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मैनहर्ट घोटाला-6 जांच समिति को विभागीय सचिव ने बताया था कि मैनहर्ट ने सिंगापुर शहर में काम किया है, जो कि सरासर झूठ है

Saryu Roy

विशेष समिति की जांच- विधानसभा में माननीय सभा अध्यक्ष द्वारा दिये गये नियमन के आलोक में मैनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति में अनियमितताओं की जांच के लिए दिनांक 11 मार्च 2006 को एक विशेष जांच समिति गठित की गई. इस समिति का गठन निम्नवत्

है :-

Catalyst IAS
SIP abacus
  1. श्री अशोक कुमार (भाजपा) – अध्यक्ष
  2. श्री नियेल तिर्की (कांग्रेस) – सदस्य
  3. श्री नलिन सोरेन (झामुमो) – सदस्य
  4. श्री नीलकण्ठ सिंह मुंडा (भाजपा) – सदस्य
  5. श्री चन्द्रेश्वर प्रसाद सिंह (भाजपा) – सदस्य
  6. श्री रामचंद्र चंद्रवंशी (राजद) – सदस्य
  7. श्री कामेश्वर नाथ दास (जदयू) – सदस्य
Sanjeevani
MDLM

इस समिति का शुरुआती कार्यकाल 31 मार्च 2006 तक था. समिति निर्धारित समय पर रिपोर्ट नहीं दे सकी, तब समिति की कार्य अवधि दो बार बढ़ाई गई. समिति ने दिनांक 12 मई 2006 को अपना जांच प्रतिवेदन दिया. जांच प्रतिवेदन हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है :-

विशेष समिति का जांच प्रतिवेदन

‘‘मैनहर्ट परामर्शी’’ की नियुक्ति मामले में अनियमितता की जांच के लिए सदन द्वारा विशेष समिति का गठन किया गया था, जिसे दिनांक 31 मार्च, 06 तक अपना जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करना था. समिति ने दिनांक-31 मार्च, 06 की बैठक में अपने जांच प्रतिवेदन को पारित कर इसे माननीय अध्यक्ष महोदय को अग्रसारित कर दिया. माननीय अध्यक्ष महोदय ने दिनांक- 09.04.06 को अपने इस आदेश के साथ प्रतिवेदन पुन: समिति को लौटा दिया कि- समिति का कार्यकाल 25.04.06 तक इस निर्देश के साथ विस्तारित किया जाता है कि समिति अपनी अनुशंसा स्पष्ट रूप से दे. सभा सचिवालय की अधिसूचना संख्या- 949 दिनांक 12.04.06 द्वारा समिति का कार्यकाल 25.04.06 तक विस्तारित किया गया. इस बीच विभागीय पदाधिकारियों के साथ दिनांक 24.04.06 को समिति की बैठक हुई, किन्तु समिति ने ऐसा महसूस किया कि सारे बिन्दुओं पर गहन विमर्श हेतु पुन: समिति के कार्यकाल को विस्तारित करना अनिवार्य है.

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माननीय संयोजक के अनुरोध पर माननीय अध्यक्ष महोदय ने समिति के कार्यकाल को पुन: 15.05.06 तक के लिए विस्तारित करने के लिए आदेश प्रदान किया. इस आदेश के आलोक में अधिसूचना संख्या- 1138 दिनांक 27.04.06 द्वारा समिति का कार्यकाल दिनांक 15.05.06 तक विस्तारित किया गया. दिनांक 24.04.06 की बैठक में विभागीय पदाधिकारियों के साथ समिति ने गहन विमर्श किया. समिति की बैठक में माननीय संयोजक ने कहा कि नियेल तिर्की साहब ने सवाल उठाया था कि जो टेक्नीकल बिड खोला गया, उसमें मैनहर्ट का टर्न ओवर मांग के अनुरूप नहीं है, जबकि आपलोगों ने जो पेपर दिया था, उसमें उसके द्वारा 2000 करोड़ रूपये का काम दिखाया गया है. इस प्रश्न पर सचिव, नगर विकास विभाग ने समिति को जानकारी दी कि इसमें दो चीजें थी, एक तो टर्न ओवर था और दूसरा उनके द्वारा 5 सालों में कितने सौ करोड़ रूपये का काम किया गया.

