जो तथ्य रखे गये हैं, वे उन्हीं कागजातों से मिले हैं, जिन्हें नगर विकास विभाग ने विधानसभा की विशेष जांच समिति के समक्ष प्रस्तुत किया था. इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि निविदा मूल्यांकन के लिए सरकार द्वारा गठित तकनीकी उप समिति और मुख्य समिति ने इन तथ्यों पर विचार नहीं किया है और उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के सामने सरकार द्वारा वे तथ्य नहीं रखे गये हैं, जिसके अनुसार मेनहर्ट परामर्शी को मूल्यांकन के आरम्भ में ही अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए था और उसके निविदा प्रस्ताव का आगे मूल्यांकन नहीं होना चाहिए था. आज की बैठक में दोनों तकनीकी समिति के सदस्यों के अनुपस्थित रहने के कारण उनका स्पष्टीकरण प्राप्त किये बिना भी समिति इस तथ्य को अंकित करा देना चाहती है. समिति माननीय अध्यक्ष महोदय से इस बारे में आवश्यक मार्गदर्शन चाहती है कि दोनों तकनीकी समिति के सदस्यों को कार्यान्वयन समिति के समक्ष कब बुलाया जाय ताकि समिति आगे की कार्रवाई कर सके. उपर्युक्त मंतव्य के साथ कार्यान्वयन समिति की संचिका माननीय विधान सभा अध्यक्ष के अवलोकनार्थ प्रेषित कर दी गयी. कार्यान्वयन समिति के इस मंतव्य पर सभाध्यक्ष का आदेश काफी दिनों तक नहीं आया. इस बीच झारखण्ड में सरकार बदल गयी. श्री अर्जुन मुंडा की जगह श्री मधु कोड़ा मुख्यमंत्री बन गये और श्री इंदर सिंह नामधारी की जगह श्री आलमगीर आलम विधानसभा के अध्यक्ष हो गये. इसके बाद संचिका 30 अक्टूबर 2006 को सभाध्यक्ष के यहां से कार्यान्वयन समिति के यहां लौटी. सभा अध्यक्ष के निदेशानुसार 17.11.2006 को पूर्वाह्न 11 बजे कार्यान्वयन समिति की बैठक में तकनीकी उपसमिति के सदस्यों को और 12 बजे उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के सदस्यों को बुलाया गया. ये समिति के प्रश्नों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके, अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर सके. समिति ने इनके संदिग्ध आचरण से नगर विकास विभाग को अवगत कराते हुए इनके विरुद्ध कार्रवाई करने का निर्देश दिया, जिसका पालन विभाग ने अबतक नहीं किया है. इसके बाद समिति ने वित्त विभाग के सचिव को भी बुलाया. वे मुख्य समिति के अध्यक्ष थे. किसी कारणवश वे नहीं आये. उनकी जगह वित्त विभाग के अपर आयुक्त, श्री अंजनी कुमार आये. समिति ने सभी विभागीय अधिकारियों से कहा कि आपको लगता है कि समिति के समक्ष दिये गये आपके वक्तव्य में कुछ छूट गया है या आपकी तरफ से अतिरिक्त तथ्य देना है तो आप लिखकर दे सकते हैं. इस बीच नवनिर्वाचित विधान सभा अध्यक्ष को भी श्री रघुवर दास, पूर्व मंत्री का एक पत्र प्राप्त हुआ. यह पत्र उन्होंने पूर्व मंत्री के रूप में भेजा था. इस पत्र की प्रति उन्होंने कार्यान्वयन समिति को भी भेजा था. यह पत्र हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है. इस पत्र में पूर्व मंत्री श्री दास ने कार्यान्वयन समिति पर मनगढ़ंत आरोप लगाया है.

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सेवा में,                                                                                                                                            रांची,12.12.2006    माननीय अध्यक्ष जी,

झारखण्ड विधान सभा, रांची .

