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Interview :  मुझे मेरे डॉयलाग के लिए नहीं, मेरे परफार्मेंस के लिए याद किया जायेगा- केके मेनन 

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Zeb Akhtar

हॉट स्टार पर स्ट्रीमिंग हो रही नीरज पांडेय और शिवम नायर निर्देशित थ्रीलर वेब सीरिज स्पेशल ऑप्स इन दिनों चर्चा में है. इस वेब सीरिज की लीड रोल में केके मेनन हैं. जिन्होंने हिम्मत सिंह के साधारण से किरदार को बेहद संतुलित तरीके से निभाकर फिर से ध्यान खींचा है. भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के मुखिया का यह कैरेक्टर अब तक दिखाये गये कैरेक्टर से हटकर अलग अंदाज में सामने आया है. इस सीरिज के बहाने हमने केके मेनन से उनके लंबे कैरियर पर फोकस डालने की कोशिश की. कोरोना के माहौल में उनसे तीन किस्तों में हुई ये टेलीफोनिक बातचीत उनके 25 साल के लंबे कैरियर में झांकने की कोशिश है. एक अच्छा सिनेमा, एक अच्छे कैरेक्टर को समझने को कोशिश है. वहां से कुछ लाने, खोजने की कोशिश है. यह बातचीत कोरोना के खौफ के माहौल से हमें उतनी देर के लिए तो निकाल ही लेती है जितनी देर हम इसके साथ रहते हैं.

  • स्पेशल ऑप्श से ही शुरू करते हैं….जाने-अनजाने आपके बारे में ये स्टेबलिस्ट हो गया है कि आप गिने-चुने और पसंद के रोल ही करते हैं…यहां तक कि कुछ खास तरह के निर्देशकों के साथ आपने ज्यादा काम किया. .इस सीनारियो में स्पेशल ऑप्श क्यों….इसमें क्या था जो अपीलिंग लगा…स्क्रीप्ट सुनने के समय…लीड रोल को अलग रख दें तो ?
  • नीरज पांडेय, शिवम नायर और शीतल भाटिया (प्रोड्यूसर) की तिकड़ी. इन सभी को मैं निजी तौर पर पिछले 16-17 साल से जानता हूं. शिवम को तो और पहले से. मैंने इन सबका काम देखा है. टेलीविजन के लिए हमने साथ-साथ कई काम किये हैं, स्टार बेस्ट सेलर… कगार, जिसे उमेश पेढालकर ने बनाया था…और दूसरों के लिए भी. नीरज का स्क्रीनप्ले सेंस बहुत ऊंचा है…ये मैंने शुरू से देखा है. निर्देशक के तौर पर तो उनकी पहचान है ही. छोटे-छोटे रोल को असाधारण बना देना और उसमें ह्यूमर डाल देना उनकी खासियत है. और शिवम,  शिवम के साथ काम करना आपको एक अलग जोन में ले जाता है…शिवम किसी कैरेक्टर के परफार्मेंस से तब तक संतुष्ट नहीं होते जब तक उनको उसका फील न आ जाये. वो किसी शॉट को उससे फील आने तक चेज करते रहते हैं. शिवम का हुनर ही इसी पर टिका है. दूसरे वो स्टोरी ट्रीटमेंट के लिए इंडस्ट्री में अलग से जाने जाते हैं. तो सभी की खासियत अलग-अलग और सभी का नजरिया अलग-अलग, इसने मुझे खींचा. और इसका फायदा भी मुझे मिला.
  • फीडबैक कैसा रहा…स्ट्रीमिंग के बाद इसका इंतेजार भी रहा होगा?
  • हां, हर काम के बाद ये मिलता है…ये समझ में आया कि दर्शक अब बहुत बारीकी से स्टोरी, एक्टिंग और टोटलिटी में पर्फामेंस पर नजर लगे हैं….बहुत शार्पली…ये बदलाव हमारे व्यूवर में आया है…ये सब अच्छा लगा. कोई लोगों ने मुझे कई छोटे-छोटे सीन तक के बारे कहा, कुल मिलाकर कहूं तो जितना मैंने सोचना था उससे कहीं ज्यादा रिस्पांस मिल रहा है…और अब तो इसके दूसरे सीजन की भी बात हो रही है.
  • तो अब 25 साल पर आते हैं… सिल्वर जुबली साल… सईद मिर्जा की नसीम से लेकर से लेकर स्पेशल ऑप्स तक… लंबी जर्नी…
  • हां, लंबी जर्नी…आपने याद दिलाया तो ख्याल आया, वैसे बहुत संजीदगी से इसपर अभी तक ध्यान नहीं आया था. बस काम करते हुए, जिंदगी को समझते-पढ़ते हुए इतना वक्त कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला.