वर्ल्ड बैंक के नार्म्स के आधार पर जो टेंडर वाली गाइडलाइन थी, उसमें सौ नम्बर में 5 नम्बर सिर्फ टर्न ओवर के लिए था. इसके आधार पर तीनों कम्पनियों को 5-5 अंक दिये गये. इसको कमेटी ने तय किया था. जितने मामले बैठक में उठे हैं, उनके सारे प्वाइंटस को लिखित में आप हमको दे दीजिए. नियेल जी ने जो उठाया था, उसका भी जवाब दे दीजिए. समिति के निदेश के आलोक में सचिव, नगर विकास विभाग ने परामर्शी के लिए की गयी नियुक्ति पर गठित विशेष समिति के लिए सामग्री के रूप में नगर विकास विभाग के संकल्प संख्या- 1412 दिनांक 09.07.05 तथा कार्यालय आदेश संख्या- 40 दिनांक 06.07.05 समिति के समक्ष प्रस्तुत किया.

सचिव ने समिति को जानकारी दी कि असेंबली में जो बात उठी थी कि बिटॉन कम्पनी का 1996-97 में उद्घाटन हुआ था, उसको 300 करोड़ रूपये का एक्सपीरियेंस नहीं है. मेरा कहना है कि 1997 में कार्य प्रारंभ हुआ और हमलोगों को जून, 2000 से लेकर जून, 2005 तक 5 साल का एक्सपीरियेंस और 300 करोड़ रूपये का टर्न ओवर देखना था. यह कम्पनी 1997 से 2 जून, 2000 तक में 2000 मिलियन डॉलर का काम दिखला रहा था. यानी की करीब-करीब 8000 करोड़ रूपये का काम हुआ. उसमें लगभग 1,300 करोड़ रूपये का सिवरेज काम किया. यदि हम इसे नहीं भी मानें तो वर्ष 2000 से वर्ष 2004 के बीच के इसके द्वारा सिंगापुर में सिवरेज और ड्रेनेज का काम 92 मिलियन डॉलर और दूसरा 74 मिलियन डॉलर यानी 166 मिलियन डॉलर का काम किया गया, जो लगभग 500 करोड़ रूपये हो जाते हैं. तब भी 300 करोड़ रूपये पूरा हो जाता है.

संयोजक ने जब यह पूछा कि 2000 मिलियन डॉलर का जो सबमिट है वह क्या है तो सचिव, नगर विकास विभाग ने जानकारी दी कि वह प्रोजेक्ट कॉस्ट है. चूंकि तीनों कम्पनियों ने 300 करोड़ रूपये से ऊपर का काम किया था, इसलिए टेक्नीकल बिड खोला गया. नम्बरिंग में 50 करोड़ रूपये का टर्न ओवर था, इसलिए इसके नम्बर दे दिये गये. टेन्डर में ऑलरेडी डिफाइन्ड था कि इतने नम्बर देंगे. समिति ने जब यह जानना चाहा कि क्या उन्होंने अरबन एरिया में ड्रेनेज का काम डायरेक्ट किया है तो सचिव, नगर विकास विभाग का उत्तर था- जो पेपर इन्होंने सबमिट किया है, उसमें इनके द्वारा सिंगापुर में 2000 मिलियन डॉलर का काम किया गया है और सिंगापुर तो सारा शहर ही है. समिति ने जब यह जानना चाहा कि टेन्डर पेपर में सचिव का हस्ताक्षर नहीं है तो सचिव ने समिति को यह जानकारी दी कि जो टेंडर बिकता है, उसमें सचिव हस्ताक्षर करते हैं न कि जो टेंडर ऑथराइज होता है, उसमें सचिव  हस्ताक्षर करेंगे.