महोदय,

दिनांक 12 दिसंबर, 2006 को रांची से प्रकाशित विभिन्न समाचार पत्रों में रांची नगर निगम क्षेत्र में सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण का परामर्शी मैनहर्ट को नियुक्त किये जाने में मेरे मंत्रित्वकाल में लिए गये कथित निर्णय को लेकर मेरे चरित्र-हनन का प्रयास विधानसभा की कार्यान्वयन समिति के हवाले से किया गया है. उल्लेखनीय है कि रांची नगर निगम क्षेत्र में सिवरेज ड्रेनेज निर्माण के लिए परामर्शी एजेंसी का चयन करने हेतु राज्य सरकार की तकनीकी समिति एवं उच्च स्तरीय समिति गठित थी, उसी की अनुशंसा के आलोक में मैनहर्ट को कार्य आवंटित किया गया था. तत्कालीन नगर विकास मंत्री की हैसियत से मैनहर्ट को निर्धारित लागत से लगभग तीस चालीस …….. रूपये* की लागत पर कार्य करने हेतु सहमत कराया था. जहां तक मैनहर्ट को काम दिये जाने की बात है, इस पर विधानसभा में काफी हो-हल्ला होने के फलस्वरूप विधानसभा की विशेष जांच समिति बनायी गयी थी, जिसने रिपोर्ट में किसी प्रकार की अनियमितता के तथ्य को प्रकाश में नहीं लाया. विशेष जांच समिति के प्रतिवेदन के बाद जब इसके कार्यान्वयन का जिम्मा विधानसभा की कार्यान्वयन समिति को सौंपा गया, तो समिति ने अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर मैनहर्ट को वर्णित कार्य आवंटन को ही गलत सिद्ध करने की कोशिश शुरू कर दी तथा मेरे कार्यकाल में विभाग द्वारा लिये गये निर्णय पर चरित्र हनन की राजनीति की शुरूआत की. वर्णित स्थितियों में आपसे अनुरोध है कि कार्यान्वयन समिति को प्रक्रिया के निर्धारित नियमों के अनुसरण में कार्य करने का निर्देश दिया जाये, साथ ही प्रेस वक्तव्यों के माध्यम से पूर्व में गठित विशेष समिति के सदस्यों को अयोग्य ठहराने तथा खुद को ही सर्वथा योग्य सिद्ध करने से बचने की सलाह दें. मैं यह भी उल्लेख करना चाहता हूं कि प्रक्रिया तथा कार्य संचालन के नियमों के आलोक में समिति की बैठकों की कार्यवाही गोपनीय मानी जाती है. अत: समिति के सदस्यों को यह निर्देश भी दिया जाना चाहिए कि वे अपने प्रतिवेदन देने के पूर्व बैठकों की कार्यवाही सार्वजनिक न करें.

* पत्र से हू-ब-हू उद्धृत है.

विश्वासभाजन

ह./-(रघुवर दास)

नगर विकास विभाग के तत्कालीन मंत्री श्री रघुवर दास द्वारा विधान सभा अध्यक्ष को कार्यान्वयन समिति के सभापति के विरुद्ध लिखा गया यह पत्र उनकी दोषी मनोवृति का द्योतक है. यह कार्यान्वयन समिति की जांच को प्रभावित करने का उनका हताशाजनक प्रयास है. उनके द्वारा विधान सभा में की गयी दम्भोक्ति-सांच को आंच क्या- की भावना के विपरीत है. कहावत है “Guilty mind is always suspicious.” दोषी मस्तिष्क हमेशा संदेहग्रस्त रहता है कि कहीं उसकी गलती पकड़ी न जाये. इस पत्र में उन्होंने दो बिन्दु उठाये हैं. एक कि कार्यान्वयन समिति अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर जांच कर रही है. उनके इस बिन्दु का उत्तर समिति ने उस समय दे दिया था, जब जांच बाधित करने लिए उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को 01.08.2006 को पत्र लिखा था. इस कारण जांच कुछ माह के लिए बाधित हो गयी थी. कार्यान्वयन समिति ने इस प्रसंग में अपने मंतव्य से माननीय सभा अध्यक्ष को अवगत करा दिया था. उनका दूसरा बिन्दु है कि विधानसभा की समितियों की कार्यवाही गोपनीय होती है. इस बारे में मैं पुन: ‘‘कॉल एंड शकधर’’के संदर्भ ग्रंथ ‘‘संसदीय पद्धति एवं प्रक्रिया’’ का उल्लेख करना चाहता हूं, जिसमें नियम 269(2) का हवाला देते हुए कहा गया है कि ‘‘यह समिति के स्वविवेक पर निर्भर होगा कि वह उसके सामने दिये गये किसी मौखिक या लिखित साक्ष्य को गोपनीय या गुप्त समझे. भले ही कोई साक्षी स्पष्ट रूप से यह इच्छा व्यक्त करे कि उसके साक्ष्य को गोपनीय समझा जाय, तो भी समिति इसके विरूद्ध फैसला कर सकती है.’’ पर यहां तो किसी साक्ष्य देनेवाले ने इस तरह का अनुरोध भी नहीं किया था. फिर श्री रघुवर दास को यह कैसे लगा कि इससे समिति की गोपनीयता भंग हुई है और इससे उनका चरित्र हनन हो रहा है. इस संबंध में एक अन्य प्रकरण का उदाहरण देना प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है. यह प्रकरण सितम्बर, 2010 का है. 13.09.2010 और 14.09.2010 को ‘न्यूज-11’ नामक टीवी चैनल ने एक खबर चलायी थी कि ‘‘रघुवर पर एफआइआर का आदेश. 21 करोड़ 20 लाख का है घोटाला. मेनहर्ट मामले में हाइकोर्ट ने दिया आदेश.’’ इस पर श्री रघुवर दास ने न्यूज-11 के मुख्य संपादक और रिपोर्टर सह संयुक्त संपादक श्री हरिनारायण सिंह को अवमानना की नोटिस झारखण्ड हाइकोर्ट के एक वरीय अधिवक्ता द्वारा भिजवाई और कहा था कि ये लोग 15 दिन के भीतर माफी मांगें नहीं तो 20 लाख रूपये का हर्जाना दें. अन्यथा उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी. पता नहीं, इस वकालती नोटिस का क्या हुआ? उनलोगों ने माफी मांगी या नहीं? पर मेरी जानकारी के मुताबिक उनके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा किसी न्यायालय में दायर नहीं हुआ. इसके बाद कार्यान्वयन समिति ने नगर विकास विभाग के सचिव को लिखा कि यदि आपको इस मामले में कुछ और भी कहना है तो कहें. नगर विकास विभाग के सचिव द्वारा या समिति के सामने उनकी ओर से साक्ष्य देने के लिए उपस्थित हुए पदाधिकारियों की तरफ से कोई स्पष्टीकरण या प्रतिवाद नहीं आया तो तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कार्यान्वयन समिति ने 7 जनवरी, 2007 को अपना प्रतिवेदन विधान सभा अध्यक्ष को सौंप दिया. इसकी प्रति नगर विकास विभाग को भी भेज दी गयी. प्रतिवेदन में समिति की अनुशंसा निम्नवत है :-

(1) नगर विकास विभाग द्वारा सभा की विशेष समिति की अनुशंसा का सही कार्यान्वयन नहीं किया गया है. समिति अनुशंसा करती है कि नगर विकास विभाग द्वारा रांची के समेकित सिवरेज-ड्रेनेज परियोजना के लिए मैनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति और इसे दिया गया कार्यादेश अविलम्ब रद्द किया जाय.

(2) सभा की विशेष समिति की अनुशंसा के गलत कार्यान्वयन के लिए मुख्य रूप से नगर विकास विभाग द्वारा गठित उच्चस्तरीय तकनीकी समिति, विशेषकर इसके संयोजक, पूरी तरह जिम्मेदार हैं. समिति अनुशंसा करती है कि इनके विरुद्ध अविलम्ब विधिसम्मत कार्रवाई प्रारम्भ की जाय.

(3) निविदा प्रस्तावों के तकनीकी मूल्यांकन के लिए गठित तकनीकी उपसमिति ने अपने दायित्व का उचित निर्वहन नहीं किया है. निविदा प्रपत्र में वर्णित योग्यता और अनुभव के मापदंड के अनुरूप मैनहर्ट परामर्शी के निविदा प्रस्ताव के मूल्यांकन में इस समिति का आचरण पक्षपातपूर्ण है. समिति अनुशंसा करती है कि तकनीकी उपसमिति के सदस्यों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाय.

