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मैनहर्ट घोटाला-7: मैनहर्ट के टेंडर पर आगे विचार ही नहीं किया जाना था, मुख्य अभियंता ने गलती भी स्वीकारी फिर भी उसी को मिला काम

Saryu Roy

उच्चस्तरीय समिति का फर्जीवाड़ा-

मैनहर्ट की नियुक्ति में अनियमितता की जांच के लिये गठित विधान सभा की विशेष जांच समिति द्वारा दिया गया प्रतिवेदन जितना सतही और भ्रामक तथ्यों पर आधारित था, उससे भी अधिक सतही इस समिति की अनुशंसा थी.

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समिति की अनुशंसा थी कि ‘इसके कतिपय बिन्दु गहन तकनीकी समीक्षा से संबद्ध हैं. अत: समिति अनुशंसा करती है कि अपेक्षित तकनीकी जांच करवाते हुए सरकार आगे की कार्रवाई प्रारम्भ करे.’ यानी मैनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति मामले में सरकार कतिपय बिन्दुओं की तकनीकी जांच करा ले, इसके बाद आगे की कार्रवाई करने के बारे में निर्णय ले. विधानसभा की विशेष जांच समिति ने अपने प्रतिवेदन में इन तकनीकी बिन्दुओं को रेखांकित नहीं किया था. यह नहीं बताया कि वे कौन से बिन्दु हैं जिनकी तकनीकी समीक्षा करनी आवश्यक है? समिति ने इस बारे में केवल कतिपय शब्द का इस्तेमाल करके अपनी जिम्मेदारी पूरा हुआ मान लिया. सरकार ने भी कतिपय तकनीकी बिन्दुओं को स्पष्ट करने के लिये समिति से जानकारी नहीं प्राप्त की. सरकार द्वारा अपने बुद्धि-विवेक से इसकी जांच के लिये तीन अभियंताओं की एक समिति गठित कर दी गई, जिसे ‘उच्चस्तरीय तकनीकी समिति’ कहा गया. इस समिति को भी यह नहीं बताया गया कि उसे किन बिन्दुओं की तकनीकी समीक्षा करनी है. फिर भी इस समिति ने प्रतिवेदन दिया और अपने प्रतिवेदन में सरकार को क्लीन चिट दे दी और कहा कि-‘मैनहर्ट की नियुक्ति में कोई अनियमितता नहीं हुई है.’

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उच्चस्तरीय समिति की अनुशंसा निम्नवत है :-

‘उच्चस्तरीय तकनीकी समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि परामर्शी की नियुक्ति में विहित प्रक्रियाओं का अनुपालन हुआ है. पारदर्शिता अपनाते हुए सभी को इस कार्य में भाग लेने का अवसर दिया गया है. तकनीकी उपसमिति ने सभी प्रस्तावों को स्वतंत्र रूप से आरएफपी में निहित शर्तों एवं सभी निविदा दाताओं का मूल्यांकन विहित प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए किया है. निगोसिएशन की प्रक्रिया भी पारदर्शी रही है तथा निविदा का दर भी कार्यभार एवं निर्धारित समय सीमा के आलोक में इकोनॉमिकल एवं व्यावहारिक प्रतीत होता है.’