समिति की अनुशंसा

समिति द्वारा पूछे गये प्रश्नों के आलोक में विभाग द्वारा जो उत्तर उपलब्ध करवाया गया, उस उत्तर के गहन मंथन के पश्चात् समिति संतोष व्यक्त करती है, किन्तु इसके कतिपय बिन्दु गहन तकनीकी समीक्षा से सम्बद्ध हैं. अत: समिति यह अनुशंसा करती है कि अपेक्षित तकनीकी जांच करवाते हुए सरकार आगे की कार्रवाई प्रारंभ करे.’’ जांच समिति के उपर्युक्त प्रतिवेदन और अनुशंसा को देखने से लगता है कि समिति ने विधान सभा द्वारा सौंपे गये दायित्व का सही रूप से निर्वहन नहीं किया. जांच समिति को यह देखना था कि रांची के सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तैयार करने के लिए परामर्शी के रूप में मैनहर्ट का चयन अनियमित था या नहीं? विधान सभा में बहस के दौरान विपक्ष के सदस्यों ने यह आरोप लगाया था. इसके लिए निविदा प्रपत्र और निविदा मूल्यांकन की गहन समीक्षा करना आवश्यक था, ताकि निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके कि निविदा के मूल्यांकन में और परामर्शी की नियुक्ति में निविदा शर्तों एवं निविदापूर्व बैठक (प्री-बिड मिटिंग) के निर्णयों का पालन हुआ है अथवा नहीं हुआ है? यदि इनका पालन हुआ है तो परामर्शी की नियुक्ति सही है और नहीं पालन हुआ है तो नियुक्ति गलत है.

परन्तु इस प्रतिवेदन के अवलोकन से लगता है कि समिति ने जांच के इन बिन्दुओं पर विचार तक नहीं किया है. इतना ही नहीं 7, 8 और 9 मार्च 2006 को तीन दिनों तक विधान सभा में इस विषय पर गर्मा-गरम बहस हुई. 9 मार्च को तो अव्यवस्था का आलम यह था कि हो-हल्ला होने एवं सदस्यों के वेल में आ जाने के कारण सभाध्यक्ष को सदन की कार्यवाही 5 बार स्थगित करनी पड़ी. सदन में हुए वाद-विवाद के क्रम में कतिपय महत्वपूर्ण सूचनाएं सामने आईं थी, जिन पर विचार होना एवं जिनका विश्लेषण किया जाना आवश्यक था. मगर समिति ने इनका विचार-विश्लेषण तो दूर इनका जिक्र तक प्रतिवेदन में नहीं किया. इस समिति में अध्यक्ष सहित कुल 7 सदस्य थे. सभी सदस्य वरिष्ठ एवं अनुभवी थे. इसमें विधान सभा में हंगामा मचाने और सदन को बाधित करने वाले दलों के सदस्य भी थे और इस विषय पर ध्यानाकर्षण सूचना देने वाले सदस्य भी थे. परंतु किसी ने इस तरह के सतही और सदन की विशेष जांच समिति की अवधारणा का मखौल उड़ाने वाले प्रतिवेदन पर सहमति जताते समय यह ध्यान नहीं रखा कि राज्यहित एवं जनहित से जुड़ी अनियमितता और भ्रष्ट आचरण के प्रतीक इस मामले की जांच में उनकी भूमिका का विश्लेषण इतिहास किस प्रकार करेगा.