  • कैसा रहा ये सफर…चूंकि आप एक खास तरह की भूमिका..तामझाम से अलग, आप कहते भी रहे हैं कि लेविश लाइफ ने कभी आकर्षित किया… आपने जो भी किया मन का किया … पसंद का किया… तो क्या लगता है अब भी कुछ मीसिंग है… जो करना बाकी रह गया है?
  • ये सब होता चला गया, मेरे पास जो काम आया…. और उनमें से जिसके बारे में लगा कि ये मेरे लिए बेहतर है,.. उसे पूरी शिद्दत से किया डूबकर किया… उस किरदार को जिया… फिर जब वो खत्म हो गया तो खत्म हो गया.. मैंने फिर कभी इसका विश्लेषण नहीं किया… इसके लिए अलग लोग हैं…ये मेरे स्वभाव में भी नहीं है.
  • लेकिन एक कलाकार के तौर पर हमेशा मन में रहता है कि कुछ कहीं मीसिंग है. ये करते तो अच्छा होता… या कोई रोल जो करना चाहते हैं और वो अभी तक नहीं मिला… कहीं कुछ कमी सी .. कोई इच्छा ?
  • देखिये इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता. ये मुझे बहुत शुरुआत में या कहें कि जल्दी समझ में आ गया कि ऐसा सोचना व्यर्थ है. नहीं तो ऐसा भी नहीं है कि मन में कुछ नहीं था. लेकिन जिस फील्ड में जिस इंडस्ट्री में मैं हूं, वहां ये चलने वाला नहीं है. और जहां तक मैं समझता हूं ये एक कलाकार के लिए जरूरी भी है कि आप इस सत्य को समझ लें. आपके पास जो काम है उसे करते जाइये… पूरी इमानदारी और डेडिकेशन से करते जाइये. यही सबसे ज्यादा अहम है. लेकिन लोग करते क्या हैं.. उनको जो काम मिलता है वो उसे करते हुए कहीं और नजर लगाये रहते हैं…उनका गोल कहीं और होता है… मेरा मानना है आप जो कर रहे हैं… उसे अच्छे से करते रहिये… गोल खुद आपके पास आता जायेगा…ऐसा सोचकर काम करते हैं तो बहुत सारी चीजें मैजिकल हो जाती हैं. लेकिन अगर आप पहले से गोल फिक्स कर लेते हैं तो मुश्किल आनी ही है. अच्छा ये है कि जब ये आपके दिमाग में आये सोच-विचार कीजिये. अपने आपको संतुलित कीजिये. फिर आपका बेहतर निकलकर आने लगता है…तो अपने आपको संतुलित रखना बेहद जरूरी है. जो आप कर रहे हो जिसके साथ एक दिन, एक पल गुजार रहे हो वहां मगन रहो… जो आपके नसीब में होगा आपको मिलेगा ही… आपको करना इतना ही है कि आपको खुश रहना है. उस पल के लिए… जो आपको आपके काम ने दिया है.
  • सीरिज के एक सीन में केके मेनन.
  • लेकिन अगर फिक्स हो कि यहां पहुंचना है तो एक डाइरेक्शन तो मिलती है…भटकाव का डर नहीं रहता !
  • नहीं, आप जब आप गोल के बारे में सोचते हो तो इसका मतलब है आप उस काम को छोड़ते हो जो आपको मिला है…आप अगर अपने काम को इंजवाय करते हो तो इतना ही बहुत है… लेकिन इससे अलग आप अगर अलग जिंदगी जीने लगते हो तो इससे आइसोलेशन में चले जाने का खतरा है, कम से कम मेरे साथ यही है.
  • कोई ऐसा रोल जो आपको बहुत पसंद आया हो, लगा हो कि ये औऱों से बेहतर हुआ?
  • मैं अपना विश्लेषण नहीं करता, मैंने पहले भी कहा है, ये मेरा काम नहीं है. और मैं नहीं समझता कि कुछ बेहतर हुआ है तो इसका क्रेडिट कलाकार को लेना चाहिये. क्योंकि अगर आपने कुछ अच्छा किया है तो उस काम को करते समय आपने सरेंडर किया हुआ है…अपने अहंकार को भुला दिया है…आप ये नहीं कह सकते कि ये मैंने किया… क्योंकि आप वहां थे ही नहीं, इसलिए आप उस काम का ऑनरशिप नहीं ले सकते. मैं समझता हूं हर फील्ड में ऐसा ही होता है.. चाहे वो एक्टिंग हो राइटिंग या कुछ और.. अभी तो कोरोना है लेकिन जब मैं बाहर निकलता हूं स्पोर्ट खेलता हूं तो उसमें भी उसी लेबल तक जाकर रम जाता हूं. तीन चार सेट की टेनिस होती है. मैं उसी में रम जाता हूं. क्योंकि वो भी मेरी जिंदगी का एक हिस्सा है. जो चला गया. तो जब तक मैं खेलता हूं उस पल को जीता हूं.
