
Raj kishor
Jamshedpur : चुनावी मैदान में जीत हासिल करने की खातिर प्रत्याशी तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं. इसके पीछे मकसद बस यही होता है कि किसी तरह से जनता के दिल में उतरकर अपनी चुनावी जीत सुनिश्चित की जा सके. बावजूद इसके इस तरह के मामले कम ही सामने आये होंगे, जब किसी प्रत्याशी ने करीब सात साल बाद किसी दूसरे नाम से चुनावी मैदान में भाग्य आजमाया हो. फिर भी इस बार के पंचायत चुनाव में इस तरह का भी मामला सामने आया.
मामला जमशेदपुर से सटे सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ क्षेत्र के कुकड़ु प्रखंड के चौड़ा पंचायत क्षेत्र का है. मामला तब ही चर्चा में आ गया था जब बीते महीने पंचायत से मुखिया पद के प्रत्याशी के रुप में सरस्वती सिंह मुंडा के नाम से चुनावी मैदान में उतरने वाली महिला वही साबित होने लगी जिसने वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में रेशमा सिंह मुंडा के नाम से चुनावी मैदान में भाग्य आजमाया था. इस मामले को न्यूज विंग ने जोरशोर से उठाया था. उस दौरान यह भी बात सामने आयी थी कि सरस्वती सिंह मुंडा के नाम से चुनावी मैदान में उतरने वाली रेशमा सिंह मुंडा पेयजल विभाग में जल सहिया भी है. देखते ही देखते पूरा मामला फर्जीवाड़ा का बनते हुये जांच का विषय बन गया था. यहां तक कि पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के कार्यपालक अभियंता रंजीत कुमार ठाकुर का भी कहना था कि चौड़ा गांव की जल सहिया का नाम रेशमा सिंह मुंडा है, जबकि उनके पति का नाम रंजीत सिंह मुंडा है.
रेशमा सिंह मुंडा को जल सहिया के पद पर काम करने के एवज में प्रति महीने एक हजार रुपये का मानदेय मिलता है. दूसरी ओर रंजीत सिंह मुंडा ने भी स्वीकार किया था कि उनकी पत्नी वर्ष 2015 में रेशमा के नाम से चुनाव लड़ चुकी है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि उसके बाद मैट्रिक के सर्टिफिकेट के आधार पर उनका नाम सरस्वती सिंह मुंडा के रुप में परिवर्तित कर दिया गया था. इस लिहाज यह तो तय हो गया कि तकनीकी रुप से देखें तो मामले को फर्जीवाड़े का रुप देना कहीं से ठीक नहीं होगा. बावजूद इसके क्षेत्र की जनता को क्या पता था कि किस कारण कल की रेशमा आज की सरस्वती के रुप में उनके बीच चुनावी मैदान में क्यों खड़ी है. क्योंकि चुनावी माहौल में इस मामले को ज्यादातर चुनावी जीत हासिल करने का हथकंडा ही समझा गया. खैर चुनाव खत्म होने के बाद चुनावी नतीजे भी सामने आ गये, जिसमें रेशमा से सरस्वती बनी मुखिया पद की प्रत्याशी को क्षेत्र की जनता ने नकार दिया और वह अपने निकटतम प्रत्याशी रीना देवी से 67 मतों के अंतर से चुनाव हार गई. इस चुनावी नतीजे के बाद तो लोग अब यही कह रहे हैं कि चुनाव में जीत हासिल करने की खातिर रेशमा का सरस्वती बनना भी काम नहीं आया. वह जनता का विश्वास नहीं जीत सकी, जो उनकी हार का कारण बना.