उच्चस्तरीय तकनीक समिति के प्रतिवेदन और अनुशंसा पर एक नजर डालने से पता चलता है कि इसने मामले पर लीपापोती करने का शर्मनाक प्रयास किया गया है. यह प्रयास इसने नगर विकास विभाग के प्रभाव में आकर किया है. उल्लेखनीय है कि 2009 में राष्ट्रपति शासन के दौरान माननीय राज्यपाल के सलाहकार ने इस मामले की जांच करने का निर्देश निगरानी आयुक्त को दिया था. निगरानी आयुक्त के निर्देशानुसार, निगरानी विभाग के ‘तकनीकी परीक्षण कोषांग’ ने इसकी जांच की. अपनी जांच में कोषांग ने उच्चस्तरीय समिति की इस अनुशंसा को गलत ठहराया जो इस पुस्तक के खंड 10 से खंड 14 तक में अंकित है. इस उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक बनाये गये थे श्री एसपी सिन्हा. श्री सिन्हा मूलत: जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता थे, परंतु उस समय नगर विकास विभाग के अधीन ‘‘रांची रिजनल डेवलपमेंट अथॉरिटी (आरआरडीए)‘‘ में मुख्य अभियंता के पद पर प्रतिनियुक्त थे. इनके अतिर्नित समिति में दो सदस्य नामित किये गये थे. एक सदस्य श्री घूरन राम, अभियंता प्रमुख, जल संसाधन विभाग थे जो सेवा के आरम्भिक काल में श्री एसपी सिन्हा (संयोजक) से जूनियर हुआ करते थे, पर अनुसूचित वर्ग श्रेणी में होने के कारण प्रोन्नति पाकर वे उनसे सीनियर हो गये थे. समिति के दूसरे सदस्य बनाये गये थे श्री निर्मल कुमार केडिया, अधीक्षण अभियंता, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग. कायदे से पदक्रम में वरीयतम होने के नाते अभियंता प्रमुख श्री घूरन राम को समिति का संयोजक बनाया जाना चाहिये था. परंतु उन्हें नहीं बनाकर सरकार ने पदक्रम में उनसे कनीय श्री एसपी सिन्हा को संयोजक बना दिया गया. ऐसा क्यों किया गया, इसका उत्तर तत्कालीन नगर विकास विभाग के तत्कालीन माननीय मंत्री या सचिव ही दे सकते हैं.

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उच्चस्तरीय समिति को 24 मई 2006 को जांच का आदेश मिला और समिति ने 28 मई 2006 को जांच प्रतिवेदन सौंप दिया. विधान सभा की कार्यान्वयन समिति ने इस समिति के सदस्यों को पूछताछ के लिये 17 नवम्बर 2006 को बुलाया. पूछताछ में उन्होंने कार्यान्वयन समिति को जो बताया, वह चौंकाने वाला है. उसका संक्षिप्त ब्यौरा नीचे दिया गया है. समिति ने जानना चाहा कि इस उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का अधिकार क्या था तथा समिति को किन-किन बिन्दुओं पर विचार करना था? इस पर संयोजक ने बताया कि हमें सब कुछ देखना था. उन्होंने निविदा में अंकित योग्यता की शर्तों को पढ़कर सुनाया, जो निम्नवत है:- ‘जो निविदा प्रस्ताव इलिजिबिलिटी क्राइटेरिया (योग्यता के मापदंड) के किसी भी एक बिन्दु पर अपूर्ण पाया जायेगा उसका इवेल्यूएशन (मूल्ङ्मांकन) आगे नहीं होगा.’

उनसे पूछा गया कि रांची नगर निगम के प्रशासक निविदा का शुरुआती मूल्यांकन करने वाली तकनीकी उपसमिति के अध्यक्ष थे. उन्होंने तुलनात्मक विवरणी बनाकर मुख्य समिति के पास भेजा था, जिसके पहले पेज के पहले कॉलम में लिखा है कि-‘‘ऐनुअल एवरेज टर्नओवर ऑफ लास्ट थ्री इयर्स 40 करोड़ या उससे अधिक’’ होना चाहिए. लेकिन मैनहर्ट ने केवल दो वर्ष का ही टर्न ओवर दिया है. इस पर संयोजक का उत्तर था कि, ‘‘ये जो हमारी कमेटी में आया है, उससे हम फिर कर रहे हैं.’’ उनसे पुन: पूछा गया कि मैनहर्ट के द्वारा वर्ष 2004-05 के टर्न ओवर का विवरण नहीं दिया गया था. इसलिये मैनहर्ट के टेंडर पर आगे विचार नहीं होना चाहिए था. तब मुख्य अभियंता-सह-समिति के संयोजक ने माना कि थोड़ी गलती हुई है. उच्चस्तरीय तकनीकी समिति से पूछा गया कि आपने प्रतिवेदन में क्यूबीएस पद्धति के पक्ष में बहुत से तर्क दिये हैं, लेकिन इवैल्यूएशन थ्री स्टेज में हुआ इसका जिक्र उक्त प्रतिवेदन में क्यों नहीं किया है? एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के अनुसार, इसमें इरेगुलरिटी कहां है?