  • ये मैजिक की बात आपने अभी कही..इसे थोड़ा और समझना चाहें तो…
  • आप काम करते रहेंगे तो ये आयेगा ही. मेरा यकीन है. लेकिन आप उसे रोकते हैं. अगर          आपने  खिड़की दरवाजा खोलकर रखे हैं.. तो मैजिक आयेगा. क्योंकि उसे आपका अहंकार    नहीं रोक रहा है, उसे आपका डिजायर नहीं रोक रहा है…वो जरूर आयेगा.
  • 25 साल से आप डिटरमाइन हैं इस बीच में कभी लगा होगा कि कि क्यों इतना सेलेक्टिव होना, स्टैंड पर कायम रहना… इस फीलिंग को कैसे कमांड करते हैं, क्योंकि ये बहुत मुश्किल है… आज के समय में 
  • लोगों को भ्रम है कि मैं सेलेक्टिव हूं, एक कलाकार को इसका अधिकार नहीं होता. बस आपके पास जो काम आता है उसी में से आप चूज करते हो … मुझे अपनी मार्केटिंग करनी भी नहीं आती. एक-दो बार कोशिश की तो तो औंधे मुंह गिरा. तो लग गया जो इसमें सक्षम हैं, वो ही इसे कर सकते हैं, मेरे बस का ये नहीं है. मैं एक्टिगं करने में सक्षम हूं. मैं यही करता हूं. ये मुझे मिला है. पैदायशी. औऱ मैंन इसका कभी अपमान नहीं किया. कोशिश रहती है इसको जिंदा रखूं .. उसे सजाऊं-संवारूं.. इसके लिए प्रैक्टिस यो जो भी बन पड़ता है करता हूं. पढ़ने से लेकर फिल्में देखने तक. और कोई चारा भी नहीं है. और इच्छाओं का तो कोई लिमिट नहीं है. ऐसा करोगे तो आप जिंदगी भर नाराज रहोगे. पेसिमिस्टिक रहोगे.
  • तो जब कभी फेल हुए होंगे तो इसी तरह का कंट्रोल रहा होगा खुद पर? 
  • हां, कई बार फेल हुआ. कई फिल्में ऐसी हैं जिनके बारे में लोग जानते नहीं या कम जानते हैं
  • हां, जैसै दीवार औऱ भोपाल एक्सप्रेस जैसी फिल्में…
  • हां, आपने सही कहा, और कई ऐसी भी फिलमें हैं जिसे लोग लोग भूलते नहीं, तो मेरा दोनों है. तो इंपोर्टेंट वही है, जब आप सक्सेस होते हो तो चने की झाड़ पर जाते हो. मेरे साथ ऐसा नहीं होता. मैं बस ग्रेटफुल रहता हू कि लोगों ने मुझे पसंद किया. इसलिए कभी डिप्रेशन में नहीं गया. मैं संतुलित ही रहता हूं. मानसिक तौर से भी.
  • यही मैं पूछना चाह रहा था कि आप इतना संतुलित बने रहते हैं, इसे थोड़ा क्लियर कीजिये
  • मैं फेल और सक्सेस दोनों को अपने दिमाग में जगह नहीं देता हू.. जो लोग मुझे पसंद करते हैं. मेरे काम को पसंद करते हैं उनका आदर जरूर करता हूं. मेरे मामले में यही वर्क करता है. उदाहरण के लिए अगर आपने दस दिन शूटिंग. फिर पांच दिन डबिंग की. तो जीवन के ये पंद्रह दिन आपके चले गये. मेरा कंसंटरेशन ये रहता है कि मैं वो सात या पंद्रह दिन मगन हो कर खुशी-खुशी बिताऊं. क्योंकि मेरी जिंदगी के वो पंद्रह दिन तो चले गये न. मेरा मकदसद यही होता है.. और जब फिल्म बन गयी तो फिर उसकी अपनी डिस्टनी है. उस पर आपका कंट्रोल नही है … तो जब तक हूं पैसोनेट हूं…और एसपेक्टशन कुछ था नहीं, बस काम को इंजवाय किया. अंगरेजी में इसे इक्वाइनिटी कहते हैं. इसका मतलब है सामानांतर तरीके से चीजों को देखो. मैंने देखा है कुछ लोगों को किसी प्रोजेक्ट को लेकर पैसेनेट रहते हैं, उससे लदे रहते हैं, औऱ वो प्रोजेक्ट जब फ्लाप हो जाता है तो डिप्रेशन में चले जाते हैं. फिर वे ये भी भूल जाते हैं कि उनकी अगली फिल्म एक बड़ा हिट हो सकती है. उतार चढ़ाव के बिना जिंदगी है ही नहीं. ये न हो तो फिर बड़ा बोरिंग है सबकु. तो जब आप उड़ रहे हो न तब अपने आपको संभालना औऱ मानसिक संतुलन बहुत जरूरी है.
