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अर्जुन मुंडा के लिए कंटीली है खूंटी की राह, कई चुनौतियों से होना होगा दो-चार

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  • खूंटी है जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए संघर्ष की भूमि
  • सरकारी नीतियों के खिलाफ रहा है आंदोलन का केंद्र

Pravin kumar

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भाजपा की परंपरागत लोकसभा सीट खूंटी से इस बार पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा मैदान में हैं. भाजपा के दिग्गज नेता कड़िया मुंडा का टिकट काट कर इस बार अर्जुन मुंडा को उतारा गया है.  यूं तो खूंटी में भाजपा का जनाधार है, लेकिन अर्जुन मुंडा के समक्ष कई जमीनी चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं.

2004 में ध्वस्त हुआ था भाजपा का किला

खूंटी लोकसभा क्षेत्र मुंडा समुदाय का रहा है. जहां किसी भी गैर मुंडा के लिए चुनाव में कामयाब होना मुश्किल है. हालांकि 1984 की इंदिरा गांधी की मौत के बाद कांग्रेस की लहर में साईमन तिग्गा की जीत एकमात्र अपवाद है. मुंडाओं का यह इलाका जल, जंगल, जमीन की हिफजात के लिए किये गये संघर्षों और शहादत का केंद्र रहा है. खूंटी में भाजपा का मजबूत गढ़ होने के बावजूद भी हाल के वर्षों में भाजपा विरोध के तीखे तेवर यहां के लोगों के बीच में देखने को मिला. जो अलग-अलग तरह के आंदोलनों के रूप में समाने आया है.

खूंटी सीट का इतिहास

जयपाल सिंह मुंडा ने इस सीट से 1952,1957,1962 में हैट्रिक लगायी. इसके बाद झारखंड पार्टी से निर्मल एनम हारो जैसे दिग्गज ने 1971,1980 में प्रतिनिधित्व किया. कड़िया मुंडा पहली बार जनता लहर में 1977 में सांसद बने. इसके बाद कड़िया मुंडा को 1980, 1984 में हार का समाना करना पड़ा. जब भाजपा इलाके में मजबूत हो गई तो लगातार पांच बार 1989, 1991, 1996, 1998 और 1999 में जीतने के बाद 2004 में सुशीला केरकेट्टा ने कड़िया मुंडा और भाजपा के विजय अभियान को रोका. 2009 और 2014 में कड़िया मुंडा फिर से सांसद बने और 2019 के चुनाव में कड़िया मुंडा के स्थान पर अर्जुन मुंडा को टिकट दिया गया.

क्या-क्या चुनौतियां होंगी अर्जुन मुंडा के समक्ष

आर्सेलर मित्तल कंपनी के साथ एमओयू- विस्थापन विरोधी आंदोलन जिसमें कोयल कारो विरोधी आंदोलन के साथ-साथ अर्जुन मुंडा के मुख्यमंत्री काल में आर्सेलर मित्तल कंपनी से किए गये एमओयू के कारण चार प्रखंडों में बड़े पैमाने पर विस्थापन की संभावना बनी थी. 2005 से 2009 तक मित्तल का विरोध भी होता रहा था. कंपनी को 25 हजार एकड़ जमीन देने पर अर्जुन मुंडा सरकार ने सहमति दी थी. इसके विरोध में दयामनी बरला के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन किया गया था. जिसके बाद मित्तल कंपनी को भागना पड़ा. उस इलाके में अर्जुन मुंडा को वोट मिलना आज भी एक परेशानी का कारण बना रहेगा. भाजपा सरकार ने 2016 में सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन का प्रयास किया. जिसके विरोध में हुए आंदोलन का केंद्र खूंटी ही रहा. ऐसे में भाजपा सरकार की नीतियां भी अर्जुन मुंडा की मुश्किल बन सकती है.

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लैंड बैंक- भाजपा सरकार की नीति के तहत कॉर्पोरेट और उद्योग के लिए लैंड बैंक बनाया गया है. जिसमें आम रास्ता से लेकर मसना, चर्च और स्कूल की जमीन को भी दर्ज कर लिया गया है. जिसे लेकर भी इलाके में काफी आक्रोश है.

नक्सल- खूंटी में भाजपा के मजबूत रहते हुए भी राजनीतिक शून्यता का महौल है. पिछले 12 सालों में इस क्षेत्र में नक्सल और कई अपराधिक समूह खड़े हो गए हैं जिसके कारण स्थानिय लोगों की काफी तादाद में जानें गई हैं.

पत्थलगड़ी- राजनीतिक शून्यता और क्षेत्र में मूलभूत सुविधा के कारण गांव के विकास और पांचवी अनुसूची के तहत संविधान प्रत आधिकारों को पाने के लिए क्षेत्र के लोगों ने पत्थलगड़ी का सहारा लिया. जिसे राज्य सरकार ने कभी अफीम की खेती को संरक्षण तो कभी चर्च के लोगों द्वारा पत्थलगड़ी किये जाने का नाम दिया. इसके बाद पत्थलगड़ी में करीब 45 लोगों को जेल में डाला गया और उनपर कई संगीन मामले भी दर्ज किये गये. साथ ही घाघरा में पत्थलगड़ी को दमन करने के लिए बेरहमी से महिलाओं और बच्चों को भी पीटा गया. जिसका खामियाजा भी अर्जुन मुंडा को भुगतना पड़ सकता है. पांचवीं अनुसूची/ पेसा कानून को लागू ना करना इलाके में बड़ा मुद्दा है. जो कि अर्जुन मुंडा के समक्ष बड़ी चुनौती होगी.

कड़िया मुंडा का टिकट कटना- भाजपा के द्वारा कड़िया मुंडा का टिकट काटे जाने पर कड़िया के समर्थकों के बीच खासी नाराजगी है. वहीं अगर कड़िया मुंडा की बात की जाए तो उनकी पसंद कोचो मुंडा रहे हैं. ऐसे में अर्जुन मुंडा को टिकट देने पर भाजपा के कोर वोट में सेंध लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.

आरएसएस- भाजपा के सहमना संगठन आरएसएस की नर्सरी से अर्जुन मुंडा का ना होना उनके समक्ष चुनौती बन सकता है. गौरतलब है कि अर्जुन मुंडा झारखंड मुक्ति मोर्चा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं. जिसके कारण अर्जुन मुंडा के लिए आरएसएस के लोगों के बीच में पैंठ बनाना बड़ी चुनौती होगी.

क्षेत्र का विकास- भाजपा का मजबूत आधार रहने के कारण ही खूंटी लोकसभा क्षेत्र से भाजपा आठ बार अपना सांसद भेज सकी है. वहीं राज्य में सबसे लंबे समय तक भाजपा की सरकार और अर्जुन मुंडा के खुद सीएम पद पर रहने के बाद भी मुंडा अंचल का उचित विकास नहीं हो सका. आज भी इलाके के लोग सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. इलाके के कई गांव आज भी पेयजल के लिए डाड़ी पर निर्भर हैं. इसे लेकर ग्रामीणों के बीच जो आक्रोश है उसे शांत करना अर्जुन के लिए चुनौती होगी.

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