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इस पर मुख्य अभियंता ने बताया कि प्रोपोजल दो ही तरह का मांगा गया था, एक टेक्निकल तथा दूसरा फाईनेंसियल. इस पर समिति ने कहा कि आप एक ही लाइन पढ़ रहे हैं. तब उन्होंने प्रतिवेदन की कंडिका-3 और 4 को पढ़ा. जिसमें लिखा हुआ था कि-आरएफपी के अनुसार योग्यता हेतु निर्धारित तीन वर्षों का औसत टर्न ओवर 40 करोड़ की सीमा पार कर लेने के कारण सभी को बराबर अंक दिये गये हैं. तब उनसे कहा गया कि इससे स्पष्ट हो रहा है कि निविदा में एक प्रोपोजल योग्यता का भी था. इस पर वे चुप रहे. कार्यान्वयन समिति ने संयोजक से पूछा कि आपकी समिति जब गठित हुई थी और विभाग द्वारा जो कागजात आपकी समिति को उपलब्ध कराये गये थे, उनमें तकनीकी उपसमिति द्वारा तैयार की गई तुलनात्मक विवरणी थी या नहीं? इस पर मुख्य अभियंता-सह-संयोजक का उत्तर था कि हमलोगों को केवल इवैल्यूएशन चार्ट ही मिला था, तुलनात्मक विवरणी नहीं. पुन: कार्यान्वयन समिति ने पूछा- आपने अपने प्रतिवेदन की कंडिका-4 में लिखा है कि निविदा का गहन अध्ययन कर मूल्यांकन किया गया है और सभी को निर्धारित अंक दिये गये हैं.

समिति जानना चाहती है कि जब तुलनात्मक विवरणी आपको उपलब्ध ही नहीं कराया गया तो आपने कैसे उसका गहन अध्ययन किया? इस पर अधीक्षण अभियंता (श्री निर्मल केडिया) का कहना था कि तुलनात्मक विवरणी उन्हें नहीं उपलब्ध कराई गई. उनसे अगला प्रश्न था कि उच्चस्तरीय तकनीकी समिति ने क्यूबीएस पद्धति की अपने प्रतिवेदन में काफी प्रशंसा की है तथा उसे सर्वोत्कृष्ट ठहराया है, तो आप बतायें कि-जब विश्व बैंक की चयन प्रक्रिया को अपनाया गया तो उसके मार्गदर्शिका का पालन हुआ अथवा नहीं? अपने प्रतिवेदन में आपने 11 बिन्दु अंकित किया है. इन 11 बिन्दुओं को आपने कहां से निकाला? इस पर मुख्य अभियंता सह संयोजक का उत्तर था कि उन 11 बिन्दुओं को मार्गदर्शिका से निकाला गया था. इस पर उन्हें बताया गया कि मार्गदर्शिका में तो ये बिन्दु हैं ही नहीं. जब आपने परामर्शी के रूप में मैनहर्ट के चयन को अपने प्रतिवेदन में सही ठहरा ही दिया था तो इसको और अधिक सही ठहराने के लिए असत्य उद्धृत करने की क्या आवश्यकता थी? इस पर संयोजक ने मौन साध लिया.

कार्यान्वयन समिति ने उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के एक अन्य सदस्य श्री निर्मल कुमार केडिया, अधीक्षण अभियंता से जानना चाहा कि इस संबंध में आपका क्या कहना है? इस पर श्री केडिया ने स्पष्ट किया कि उसी दिन मेरी मां का देहान्त हो गया था. उस दिन हम थोड़ा उलझे हुए थे, लेकिन इस फाइल को मेरे द्वारा देखा गया है. इसमें एलिजिबिलिटी (योग्यता) का मूल्यांकन दिया गया है, जो सबों के लिए एक ही है. आगे मुख्य अभियंता-सह-संयोजक से पूछा गया कि क्यूबीएस पद्धति में व्यय अधिक रहने की संभावना रहती है या नहीं? आपके प्रतिवेदन में अनु.-1 का जिक्र है, यह अनु.-1 क्या है? तो इस पर मुख्य अभियंता ने बताया कि अनुलग्नक -1 मेरे पास है, जो तकनीकी उपसमिति की तुलनात्मक विवरणी थी. तब इस पर समिति ने उनसे पूछा कि पहले आपने कैसे कहा कि इस तुलनात्मक विवरणी को आपने नहीं देखा है और आपको यह उपलब्ध नहीं करायी गयी थी? समिति ने फिर पूछा कि क्या मूल्यांकन की सभी प्रक्रियाओं पर बात हुई है? इस प्रश्न पर मुख्य अभियंता का जवाब था कि हम इस संबंध में थोड़ा डिफर करते हैं. तब समिति ने पुन: प्रश्न किया कि कभी आप कहते हैं कि कागजात नहीं मिला है, कभी कहते हैं कि डिफर करते हैं. जब आपको कागजात ही नहीं मिला तो डिफर कैसे किया? इस पर उन्होंने चुप्पी साध लिया. कार्यान्वयन समिति ने इसी क्रम में श्री घूरन राम, अभियंता प्रमुख से जानना चाहा कि उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक जो कह रहे हैं, उससे आप संतुष्ट हैं या डिफर कर रहे हैं? इस पर अभियंता प्रमुख का उत्तर था कि ‘‘जिस दिन रिपोर्ट देनी थी उसके एक दिन पहले मुझे मालूम हुआ कि मुझे इसका सदस्य बनाया गया है. उन्होंने संयोजक की ओर इशारा करते हुए कहा कि ये हमारे सीनियर रहे हैं, इन्होंने जो लिखा था उसको मुझे एक्सप्लेन किया.’’

उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक से पूछा गया कि आपके प्रतिवेदन में उल्लेख है कि उच्चस्तरीय तकनीकी समिति को कागजात उपलब्ध कराने में पूरी पारदर्शिता बरती गई है. इस पर मुख्य अभियंता का उत्तर था कि हमें ‘‘दो बीड दिया गया, इसके पहले जो हुआ है वह नहीं पता है.’’ अधीक्षण अभियंता का जवाब था कि जो पारदर्शिता की बात हमने कही है, वह तकनीकी मूल्यांकन से संबंधित चीजों के बारे में है और अन्य जो क्राइटेरिया था जैसे परामर्शी की योग्यता, चूंकि इसके बारे में प्रासंगिक कागजात हमारे समक्ष नहीं आये थे, इसलिए प्रतिवेदन में वो बात आई. इसके बाद कार्यान्वयन समिति ने उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का ध्यान तकनीकी मूल्यांकन चार्ट (परि.-14) की ओर आकृष्ट करते हुए जानना चाहा कि इसमें श्री शशि रंजन कुमार ने जीकेडब्ल्यू को 80.77 अंक दिया है, जबकि श्री केपी शर्मा, कार्यपालक अभियंता, भवन निर्माण एवं श्री उमेश कुमार गुप्ता, कार्यपालक अभियंता ने क्रमश: 49.89 और 63.47 अंक दिया है. रिपोर्ट में एक ही प्रकार के तथ्यों के मूल्यांकन के संबंध में इतना अंतर कैसे है? इस ओर आपका ध्यान गया था कि नहीं? आपकी रिपोर्ट के अनुसार, आपने इसका गहन अध्ययन किया है. इस पर मुख्य अभियंता सह संयोजक ने इसे स्वीकार करते हुए बताया कि 80 और 49 का यह अंतर ज्यादा है. यह कुछ उल्टा दिख रहा है, इस ओर ध्यान नहीं गया. इतने बड़े अंतर की ओर आपका ध्यान क्यों नहीं गया? क्योंकि अंतर तो कम अंकों का होना चाहिए. इस पर मुख्य अभियंता ने स्वीकार करते हुए कहा-‘‘जी महोदय’’. फिर कार्यान्वयन समिति ने कहा कि- दो व्यक्तियों द्वारा किये गये मूल्यांकन में एक ने मैनहर्ट को अधिकतम अंक दिया है, वहीं पर एक अन्य ने न्यूनतम दिया है. पहले मूल्यांकनकर्ता ने मैनहर्ट, सिंगापुर को 78.59 एवं 74.84 दिया है, वहीं पर दूसरे ने उसी को 90.45 एवं 92.66 दिया है. यह प्रशासक और कार्यपालक अभियंता का मूल्यांकन है, इससे क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है? क्या इसमें पारदर्शिता बरती गई? आपके प्रतिवेदन में पारदर्शिता शब्द दुहराया गया है, लेकिन मूल्यांकन चार्ट में पारदर्शिता कहीं दिखाई नहीं देती है. विधान सभा की विशेष जांच समिति ने जितना भरोसा करके आपसे कतिपय तकनीकी बिन्दुओं पर जांच प्रतिवेदन सौंपने को कहा था, आपने उसके साथ न्याय नहीं किया है. जो प्रतिवेदन आपलोगों ने तैयार किया है, वह प्रतिवेदन स्तरीय नहीं है. इसमें आपलोगों ने अनावश्यक रूप से सरकार के निर्णय का बचाव करने का प्रयास किया है और हर स्तर पर मुख्य अभियंता-सह-संयोजक द्वारा चयन प्रक्रिया की इतनी प्रशंसा की गई है जो इसके लिए आवश्यक प्रतीत नहीं हो रहा है. यहां पर इस संदर्भ में आपने केवल सरकार की अच्छाईयां ही दिखाई है, ‘भाईटल फैक्ट’ को आपने छुपा दिया है.