  • कोई ऐसा रोल जिससे बहुत संतुष्टि मिली या लगा कि हां, यार अच्छा हुआ…
  • आप शायद मेरे बेस्ट रोल के बारे में जानना चाह रहे हैं. देखिये कला के क्षेत्र में दि बेस्ट या दि फेवरेट होता ही नहीं है. मेरा मानना है ये तब हो सकता है जब आप नैरो माइंडेड होते हो. आप देखिये न…कितनी जोनर की फिल्में हैं, कितने कैटेगेरी हैं…इस तरह हर तरह के कलाकार भी हैं. ये लिस्ट बहुत लंबी है. इसलिए मैं इस सवाल का उत्तर नहीं दे पाता हूं. और अगर आप ऐसा सोचने लगते हैं या मानने लगते हैं कि ये बेस्ट था वो फेवरेट था तो लगता है कहीं न कहीं आपका देखने का स्पैक्ट्रम छोटा है. औऱ दुर्भाग्य से अगर ऐसा है तो आप अपने आपको कलाकार बोल भी नहीं सकते हैं. फिर भी मैं बोल सकता हूं मेरे पास 15-16 रोल ऐसे हैं जिसकी लाइफ केके मेनन से भी ज्यादा है. इतना ही है मेरा आउटलुक.
  • 25 साल की इस जर्नी में कभी ऐसा लगा कि आप पहले से कहीं और बेहतर हुए हैं…आपका ग्राफ ऊंचा हुआ है?
  • बढ़ने घटने का तो मुझे पता नहीं लेकिन एक कलाकार को हमेशा रहता है कि मैं कुछ अच्छा करने जा रहा हूं, जिस दिन वो संतुष्ट हो गया उस दिन खत्म. सभी के साथ ये होता है. कलाकार हो, स्पोर्ट्समेन हो..आप रोजर फेडरर को पूछ लीजिये. विंबडलन के इतने कप लेने के बाद भी वो कहेगा हां, यार पिछले मैच में बैक हैंड शार्ट वैसा नहीं हो पाया, तो कलाकार के साथ हमेशा ये रहता है. लेकिन कुछ बारिकियां हैं जो लोगों तक पहुंच नहीं पाती है…
  • हां, ये एक कलाकार के स्तर की बात है, मैं यही समझना चाह रहा था
  • यहीं मैं कह रहा हूं.. जैसे हो सकता है कि वो जो उस दिन मैंने वो सीन किया वो शॉट किया…वो ऐसे भी हो सकता था.. ये होता है. लेकिन ये भी तब होता है जब ..इवेन आइ एम थिंकिंग आउट साइड ऑफ दि शोट…उस वक्त की बात अलग है. जब में बिटविन एक्शन एंड कट होता हूं. क्योंकि उस वक्त मैंने सरेंडर किया हुआ है. उस वक्त मेरा अस्तित्व उस किरदार का है, जो मैं निभा रहा होता हूं. इसीलिए मैं कहता हूं डोन्ट कॉल मी बिटविन एक्शन एंड कट. क्योंकि हो सकता है कि उस वक्त मैं किसी बहुत खराब इंसान का रोल कर रहा हूं तो हो सकता है कि छेड़ने पर वो ही बाहर आ जाये. तो मैं काम करता हूं. एनालाइज नहीं करता. क्योंकि नार्मली क्या होता है न कि जब अपने आपको बहुत ज्यादा देखने लगते हो एनेलाइज करने के चक्कर में … तो ये एक तरह से बिगनिंग ऑफ नॉरसिसिज्म होता है. वो नारसिस्टिक पहलू आपके अंदर घुस जाते हैं. फिर छोटी-छोटी बातों को आप बर्दाश्त नहीं कर पाते. आपको लगने लगता है, अरे उसे बंदे ने ये बोल दिया मेरे बारे में. इतना खराब बोल दिया. फिर आपको बहुत सारी चीजें असर करने लगेंगी. एज एन एक्टर फिर इन सबसे आपका ही नुकसान होगा. तो आपको अपने आपको प्रूव नहीं करना है, अपना काम करना है. आपको यही देखना है कि दि मूवमेंट ऑफ ट्रूथ ऑर नोट. अगर आपको लगता हू मूवमेंट ऑफ द ट्रूथ निकला है तो इसका भी क्रेडिट नहीं ले सकते. क्योंकि ये हो गया है आपसे .. क्योंकि आप वहां थे ही नहीं, वहां कोई औऱ था, कोई औऱ केके मेनन था वहां. इसलिए जब कुछ लोग बोलते हैं… मोनोलॉग के बारे में… कि देखो मैंने ये किया तो मैं उनसे कहता हूं, यार कॉपी मत करो…क्योंकि मैं खुद भी उसकी कॉपी नहीं कर पाऊंगा. क्योंकि चीजें निकल गई हैं उस वक्त. क्योंकि मैं डॉयलॉगबाजी करता नहीं हूं खास… डॉयलागबाजी होती तो आसान होता करना. मैं तो जो करता हूं कनवर्सेशनल बातचीत के तरीके से करता हूं. बिना कोमा और फुल स्टाप के. मैं बैकग्राउंड स्कोर दिमाग में लगाकर एक्टिंग नहीं करता हूं….तो उस पल में जो निकला है उसका अपना सत्य है, जिसे मैं भी दोबारा नहीं कर पाऊंगा. अगर करने जाऊंगा तो कुछ अलग हो जायेगा. तो उसकी कॉपी करने की कोशिश व्यर्थ है. मैंने हमेशा कहता हूं भी हूं मुझे मरणोपरांत मेरे डॉयलाग के लिए नहीं मेरे परफार्मेंसेज के लिए याद किया जायेगा. दुनिया के बड़े-बड़े एक्टर डॉयलाग की वजह से नहीं, परफार्मेंस के लिए याद किये जाते हैं.
  • कोई ऐसा रोल जिसे करने के पहले सोचना पड़ा कि यार इसको कैसे करें… क्योंकि ये सोचना जितना बड़ा होगा उतना ही चैलेंजिंग भी होता है… औऱ इसमें उतना ही आनंद भी आता है
  • कैसे करें पर ही तो अमल करना है, जब आप एक्टिंग की फील्ड पहला कदम रखते हो तब ही ये कैसे करे वाला मामला खत्म हो जाता है. तो ये सवाल तो निकल गया. अब एक होता है खोजना … मै खोजने में लग जाता हूं …रिसर्च के तौर पर नहीं. अगर ये हिस्टोरिकल रोल है तो भी .. क्योंकि है ये फिक्सन ही ऑफटरऑल… तो जो टेक्सट मुझे दिया गया है मैं उसी में कुछ अलग खोजने लगता हूं. बाइ नोट डुइंग एक्सटर्नल रिसर्च…ये थोड़ा बोरिंग भी है.. लेकिन अलादीन के चिराग की तरह आप घिसते जाओ घिसते जाओ तो कुछ मैजिकल निकल ही आता है. फिर इस बीच आप डिस्कशन करते हैं. राइटर डायरेक्टर के साथ .. इस टेक्सट के अंदर आपको उनका विजन भी समझना होता है एज एन एक्टर…एक दायरे में रहकर.. तो मेरी खोज इस दायरे में रहकर शुरू होती है. अब स्पेशल ऑप्श की ही बात करें. तो जो नीरज और शिवम ने डील या रिसर्च किया है रॉ के साथ वो मैं उनसे उनके विजन के साथ लेता हूं .. नहीं तो मैं अकेला और अलग से रिसर्च करने लगूंगा तो हो सकता है कि मैं कुछ टेढ़ा मेढ़ा लेकर आकर आ जाऊं. मेरी कोशिश होती है एक्टिंग को बिलिवब्ल किया जाये… मोर देन रियलिज्म इट्स शुड बी बिलियब्ल
  • नये लोगों के लिए क्या कहना चाहेंग…जिससे उनको कुछ फायदा हो सके
  • बस जो मैंने पहले कहा, जो काम मिले करते जाओ, मंजिल की तरफ मत देखो. वो खुद आपकी तरफ आयेगी. अलग दुनिया में जीना छोड़ो. इगो और अहंकार से निकलकर सरेंडर करना सीखिये.

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