(4) निविदा प्रस्ताव पर निर्णय लेने के लिए गठित मुख्य समिति ने तकनीकी उपसमिति के मूल्यांकन पर मुहर लगाने में लापरवाही का परिचय दिया है. निविदा रद्द करने और शर्तों में संशाेधन के साथ फिर से निविदा प्रकाशित करने के अपने निर्णय के विरुद्ध उसी निविदा प्रस्ताव का पुन: मूल्यांकन करने और मैनहर्ट परामर्शी का गलत चयन करने का मुख्य समिति के सदस्यों का आचरण उनके पद एवं जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं है. समिति अनुशंसा करती है इसके लिए उन्हें कड़ी चेतावनी दी जाय.

(5) जून, 2005 में ग्लोबल टेंडर प्रकाशित करने की परिस्थिति से लेकर मैनहर्ट परामर्शी के चयन और सभा की विशेष समिति की अनुशंसाओं के कार्यान्वयन तक की पूरी प्रक्रिया में कतिपय ऐसे तथ्य उभर कर सामने आये हैं, जिनकी छानबीन समिति के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. समिति अनुशंसा करती है कि सरकार इसकी आवश्यक जांच कराये.

सार संक्षेप :-

  1. नगर विकास विभाग ने पूर्व में विधान सभा की विशेष जांच समिति और उच्च स्तरीय तकनीकी समिति को गुमराह किया था. उसी तरह उन्होंने कार्यान्वयन समिति को भी गुमराह करने की कोशिश की. इन्होंने समिति के सामने जो दस्तावेज रखा, उसमें अंकित था कि निविदा दो मुहरबंद लिफाफों में आमंत्रित की गयी थी. एक तकनीकी लिफाफा और दूसरा वित्तीय लिफाफा. उन्होंने समिति से यह तथ्य छुपा लिया कि एक अन्य लिफाफा योग्यता का भी है, कारण कि योग्यता के मापदंड पर मैनहर्ट अयोग्य था और जो किसी भी एक मापदंड पर अयोग्य हो जायेगा वह निविदा मूल्यांकन की आगे की प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जायेगा.
  2. अयोग्य होने के बाद भी इन्होंने मैनहर्ट को नियुक्त कर लिया था. इसलिए सचिव सहित विभाग के अन्य अधिकारी और स्वयं विभाग के तत्कालीन मंत्री हर अवसर पर योग्यता वाले लिफाफा की बात छुपाते रहे. ये सभी निविदा शर्तों पर अयोग्य मैनहर्ट को योग्य साबित करने की साजिश में शामिल हैं.
  3. नगर विकास विभाग के तत्कालीन मंत्री श्री रघुवर दास ने कार्यान्वयन समिति की जांच को बाधित करने का प्रयास किया. विधान सभा अध्यक्ष को दो बार बेबुनियाद पत्र लिखा, समिति की मंशा पर ऊंगली उठायी और जांच को बाधित किया.
  4. उन्होंने अपने विभाग के उन अधिकारियों को कार्यान्वयन समिति की बैठक में आने से रोक दिया जिन्होंने निविदा का गलत मूल्यांकन किया था और अयोग्य को योग्य बना दिया था. इस प्रकार उन्होंने कार्यान्वयन समिति की जांच को बाधित किया.
  5. ‘सांच को आंच क्या’ की घोषणा करने वालों की गलतियां पकड़ ली जाती हैं तो वे ‘चोरी भी और सीनाजोरी भी’ की दबंगई पर उतर जाते हैं. नियम-कानून को ठेंगा दिखाने का उनका दुस्साहस उनके चरित्र की खोट को प्रतिविम्बित करता है.
  6. कार्यान्वयन समिति ने इस मामले की गहन जांच नहीं की होती तो निहित स्वार्थियों के मकड़जाल में फंसकर भ्रष्टाचार का यह मामला हमेशा के लिए दम तोड़ चुका होता. रांची नगर में सिवरेज-ड्रेनेज की बदहाल स्थिति के जिम्मेदार किरदारों की करतूतें सामने नहीं आ पातीं.

इसे भी पढ़ें – बकरी बाजार, महेश पोद्दार, सीपी सिंह, हेमंत सोरेन, फिर सरयू राय व मैनहर्ट और अब सब चुप

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