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इसके बाद कार्यान्वयन समिति ने इस उच्चस्तरीय तकनीकी जांच समिति के गठन के संबंध में जानना चाहा. पूछा कि आपको जांच के लिए कब निर्देश मिला. इस पर मुख्य अभियंता सह संयोजक का जवाब था कि 24.5.06 को निर्देश मिला और हमने 28.05.06 को प्रतिवेदन दे दिया. फिर समिति ने पूछा कि मात्र 3 दिन में आपलोगों ने प्रतिवेदन तैयार कर लिया तो बताये कि उच्चस्तरीय तकनीकी समिति की कितनी बैठकें हुई? अलग-अलग फाइल बनाकर तीनों सदस्यों को आपके द्वारा कागजात भेजा गया था अथवा नहीं? इस पर अभियंता प्रमुख (श्री घूरन राम) का जवाब था कि ‘‘नहीं भेजा गया था, सभी कागजात संयोजक के पास थे’’. इस पर संयोजक द्वारा बताया गया कि एक दिन फाइल हम छोड़ दिये थे. समिति ने पुन: जानना चाहा कि तीनों सदस्यों से आपका विमर्श हुआ? इस पर मुख्य अभियंता ने कहा, ‘‘महोदय, श्री घूरन राम के यहां फाइल दिनांक 27.05.06 को दी थी. इस पर अभियंता प्रमुख (श्री घूरन राम) ने कहा कि मैंने रिपोर्ट पर केवल दस्तखत किया है, संचिका नहीं दी गई थी. और रिपोर्ट पर ही साइन करने को कहा गया था. ऐसी स्थिति में केवल प्वाइंट पढ़कर साइन कर दिया था. कार्यान्वयन समिति ने संयोजक से जानना चाहा कि इतने महत्वपूर्ण विषय से संबंधित यह संचिका थी, इस पर विचार करने के लिए तथा इसका अध्ययन- विश्लेषण करने के लिए आपको कितना समय मिला? इस पर मुख्य अभियंता सह संयोजक ने कहा कि नगर विकास विभाग में मैं पहले से था और इस विषय के बारे में मैं जानता था. इस उत्तर पर समिति ने कहा कि तब तो आपको संयोजक बनना ही नहीं चाहिए था, क्योंकि आप सभी तथ्यों से अवगत थे. इस पर मुख्य अभियंता का कहना था कि पेपर (समाचार पत्र) में इसके बारे में जो बातें छपती रहती थी, उसी को पढ़कर मुझे जानकारी होती थी. इस पर समिति ने कहा कि पेपर में तो इस बारे में केवल आलोचना ही निकलती थी, लेकिन आपने तो रिपोर्ट में केवल प्रशंसा की है. आपने तीन दिनों में ही रिपोर्ट तैयार कर दी. अगर आप डिस्कशन करते तो कम से कम 3-4 दिन उसमें लगते कि नहीं? संयोजक के नाते रिपोर्ट तैयार करने के लिए आपको कितना समय मिला? आपको तो रिपोर्ट तैयार करने के लिए मात्र एक-डेढ़ दिन ही मिला. इसका मतलब हुआ कि सदस्यों के बीच सहमति बनने के पूर्व ही आज की यह रिपोर्ट तैयार थी? कार्यान्वयन समिति ने संयोजक से पूछा कि क्या पूर्व में विधान सभा की विशेष जांच समिति को एक तथ्यात्मक विवरणी सरकार ने इस बारे में दिया था, जिसमें यह निविदा केवल दो मुहरबंद लिफाफों में देने की बात कही गई है.

