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जिस गांव ने देश को दिये कई नेशनल इंटरनेशनल हॉकी स्टार, वहां नहीं बही विकास की बयार

  • अब विधायक भूषण बाड़ा ने करंगागुड़ी को लिया गोद

Ranchi: हॉकी की नर्सरी कहे जाने वाले सिमडेगा में एक नई पहल हुई है. करंगागुड़ी गांव को सिमडेगा विधायक भूषण बाड़ा ने गोद लेने की घोषणा की है. अब देखना है कि गांव की तस्वीर कितनी बदलती है.

यह वह गांव है जहां से अब तक लगभग 3 दर्जन इंटरनेशनल, नेशनल और स्टेट लेवल के प्लेयर निकल चुके हैं. यहां के हर बच्चे को राज्य में हॉकी का जादूगर समझा जाता है. बावजूद इसके हॉकी स्टारों से भरे इस गांव की तस्वीर बदरंग ही रही है. धूल भरे ग्राउंड पर खूले पैर हॉकी की स्टिक लेकर उतरने वाले नन्हे प्लेयरों के लिए अब यहां एस्ट्रो टर्फ ग्राउंड भी बनेगा. स्कूलों, अस्पतालों की सुविधाओं में बढ़ोत्तरी होगी, पानी, बिजली समस्या औऱ रोड कनेक्टिविटी को भी बेहतर बनाया जायेगा.

संगीता, सुषमा, ब्यूटी ने बढ़ाया है मान

सिमडेगा के केरसई ब्लॉक की पंचायत है बासेन. जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर बसे इसी पंचायत का एक गांव करंगागुड़ी है. इसी गांव की संगीता कुमारी, सुषमा कुमारी, ब्यूटी डुंगडुंग ने पिछले दिनों चिली में आयोजित इंटरनेशनल हॉकी चैंपियनशिप में देश का मान बढ़ाया था.

जूनियर महिला हॉकी टीम ने वहां जो सफलता पायी, उसमें इन तीनों का बड़ा रोल रहा. इसके अलावे पूर्व में यहां से रेशमा सोरेंग, दीपिका सोरेंग, विभा केरकेट्टा, रजनी सोरेंग, रीना बा, सलीमा टेटे औऱ ऐसे ही दूसरे इंटरनेशनल प्लेयर निकल चुके हैं. तकरीबन ये सभी प्लेयर आरसी मिशन स्कूल करंगागुड़ी से ही प्राइमरी शिक्षा लेकर निकली हैं.

कैसे करंगागुड़ी बना हॉकी की नर्सरी

बासेन के मुखिया शिशिर मिंज के अनुसार, करंगागुड़ी के हॉकी नर्सरी बनने की कहानी कई दशक पुरानी है. गांव के स्कूल आरसी मिशन में फादर वेनेदिक की नियुक्ति हुई थी. इसके बाद से गांव में हॉकी को लेकर बदलाव की बयार बहनी शुरू हुई.
ग्रामीण बच्चों के हॉकी में रुचि को देखते हुए वे कहते थे कि किताब भले घर में छूट जाये, पर हॉकी स्टिक नहीं छूटनी चाहिये. अगर किसी दिन कोई छात्र स्टिक लाना भूल गया तो उसे स्कूल से बाहर कर दिया जाता था. किसी से पास स्टिक नहीं होता था, उसे फादर खुद तत्काल इंतजाम कर देते थे. ये नियम आज तक जारी है. इसके बाद से लगातार स्कूल के पास के ग्राउंड पर बच्चे खूले पैर बांस से बने हॉकी स्टिक लिये आते ही रहे हैं.

लड़के और लड़कियां साथ में अभ्यास करने लगे. आसपास के इलाकों में हॉकी टूर्नामेंट का आय़ोजन होता था. इसमें यहां के प्लेयर अच्छे प्रदर्शनों से छाते गये. हॉकी से जुड़े ट्रेनरों, खेल संघों ने इन खिलाड़ियों का सेलेक्शन करना शुरू किया. यह परंपरा अब भी है. वर्तमान में स्कूल के प्रिंसिपल फादर पौलुस बागे के समय में भी यह परंपरा जारी है.

शिशिर के अनुसार, फादर वेनेदिक की प्रेरणा से यहां के बच्चों के लिए पढ़ाई से ज्यादा हॉकी मैच में अव्वल आना शान की बात होती रही है. इनके मां-बाप पैसा इसलिए भी जमा करते हैं कि वे अपने बच्चों को किसी तरह हॉकी खेलने वाला खास जूता दे सकें.

अब क्या होने वाला है बदलाव

भूषण बाड़ा ने करंगागुड़ी गांव में ही एस्ट्रोटर्फ हॉकी स्टेडियम बनवाने के लिए पहल करने की घोषणा की है. साथ ही गांव का चहुमुखी विकास कराने का भी भरोसा दिलाया है. अधिकारियों को एक सप्ताह के अंदर गांव में बिजली, पानी, सड़क को दुरुस्त करने को कहा गया है.

बीडीओ को गांव का सर्वे करके जरूरी सुविधाओं को पूरा करने की जिम्मदारी दी गयी है. गांव के हर घर में नल के माध्यम से पानी पहुंचाया जायेगा. करंगागुड़ी गांव के खिलाड़ियों को खेल किट, पौष्टिक आहार और प्रशिक्षण की बेहतर सुविधा दिलाने की भी पहल होगी. हॉकी खिलाड़ियों के गांव को दूसरों के लिये मॉडल गांव बनाया जायेगा.

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