
Ranchi : झामुमो के 12 वें महाधिवेशन में दिशोम गुरु शिबू सोरेन को लगातार 10वीं बार निर्विरोध पार्टी की कमान सौंपी गयी है. साथ ही मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पार्टी ने विश्वास जताते हुए सर्वसम्मति से कार्यकारी अध्यक्ष चुन लिया गया. वहीं, महाधिवेशन में राजनीतिक प्रस्ताव भी पारित किये गये. पारित प्रस्ताव में राज्य में स्थापित निजी प्रतिष्ठानों व औद्योगिक इकाइयों में 75 प्रतिशत मूलवासी-आदिवासी(स्थानीय) को नौकरी देने की वकालत की गयी. हर हाथ को काम के तहत रोजगार से जोड़ने का संकल्प लिया गया. महाधिवेशन में विस्थापन आयोग के गठन पर भी बल दिया गया. प्रस्ताव में कहा गया कि राज्य की भौगोलिक बनावट के अनुरूप अनुसूचित जनजाति समाज(एसटी) को 28 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) को 27 प्रतिशत और अनुसूचित जाति समाज (एससी) को 12 प्रतिशत आरक्षण चाहे वो सरकारी या गैर सरकारी नौकरी में हो या फिर शिक्षण संस्थान में हों उन्हें लाभ देना है.
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी जोर दिया गया. कहा गया कि 43 प्रतिशत खेतिहर भूमि राष्ट्रीय औसत 76 प्रतिशत से काफी कम यानी लगभग आधी है. यह गंभीर चिंता का विषय है. कृषि ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूल मंत्र है फसल के उत्पादन उनका विपणन एवं बाजारों की उपलब्धता के अभाव में लोग मेहनत के एवज में उचित सम्मानजनक रोजगार से वंचित हैं. फसल एवं उपज को बाजार के बिचौलिए से भी काफी प्रभावित होना पड़ता है. राज्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था , सामाजिक सशक्तिकरण का भी आधारभूत जमीन तैयार करना प्राथमिकता होगी.
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उद्योग, खनन और व्यवसाय पर भी जोर
माहाधिवेशन में पारित प्रस्ताव में झामुमो ने उद्योग, खनन और व्यवसाय पर भी जोर दिया. प्रस्ताव में कहा गया कि झारखंड राज्य में खनिज संपदा, जैव संपदा, मानव संपदा, आधारभूत संरचना एवं कुशलता के कारण स्वाभाविक रूप से बड़े बड़े औद्योगिक घरानों की आंखें हमारे राज्य की ओर है. औद्योगिक घरानों की आंखें मुनाफा कमाने तथा स्थानीय लोगों के शोषण के सपने देखती है देश का यह पहला राज्य है जहां एक ही भाग में हीरा, सोना, कोयला, लोहा, मैगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट, यूरेनियम, तांबा, ग्रेनाइट, लाइमस्टोन व ब्लू चिप्स की भरमार है. झामुमो ने अपने प्रस्ताव में उद्योग, व्यवसाय व खनन पर्यटन में जनभागीदारी सुनिश्चित करने के प्रति गंभीरता जतायी है. प्रस्ताव में कहा गया कि खनन या उद्योग के पट्टे कालबद्ध तरीके से आवंटित किये जायें ताकि रैयतों का मालिकाना हक समाप्त ना हो. उद्योग के किसी भी प्रकार से असफल रहने पर वह भूखंड व्यक्तिगत व्यवसाय उपयोग में न लायी जाये. उन्हें पुनः भू-रैयतों को वापस कर दी जाये.
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