इस संबंध में मुख्य अभियंता-सह-संयोजक ने स्पष्ट किया कि जब फाइल दी गयी, उस समय भी इसमें दो ही चीज कही गयी थी. इसका नहीं पता था कि तीन लिफाफा में निविदा आनी थी. इस पर समिति का कहना था कि आपने केवल दो दिन में रिपोर्ट तैयार करा दी, इस जिम्मेदारी को आपने काफी हल्के से लिया. यह विधान सभा से निर्देशित कार्य था. यह केवल सरकार का काम नहीं था. आपने तो इस प्रतिवेदन में मैनहर्ट को बचाने की भरपूर कोशिश की है. इस संबंध में उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का संयोजक होने के नाते और भी कुछ कहना चाहते हैं तो आप इसके लिए स्वतंत्र है, आप अपनी बात रखिये. इस पर मुख्य अभियंता ने कहा कि समिति के सामने दो ही प्रोपोजल थे, एक टेक्निकल तथा दूसरा फाईनेंशियल बीड. उसी की जांच की गई जो इस संचिका में आया था. कार्यान्वयन समिति ने उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक के संबंध में अपना मंतव्य अंकित कराया, जो निम्नवत है :-

‘‘प्रासंगिक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति के 3 सदस्य विगत 17 नवम्बर 2006 को समिति के समक्ष उपस्थित हुए थे. इनके मंतव्य समिति की बैठक की कार्यवाही में अंकित है जिससे स्पष्ट होता है कि समिति के एक सदस्य श्री घूरन राम को संचिका नहीं भेजी गयी. उन्हें संचिका दिखायी गयी और रिपोर्ट पर ही साइन करने को कहा गया. एक अन्य सदस्य श्री केडिया ने कहा कि उनकी माता जी के देहान्त के कारण वे पूरा समय नहीं दे सके थे. एक दिन संचिका देखकर संतुष्ट हुए. इस उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक द्वारा समिति के समक्ष दिए गए मंतव्य परस्पर विरोधी हैं. इससे सिद्ध होता है कि उनके द्वारा तैयार किया गया प्रतिवदेन पक्षपातपूर्ण है और तथ्यों को ध्यान में रखे बगैर तैयार किया गया है. समिति के अन्य दो सदस्यों को जांच प्रतिवेदनों पर ध्यान देने का पूरा मौका नहीं दिया गया. उनका यह आचरण अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही का द्योतक है. विधान सभा की विशेष जांच समिति द्वारा इंगित प्रासंगिक विषय के तकनीकी पहलुओं की जांच के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति के संयोजक के नाते उन्होंने विधान सभा की विशेष जांच समिति की अनुशंसा में निहित निर्देश को गंभीरता से नहीं लिया है. इसके लिए वे स्वयं पूर्णत: जिम्मेदार हैं. समिति नगर विकास विभाग के सचिव को निर्देश देती है कि वे उच्चस्तरीय समिति के संयोजक सह मुख्य अभियंता, आरआरडीए के आचरण की जांच करें और इस संबंध में सरकार को आवश्यक कार्रवाई हेतु अपना मंतव्य भेजें या अपने स्तर से आवश्यक कार्रवाई करें.’

समिति के इस निदेश के आलोक में संयोजक, आरआरडीए के आचरण की जांच एवं उनके संबंध में आवश्यक कार्रवाई करने हेतु सभा सचिवालय के पत्रांक 5347 दिनांक 06.12.2006 द्वारा सरकार के नगर विकास विभाग को पत्र भेजा गया. इस पत्र के आलोक में की गई कार्रवाई की सूचना आज तक अप्राप्त है. अर्थात इस पर कोइ कारवाई नहीं की गई. झारखण्ड विधान सभा सचिवालय पत्र संख्या- कार्या. सं. 03/06-5347/वि.स. प्रेषक, श्री राजेन्द्र प्रसाद सिंह, विशेष सचिव, झारखण्ड विधान सभा, रांची.

सेवा में,

सचिव,

नगर विकास विभाग,

झारखण्ड सरकार, रांची.

रांची, दिनांक – 06 दिसम्बर, 2006

विषय : सदन द्वारा गठित विशेष समिति की अनुशंसाओं के आलोक में क्रियान्वयन हेतु नगर विकास विभाग द्वारा गठित उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक-49 सह-तत्कालीन मुख्य अभियंता, आरआरडीए की आचरण की जांच करने और कार्रवाई हेतु सरकार को आवश्यक मंतव्य भेजने के संबंध में.

