
- पिछले चार साल से 24 घंटे बिजली देने का दावा पर दावा करते रहे बिजली वितरण निगम के एमडी
- किसी भी जिले में अब तक 24 घंटे निर्बाध बिजली नहीं, 13 जिलों में बिजली की स्थिति लचर
Ranchi: प्रदेश की बिजली व्यवस्था की स्थिति डोलड्रम की तरह हो गई है. 13 जिलों में बिजली की स्थिति बदत्तर है. आंधी-पानी हो तो बिजली गुल, वहीं गर्मी ऑन तो बिजली गॉन.
पिछले चार साल में बिजली की उपलब्घता की स्थिति पर गौर करें, तो किसी भी जिले में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो पायी है.
सीएम के साथ बिजली वितरण निगम के एमडी भी पिछले चार साल से दावा पर दावा करते रहे कि राज्य में 24 घंटे निर्बाध बिजली की आपूर्ति की जायेगी.
कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावे और बिजली की स्थिति की कॉपी भी मीडिया को उपलब्ध करायी गयी. लेकिन हालात जस के तस हैं. फिलहाल राजधानी में वितरण निगम 23 घंटे बिजली देने का दावा कर रहा है. लेकिन स्थिति सबके सामने है.
घोषणा और दावा तो होते रहे, लेकिन घोषणा और दावा को पूरा करने के लिये सरकार ने चार सालों में कुछ भी नहीं किया. यही वजह है कि आज पूरा राज्य बिजली संकट से जूझ रहा है.
इसे भी पढ़ेंःविदाई के बाद प्रेमी के साथ फरार हुई दुल्हन, दोनों ने थाना में किया सरेंडर
वहीं गिरिडीह, गढ़वा,लातेहार, पलामू, चतरा, चाईबासा, गुमला, लोहरदगा, खूंटी, गोड्डा, साहेबगंज, देवघर और दुमका में आठ से 10 घंटे बिजली की आपूर्ति नहीं होती है.
झारखंड चेंबर ने कहा, नहीं संभल रही व्यवस्था तो छोड़ दें पद
झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष दीपक मारू ने स्पष्ट कहा है कि बिजली वितरण निगम की अकर्मण्य शैली के कारण निर्बाध बिजली आपूर्ति की परिकल्पना असंभव है.
बिजली वितरण निगम के एमडी राहुल पुरवार को उदारता दिखाते हुये बिजली वितरण के कार्य से स्वयं को मुक्त करने की घोषणा कर देनी चाहिये, यही बेहतर होगा.
यदि वितरण निगम राज्यवासियों को निर्बाध बिजली देने के हक से वंचित रखता है, तो राज्य सरकार इस पर तत्काल संज्ञान ले. देवघर में अंडरग्राउंड केबलिंग के नाम पिछले एक साल से आठ घंटे आपूर्ति बाधित की जा रही है. गुमला, पलामू, लातेहार, गढ़वा, सहित संताल में सात से आठ घंटे बिजली नहीं रहती.
सेंट्रल और निजी कंपनियों पर टिकी है बिजली व्यवस्था
प्रदेश की बिजली व्यवस्था सेंट्रल और निजी कंपनियों पर पूरी तरह से टिक गई है. पिछले चार साल में बिजली की सुधार के लिये ऐसी कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, जिससे 24 घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित हो सके. चार साल पहले झारखंड में 600 मेगावाट से अधिक बिजली का उत्पादन होता था. आज इसके आधे से भी कम हो रहे हैं. फिर 24 घंटे बिजली देने का वायदा पुरा करना कैसे संभव हो सकता है.
इसे भी पढ़ेंःहाल-ए-मनरेगाः कार्यस्थल पर नहीं मुहैया करायी जाती सुविधा, हादसे में जान गंवा रहे मजदूर
पन बिजली के लिए 68 स्थान चिन्हित किये गये, योजना जमीं पर नहीं उतरी. विंड एनर्जी का प्रस्ताव फाइलों में ही दब गया. सोलर एनर्जी भी एक कदम आगे नहीं बढ़ी.