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विधायिका की किसी समिति द्वारा भ्रष्टाचार और अनियमितता से जुड़े किसी गम्भीर मामले की जांच का ऐसा सतही प्रतिवेदन देने का उदाहरण शायद ही कहीं और मिले. प्रतिवेदन में तथ्यों की अनदेखी तो की ही गई है, विधान सभा समिति के प्रतिवेदन के परम्परागत स्वरूप की उपेक्षा भी की गई है. विशेष जांच समिति का यह प्रतिवेदन अत्यंत सतही है. विधान सभा सत्र के दौरान माननीय सभा अध्यक्ष का स्पष्ट नियमन था कि विशेष जांच समिति को मैनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति में अनियमितता के आरोप की जांच करनी है. मगर विशेष जांच समिति के प्रतिवेदन में न तो अनियमितता के आरोपों का कहीं उल्लेख है और न ही विधान सभा में इस विषय पर हुई विस्तृत चर्चा के किन्हीं बिन्दुओं का समावेश है. विशेष जांच समिति के जांच प्रतिवेदन के साथ लगे अनुलग्नकों में भी कोई प्रासंगिक कागजात संलग्न नहीं हैं. समिति के प्रतिवेदन में सामग्री के रूप में नगर विकास विभाग द्वारा दिये गये जिन कागजातों का उल्लेख है, वे मैनहर्ट की नियमित संबंधी सामग्री हैं ही नहीं. वे वस्तुतः विशेष जांच समिति के गठन के संबंध में 6 जुलाई 2005 और 2 जुलाई 2005 को नगर विकास द्वारा निर्गत अधिसूचना मात्र हैं. विधान सभा की समितियां आमतौर पर अपने प्रतिवेदन विधान सभा अध्यक्ष को अथवा चलते सदन में विधान सभा को एक परम्परागत स्वरूप में सौंपती हैं. इनके आरम्भ में प्राक्कथन होता है, समिति के गठन का संदर्भ रहता है, समिति की सहायता करने के लिये नियुक्त सभा सचिवालय के अधिकारियों और सहायकों की नामावली रहती है. इसके बाद प्रतिवेदन का प्रारूप, फिर निष्कर्ष और अंत में अनुशंसा रहती है. पर इतने महत्वपूर्ण विषय पर विधान सभा द्वारा गठित इस विशेष जांच समिति के प्रतिवेदन में इन परम्परागत औपचारिकताओं का निर्वहन तक नहीं किया गया है. अनुशंसा सहित पूरा प्रतिवेदन मात्र तीन पृष्ठों (ए-4 आकार के डेढ़ पन्नों) में सिमटा हुआ है. प्रतिवेदन के साथ जो अनुलग्नक दिये गये हैं, वे नगर विकास विभाग द्वारा समिति के गठन अथवा इसके स्वरुप में हुए परिवर्तन हेतु समय-समय पर जारी संकल्प और अधिसूचनायें भर हैं.

विषय की वस्तुस्थिति से इनका कोई लेना देना नहीं है. इसके अतिरिक्त, नगर विकास विभाग ने जांच समिति के समक्ष मैनहर्ट की बहाली के संबंध में विभाग द्वारा तैयार किया गया एक विस्तृत विवरण सौंपा था. उसमें उल्लेख था कि इस हेतु निविदा दो मुहरबंद लिफाफा में आमंत्रित की गई थी. एक लिफाफा तकनीकी योग्यता का और दूसरा वित्तीय लागत का. निविदा के साथ एक अन्य लिफाफा योग्यता का भी मांगा गया था, इसका जिक्र इस प्रतिवेदन में नहीं है. कारण कि निविदा प्रपत्र में निर्धारित योग्यता के पैमाने पर मैनहर्ट अयोग्य था. इसलिए नगर विकास विभाग ने यह जानकारी समिति से छुपा ली. इस विवरण का कोई उल्लेख विशेष जांच समिति के प्रतिवेदन में नहीं है. यह प्रतिवेदन महज खानापूर्ति है, जिसमें कतिपय तकनीकी पहलुओं की जांच करा लेने का जिम्मा उन्हीं पर छोड़ दिया गया है, जिनपर इस मामले में मुख्य दोषी होने का आरोप है. इससे भी अधिक हास्यास्पद तो यह है कि इस विषय में कौन से बिन्दु गहन तकनीकी समीक्षा से संबंधित हैं जिनकी जांच करानी है? इसका कोई उल्लेख प्रतिवेदन में नहीं है. यानी यह निर्धारित करने का भार भी उन्हें ही दे दिया गया है जिनकी ओर शक की सुई जा रही थी. विशेष जांच समिति को विभागीय सचिव ने बताया था कि मैनहर्ट ने सिंगापुर शहर में काम किया है, जो कि सरासर झूठ है. वस्तुतः इसने सिंगापुर और इंडोनेशिया के बीच के एक छोटे से द्वीप पर स्थित बिंटान रिसोर्ट में किया हुआ अपना काम दिखाया था. प्रतिवेदन में जिस बिंटान कम्पनी का जिक्र है, वह वास्तव में इसी से संबंधित बिंटान रिसोर्ट मैंनेजमेंट है. मैनहर्ट ने इस कम्पनी का काम करने का अनुभव प्रमाण-पत्र प्रासंगिक निविदा के साथ बिंटान रिसोर्ट के ‘लैटर हेड’ पर दिया है. इस प्रमाण-पत्र के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए कुछ लोगों ने बिंटान रिसोर्ट मैंनेजमेंट से सम्पर्क किया और ई-मेल से यह प्रमाण-पत्र बिंटान मैंनेजमेंट कम्पनी के पास सत्यापन हेतु भेजा. बिंटान रिसोर्ट मैंनेजमेंट कम्पनी ने इसका उत्तर ई-मेल से भेजा जिसमें कहा गया है कि बिंटान ने 2001 के बाद से कम्पनी का उस लेटर हेड का इस्तेमाल करना बंद कर दिया है, जिस लेटर हेड पर मैनहर्ट ने निविदा के साथ अनुभव प्रमाण-पत्र जमा किया है. जबकि मैनहर्ट ने यह प्रमाण-पत्र 2005 में दिया है. यदि यह सही है तो मैनहर्ट ने जालसाजी की है. इसकी गहन जांच सक्षम जांच एजेन्सी से कराई जानी चाहिए थी. परन्तु विधान सभा की विशेष जांच समिति ने इसका संज्ञान तक नहीं लिया. इस अनुभव प्रमाणपत्र पर किसी ‘तेह काब जेंग’ का हस्ताक्षर है. बिंटान रिसोर्ट मैंनेजमेंट का प्रासंगिक ई-मेल का हिंदी अमनुवाद नीचे हू-ब-हू दिया जा