महोदय,

उपर्युक्त विषय के संबंध में निर्देशानुसार मुझे सूचित करना है कि झारखण्ड विधान सभा की कार्यान्वयन समिति दिनांक 17.11.06 को उच्चस्तरीय तकनीकी की समिति के संयोजक एवं सदस्य के साथ विचार-विमर्श की थी, विचार-विमर्श के क्रम में समिति के संज्ञान में यह तथ्य आया है कि समिति के एक सदस्य श्री घूरन राम को उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के सदस्य होने के बावजूद संचिका नहीं दी गई और रिपोर्ट पर ही साइन करने को कहा गया. एक अन्य सदस्य श्री निर्मल कुमार केडिया द्वारा बताया गया कि उनकी माताजी के देहान्त हो जाने के कारण वे पूरा समय नहीं दे सके थे. एक दिन संचिका देखकर संतुष्ट हुए. उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक का समिति के समक्ष दिये गये मंतव्य भी परस्पर विरोधी है. इस पर समिति का मत गठित हुआ है कि तैयार किया गया उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का प्रतिवेदन पक्षपातपूर्ण है, तथ्यों को ध्यान रखे बगैर तैयार किया गया है. समिति के अन्य दो सदस्यों को विषयवस्तु पर ध्यान देने का पूरा मौका नहीं देने के कारण संयोजक का आचरण अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाही का द्योतक है. विधान सभा की विशेष समिति के द्वारा प्रासंगिक विषय के तकनीकी पहलुओं की जांच के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति के संयोजक के नाते उन्होंने विधानसभा की विशेष जांच समिति की अनुशंसा में निहित निर्देश को गम्भीरता से नहीं लिया. तथ्यों की छान-बीन और विश्लेषण के उपरांत की गई अनुशंसा के लिए वे स्वयं पूर्णत: जिम्मेदार है. इस पर दिनांक 01.12.06 की बैठक में समिति द्वारा सचिव, नगर विकास विभाग को निर्देश दिया गया है कि वे उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक सह तत्कालीन मुख्य अभियंता, आरआरडीए के आचरण की जांच कर उनके संबंध में कार्रवाई हेतु आवश्यक मंतव्य सरकार को भेजे. अत: आपसे अनुरोध है कि समिति के निर्देश के अनुसरण में ली गई कार्रवाई से समिति को अवगत कराने की कृपा की जाय. विश्वासभाजन

(राजेन्द्र प्रसाद सिंह)

विशेष सचिव

झारखण्ड विधान सभा, रांची.

सार संक्षेप :-

  1. उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का गठन अनियमितता के सबूतों पर लीपापोती करने के उद्देश्य से किया गया प्रतीत होता है.
  2. उच्चस्तरीय तकनीकी समिति ने स्वीकार किया है कि निविदा मूल्यांकन का जो विवरण उसे नगर विकास विभाग द्वारा दिया गया उसमें निविदा दो ही लिफाफों में देने का उल्लेख था. एक तकनीकी लिफाफा और दूसरा वित्तीय लिफाफा.
  3. इस समिति को भी सरकार ने योग्यता वाले लिफाफा के बारे में नहीं बताया. कारण कि योग्यता के मापदंड के आधार पर मैनहर्ट अयोग्य था. इस समिति और मैनहर्ट की नियुक्ति में अनियमितता के दोषियों के बीच सांठ-गांठ प्रतीत होती है.
  4. विधान सभा की विशेष जांच समिति को भी और जांच समिति की अनुशंसा के तकनीकी बिन्दुओं की जांच करने के लिए नगर विकास विभाग द्वारा गठित उच्चस्तरीय तकनीकी समिति को भी नगर विकास विभाग ने गुमराह किया है, प्रभावित किया है, यह एक आपराधिक कृत्य है.
  5. उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के संयोजक एवं दो अन्य सदस्य तत्पर रहते और सही रिपोर्ट देते तो अयोग्य मैनहर्ट की नियुक्ति उसी क्षण रद्द हो जाती. सरकार के भ्रष्ट आचरण का यह ज्वलंत उदाहरण है. अयोग्य होने के बावजूद मैनहर्ट की नियुक्ति उच्चस्तरीय साजिश का परिणाम है.

डिस्क्लेमर- (लेखक झारखंड के पूर्व मंत्री रह चुके हैं. यहां प्रकाशित विचार उनके निजी हैं. इसका न्यूज विंग से कोई संबंध नहीं है.)

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