टीवीएनएल के विस्तारीकरण का मामला भी ठंढे बस्ते में
टीवीएनएल के विस्तारीकरण की स्वीकृति दो साल पहले मिली थी. इससे तहत 660-660 मेगावाट की दो यूनिटें स्थापित की जानी थी. कोल ब्लॉक भी आबंटित है.
लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई. खुद वितरण निगम के पास टीवीएनएल का बकाया बढ़कर लगभग 3100 करोड़ रुपये हो गया है.
इस वजह से टीवीएनएल वित्तीय संकट से गुजर रहा है. वहीं पतरातू के नये पावर प्लांट के शुरू होने के लिए 2020 तक का समय निर्धारित किया गया है. राज्य सरकार के पास प्रदेश में बिजली के लिये और कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है.
पीटीपीएस की यूनिटें बंद हो गयीं, सरकार ने बंद कर ली आंख
रघुवर सरकार के गठन के बाद अगर सरकार ने सबसे पहले कोई फैसला लिया, तो वह था पीटीपीएस (पतरातू थर्मल पावर स्टेशन) को एनटीपीसी को देने का. एनटीपीसी के हाथों पीटीपीएस को सौंपने के लिये जो शर्तें रखीं गयीं, उसे सुविधानुसार बार-बार बदल दी गयी. यह तय था कि पीटीपीएस से उत्पादन बंद नहीं होने दिया जायेगा. उसकी यूनिटों का क्रमशः जिर्णोद्धार होगा. पर, एनटीपीसी ने पीटीपीएस को पूरी तरह बंद कर दिया. अभी तक वहां बिजली उत्पादन शुरु करने का कोई काम भी शुरु नहीं हुआ है. वैसे इसके लिये तो जिम्मेदार तो सरकार है, लेकिन विभाग के मुखिया होने के नाते राहुल पुरवार ने भी कभी एनटीपीसी के मंसूबों पर सवाल नहीं उठाये. सवाल उठाना, आपत्ति करना उनका धर्म था.
अब हर महीने खरीदेंगे 545 करोड़ की बिजली
प्रदेश में पावर प्लांट स्थापित नहीं होने के कारण अब वित्तीय वर्ष 2019-20 में हर महीने 545 करोड़ की बिजली खरीदी जायेगी.
झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग ने पावर परचेज कॉस्ट 6548 करोड़ निर्धारित किया है. फिलहाल बिजली की कमी को पूरा करने के लिये सेंट्रल सेक्टर से 650 मेगावाट तक बिजली ली जा रही है.
गर्मी में पूरे प्रदेश में लगभग 200 मेगावाट की मांग बढ़ी
गर्मी में पूरे प्रदेश में लगभग 200 मेगावाट की मांग बढ़ गई है. ऐसे में वितरण निगम के लिये मांग पूरा करना चुनौती बन गई है. इसके पीछे तर्क दिया गया है एनएचपीसी (नेशनल हाइडल पावर कॉरपोरेशन) पन बिजली परियोजना से लगभग 300 मेगावाट बिजली मिलती है.
गर्मी ने नदियों और डैम का जलस्तर नीचे जाने के कारण कम बिजली का उत्पादन होता है. इस स्थिति में कम बिजली मिलती है.
इसे भी पढ़ेंःहाथियों के उपद्रव रोकने के लिये हर प्रयोग में वन विभाग असफल, अब लाल मिर्च पाउडर का सहारा
कहां से कितनी बिजली मिल रही
| टीवीएनल | 370 मेगावाट तक |
| इंलैंड | 52 मेगावाट तक |
| सीपीपी | 12 मेगावाट तक |
| सेंट्रल सेक्टर से | 550 से 650 मेगावाट तक |
| आधुनिक | 186 मेगावाट, |
| एसइआर | 38 मेगावाट |
| आइइएक्स | 80 से 100 मेगावाट |
कुल मांग बढ़कर हो गई है 1300 मेगावाट तक, जबकि बिजली उपलब्ध रहती है 1100 से 1150 मेगावाट.