‘‘प्रमाण-पत्र के विषयवस्तु में गये बिना मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि हमने 2001 से बिंटान रिसोर्ट मैंनेजमेंट के लेटर हेड का उपयोग करना बंद कर दिया है और मेरी जानकारी के अनुसार ‘तेह कॉब जेंग’ नाम का कोई भी व्यक्ति हमारे साथ काम नहीं करता है. मैंने अपने रिसोर्ट प्लानिंग डिपार्टमेंट से भी इसकी संपुष्टि कर ली है.’’ इस ई-मेल के आलोक में मैनहर्ट ने बिंटान रिसोर्ट मैंनेजमेंट के लेटर हेड पर कार्य अनुभव का जो प्रमाण-पत्र दिया है, वह संदेह के घेरे में आ जाता है.

समिति को इसके बारे में नगर विकास विभाग से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए थी. नगर विकास विभाग द्वारा भी निविदा निष्पादन के समय इसका संज्ञान नहीं लिया जाना शक को जन्म देता है कि दाल में कुछ-न-कुछ काला जरूर है. इस गंभीर विषय की ओर विधान सभा द्वारा गठित विशेष जांच समिति द्वारा ध्यान नहीं दिया जाना विधान सभा अध्यक्ष के नियमन की अवहेलना करने जैसा है. माननीय सभा अध्यक्ष ने इस मामले की जांच के लिये विधान सभा की विशेष समिति का गठन तत्परता से किया, जांच समिति में सदन के सात वरिष्ठ सदस्यों को स्थान दिया, विधान सभा में सवाल उठाने वाले सदस्य को भी समिति का सदस्य बनाया और मार्च माह के अंत तक जांच प्रतिवेदन सौंपने की समय-सीमा निर्धारित कर दी. परंतु समिति गठित हो जाने के बाद जितनी तत्परता की अपेक्षा माननीय वरीय सदस्यों से थी, वह पूरा नहीं हो सकी. सदन में विषय को जोर-शोर से उठाने वाले माननीय सदस्य, जिन्हें जांच समिति में स्थान मिला था, वे भी समिति की बैठक में उम्मीद के अनुरूप भूमिका नहीं निभा पाये. विधान सभा की समितियों के साथ अक्सर यह विडम्बना जुड़ी रहती है कि हम जनप्रतिनिधि इनमें समुचित योगदान करने के प्रति गम्भीर नहीं रहते हैं. समिति का पूरा दारोमदार सभापति के कंधों पर छोड़ दिया जाता है.  विधान सभा के अधिकारियों और कर्मियों के सहयोग से समिति का प्रतिवेदन तैयार करने की औपचारिकता उन्हें ही निभानी पड़ती है. बाकी सदस्य सदस्यता और भरोसे में प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर कर देने मात्र तक ही अपनी भूमिका सीमित रखते हैं. मैनहर्ट नियुक्ति प्रकरण में अनियमितता की जांच करने वाली विधान सभा की विशेष जांच समिति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ प्रतीत होता है. अन्यथा जिस तरह का सतही, अति संक्षिप्त और बिना ओर-छोर के जांच प्रतिवेदन इस विशेष जांच समिति ने सौंपा है, उसकी कल्पना ऐसे वरिष्ठ और अनुभवी सदस्यों वाली समिति से नहीं की जा सकती.

