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जानिए कैसे बीते पांच साल के रघुवर काल में टाटा प्रबंधन हुआ मजबूत और मजदूर हुए कमजोर- (1)

Akshay Kumar Jha

Ranchi/Jamshedpur: मजदूरों की वोट के बदौलत लगातार पांच बार विधायक और उसी रिकॉर्ड के आधार पर किसी सूबे का मुखिया बनना ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं. जी हां, बात हो रही है जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा से मौजूदा विधायक और झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की. रघुवर दास हमेशा अपने आप को एक मजदूर बताते हैं. वाकई वो टाटा कंपनी में मजदूर थे. वहीं की राजनीति उन्होंने की और मिसाल कायम किया.

लेकिन रघुवर दास के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में टाटा में काम करने वाले मजदूरों के विकास का जितना ग्राफ गिरा. उतना कभी नहीं गिरा था. टाटा स्टील, टाटा मोटर, टिन प्लेट इंडिया, तार कंपनी, जेमको, टाटा कमिन्स, ब्लू स्कोप जैसी तमाम कंपनियां रघुवर दास के विधानसभा क्षेत्र में हैं. इस विधानसभा में 60 फीसदी से ज्यादा वोटर इन्हीं कंपनियों में काम करने वाले परिवार के हैं.

जिस 86 बस्ती को मालिकाना हक दिलाने के नाम पर जमशेदपुर पूर्वी में राजनीति उठा-पटक दो दशक से होती चली आ रही है. उन बस्तियों में अब 25000 से ज्यादा घर बन गए हैं. अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनके वोट किसी के जीत हार के लिए कैसे जरूरी हैं.

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2015 के टाटा वर्कर्स यूनियन चुनाव से शुरू होती है कहानी

2015 से पहले पीएन सिंह टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष हुआ करते थे. बताया जाता है कि टाटा प्रबंधन को वो नापंसद थे. वजह थी, मजदूर हित के लिए प्रबंधन पर दवाब बनाना. उन्होंने अपने कार्यकाल में प्रबंधन से ऐसे-ऐसे काम करवाए कि वो मैनेजमेंट की आंखों में खटकने लगे. यूनियन, मैनेजमेंट और वहां की राजनीति को नजदीक से जानने वाले एक शख्स बताते हैं कि 2015 के यूनियन चुनाव से पहले रघुवर दास के घर के ही किसी के शख्स ने टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष पीएन सिंह को फोन किया.

फोन पर पीएन सिंह को बताया गया कि रघुवर दास के आवास पर टाटा कंपनी के वीपी सुनिल भास्करन पहुंचे थे. उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने यह इच्छा जतायी है कि इस बार यूनियन चुनाव में पीएन सिंह किसी हाल में जीतने नहीं चाहिए.

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यह बात सुनकर पीएन सिंह और यूनियन के कई पदाधिकारी रघुवर दास के आवास पहुंचे. लेकिन रघुवर दास ने उन्हें संतावना दिया और निश्चिंत रहने को कहा. यह मामला उस वक्त के अखबारों की सुर्खियां भी बनी थीं. यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव तो हुआ, लेकिन चुनाव प्रक्रिया को लेकर कई तरह के आरोप लगाए गए.

चुनाव पूरी तरह से प्रशासन की देख-रेख में हो रहा था. बताया जाता है कि रांची सीएमओ कार्यालय से चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखी जा रही थी. पुख्ता सबूत जो चुनाव को उस वक्त कवर कर रहे थे, उनका कहना है कि हर चुनाव में मतदान गुप्त होता है और मतगणना सार्वजनिक. लेकिन इस चुनाव का मतदान और मतगणना दोनों गुप्त हुए. नतीजा, जो पीएन सिंह वहां के मजदूरों के चहेते थे, वो हार गए और प्रबंधन को एक मन चाहा यूनियन अध्यक्ष आर रवि प्रसाद के रूप में मिल गया.

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2015 के बाद गयीं 4000 नौकरियां, बोनस हुए प्रभावित

टाटा कंपनी के लिए अब प्रबंधन, यूनियन और सरकार सभी एक थे. कंपनी ने ऐसे-ऐसे कदम उठाए, जो कभी भी नहीं उठाए गए थे. वीआरएस देकर या दूसरे तरीकों से 2015 के बाद टाटा कंपनी के करीब 4000 कामगारों से रोजगार छीन लिया गया.

कंपनी और यूनियन के वेज रिवीजन की बैठकों का नतीजा इस बात से समझा जा सकता है कि कंपनी घाटे की सूरत में भी 8.33 फीसदी बोनस कर्मियों को देने के लिए बाध्य थी. लेकिन कंपनी की तरफ से जो तीन बार बोनस उन्हें मिले हैं, वो दो बार 8.5 और एक बार 10 फीसदी था. जो कि पीएन सिंह के कार्यकाल में कभी नहीं हुआ था. प्रबंधन जैसा चाह रहा था, कंपनी में वैसा काम हो रहा था. यूनियन की संरचना सिर्फ दिखावे वाली बन गयी.

प्रशासन की मदद से चुनाव में हुई थी धांधली, 105 करोड़ कम मिला बोनसः पीएन सिंह

इस पूरे मामले पर टाटा वर्कर्स यूनियन के पूर्व अध्यक्ष पीएन सिंह का कहना है कि यह बात मैं ही नहीं बल्कि टाटा कंपनी से जुड़े हर लोग जानते हैं कि 2015 के टाटा वर्कर्स यूनियन के चुनाव में प्रशासन की मदद से धांधली हुई थी.

इसका नतीजा यह हुआ कि लगातार तीन साल जो बोनस मिला, उसमें करीब 105 करोड़ कम रुपए कर्मियों के बीच बंटे. पुराने फॉर्मूले पर अगर बोनस मिलता तो ऐसा नहीं होता. चुनाव होने के बाद रघुनंदन पांडे ने कोर्ट में केस किया.

लेकिन सरकार या प्रबंधन के दवाब में रघुनंदन पांडे को केस वापस लेना पड़ गया. वहीं कितने लोगों की नौकरी गयी, इसका सही आंकड़ा मेरे पास नहीं है. मेडिकल एक्सटेंशन जाने से ज्यादा नौकरियां गयी हैं. और भी कई कारण हैं नौकरी जाने की.

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