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सार संक्षेप :-

  1. विधानसभा द्वारा मैनहर्ट परामर्शी की बहाली में अनियमितता के आरोपों की जांच करने के लिए विशेष जांच समिति गठित की गई थी. इस समिति ने अपने दायित्व का पालन नहीं किया और एक सतही प्रतिवेदन देकर अपना पल्ला झाड़ लिया.
  2. झारखण्ड सरकार के नगर विकास विभाग ने समिति को गुमराह करने के उद्देश्य से मैनहर्ट की बहाली प्रक्रिया का एक विवरण दिया था, जो गलत था. इसमें कहा गया था कि निविदा केवल दो मुहरबंद लिफाफों में की गई थी. एक तकनीकी लिफाफा और दूसरा वित्तीय लागत का लिफाफा. योग्यता वाली एक अन्य लिफाफा भी निविदा के साथ मांगा गया था. इसे विभाग ने समिति से छुपा लिया, क्योंकि इसकी जांच होने पर मैनहर्ट अयोग्य साबित हो जाता.
  3. विशेष जांच समिति ने गठन के 20 दिन में ही अपना पहला प्रतिवेदन माननीय विधान सभा अध्यक्ष को 31 मार्च 2006 के दिन सौंप दिया. जिसे विधान सभा अध्यक्ष असंतोषजनक पाया और स्पष्ट अनुशंसा देने का निर्देश समिति को दिया.
  4. जांच समिति ने विधान सभा की परम्परा के अनुरूप प्रतिवेदन देने की औपचारिकता पूरी नहीं की और प्रतिवेदन को मात्र डेढ़ पन्नों में समेट दिया.
  5. मैनहर्ट द्वारा निविदा के साथ दिये गये बिंटान रिसोर्ट के कार्य अनुभव प्रमाणपत्र की सत्यता जानने और जांचने का प्रयास नहीं किया.
  6. निविदा प्रपत्र में अंकित शर्तों के आधार पर निविदादाता की योग्यता का मूल्यांकन, तकनीकी मूल्यांकन और वित्तीय लागत के मूल्यांकन की विसंगतियों की जांच नहीं की गई.
  7. सरकार की ओर से समिति को सौंपे गये कागजात भ्रामक थे. नगर विकास विभाग ने समिति के समक्ष जो प्रतिवेदन सौंपा था, वह वास्तव में झूठ का पुलिंदा था.
  8. कुल मिलाकर विशेष जांच समिति का प्रतिवेदन सतही, आधारहीन और असंतोषजनक था. नगर विकास विभाग ने समिति का सहयोग नहीं दिया और समिति के समक्ष गलत सूचना पेश किया.

डिस्क्लेमर- (लेखक झारखंड के पूर्व मंत्री रह चुके हैं. यहां प्रकाशित विचार उनके निजी हैं. इसका न्यूज विंग से कोई संबंध नहीं है.)

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