Opinion

#Corona : ICMR की रिपोर्ट बताती है कोरोना वायरस कितना खतरनाक और रहस्मयी

Girish Malviya

पिछले 24 घंटे में कोरोना के 1035 नये मरीज सामने आये हैं. यह बीमारी अब रहस्यमयी होती जा रही है. शुक्रवार को केंद्र सरकार की मुख्य नोडल एजेंसी ICMR  ने एक रिपोर्ट जारी की है. ये स्टडी 15 फरवरी से 2 अप्रैल के बीच की गयी है. ये स्टडी देश के 21 राज्यों के 52 जिलों में की गयी थी. जिन लोगों के सैम्पल टेस्ट किये गये, उनमें से ज्यादातर पुरुष थे और 50 से अधिक उम्र के सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी इलनेस (SARI) के मरीज थे.

चूंकि कोरोना संक्रमण के लक्षण SARI के मरीज से काफी मिलते-जुलते हैं. इसलिए इस स्टडी में सरकार फिलहाल SARI के मरीज़ों को ही इस दायरे में रख रही थी.

इस रिपोर्ट के लिए 5911,  SARI मरीजों की जांच कोरोना संक्रमण के लिए की गयी. उनमें से 104 मरीजों में कोरोना संक्रमण के लक्षण पाये गये हैं. कुल 1.8 फीसदी मामलों में संक्रमण मिला है. ये वो मरीज हैं, जिनको सांस लेने संबंधी बीमारी थी. सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि पॉजिटिव पाये गये 104  मरीजों में से 40 मरीज ना तो विदेश से आये थे और ना ही कोरोना संक्रमण वालों के कांटेक्ट में.

ILI ( इन्फ्लुएंजा लाइक इलनेस) एवं SARI (सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी इलनेस) की स्क्रीनिंग एवं निगरानी के आदेश अस्पतालों को दिये जा चुके हैं.

इसे भी पढ़ें – Interview :  मुझे मेरे डॉयलाग के लिए नहीं, मेरे परफार्मेंस के लिए याद किया जायेगा- केके मेनन 

SARI से एक शब्द और याद आता है, जो है SARS (सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम) जिसे हिन्दी में कहते हैं “अति तीव्र श्वसन परिलक्षण” सार्स भी कोरोना वायरस द्वारा जनित श्वसन से संबंधित रोग है. जो 2002 में दक्षिणी चीन से फैलना शुरू हुआ था. SARS से विभिन्न देशों में 8273 लोग संक्रमित हुए एवं 775 लोगों की मृत्यु हो गयी थी.

SARS जिसे SARS coronavirus (SARS-CoV) कहते हैं,  भी उसी कोरोना वायरस परिवार का हिस्सा है, जिसमें यह नया वायरस सार्स-कोरोना वायरस-2 (SARS- Corona Virus-2) आया है.

यह इस नये कोरोना वायरस का असली और पूरा नाम है. जबकि Covid-19 इससे उत्पन्न बीमारी का नाम है. दअरसल यह सार्स वायरस का ही स्ट्रॉंग रूप है, इसलिए इसे सार्स कोवा-2 का नाम दिया है.

सार्स और कोरोना में एक अंतर है. जो कोरोना को सार्स से कहीं ज्यादा स्ट्रॉंग, शक्तिशाली और खतरनाक बनाता है. ये अंतर है दोनों के फैलाव का.

दरअसल सार्स वायरस सांस नली के सहारे शरीर में घुसकर सीधे फेफड़ों की कोशिकाओं पर हमला करता था. जिसके बाद व्यक्ति में सर्दी-जुकाम-खांसी, बुखार आदि जैसे लक्षण दिखने लगते थे और वो आसानी से पहचान में आ जाता था. जिससे उसको जल्द इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कर दिया जाता था.

लेकिन कोरोना वायरस को पहचानना आसान नहीं होता और यही इसके सबसे खतरनाक का कारण है. सार्स-कोरोना वायरस-2  हमारे शरीर के लोअर रेस्पेरेट्री ट्रैक्ट में चला जाता है और वहां जाकर तेजी से रेप्लिकेट करता है. यानी अपनी कार्बन कॉपीज बहुत तेजी से बनाता है. इससे हमारे फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता है और हमें सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. कोरोना का गले से फेफड़े तक पहुंचने का समय 6 से 7 दिन का है और यही समय व्यक्ति को कोरोना खतरनाक ढंग से अपनी चपेट में ले लेता है.

इसे भी पढ़ें – #CoronaEffect: भुखमरी के कगार पर धनबाद के गुलगुलिया बस्ती के लोग, सरकारी सुविधाओं का नहीं मिल रहा लाभ

जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है, उनमें सार्स-कोरोना वायरस-2 अपर रेस्पेरेट्री ट्रैक्ट यानी गले और नाक की नर्व्स से नीचे नहीं जा पाता. मतलब गले तक ही सीमित रह जाता है. इससे इन लोगों के फेफड़ों पर यह वायरस अटैक नहीं कर पाता.

इस दौरान इनके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी ताकत के साथ इस वायरस को खत्म करने के लिए ऐंटिबॉडीज बनाने लगती है और ये लोग इस वायरस से लड़ाई जीत जाते हैं.

सार्स के मरीज पहले ही पहचान लिए जाते थे. इसलिए सार्स को जल्द खत्म भी कर दिया गया. लेकिन कोरोना के लक्षण देरी से नजर आते इसलिए कोरोना सार्स से ज्यादा खतरनाक है और तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है.

लेकिन सार्स के फैलने की दर ‘सार्स-कोरोना वायरस-2’ से अधिक थी और यह इससे कहीं ज्यादा घातक था. इसका फैटेलिटी रेट 10 प्रतिशत था. यानी जितने लोगों को सार्स नामक बीमारी हुई, उसके 10 प्रतिशत लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. जबकि सार्स-कोरोना वायरस-2 के केस में यह मात्रा अभी तक 3.4 प्रतिशत ही है.

साइंटिस्ट्स का कहना है कि सार्स-कोरोना वायरस-2 का जीनोम (Genome) करीब 82 प्रतिशत तक SARS से मैच करता है. यानी सार्स-कोरोना वायरस-2 पहले फैल चुके सार्स वायरस से 80 प्रतिशत से अधिक मेल खाता है.

अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि जब दोनों की सरंचना इतनी समान है, तो उन दवाइयों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा जो SARS में इस्तेमाल की गयी थी. वैसे विशेषज्ञ कह रहे हैं कि गंभीर स्थिति में उन्हीं दवाइयों का इस्तेमाल किया जा रहा है. कोरोना वायरस और एचआईवी वायरस का एक जैसा मॉलिक्युलर स्ट्रक्चर होने के कारण मरीजों को एचआईवी एंटी ड्रग लोपिनाविर (LOPINAVIR) और रिटोनाविर (RITONAVIR) देकर भी इलाज किया गया है.

इन दवाओं का इस्तेमाल साल 2003 में सार्स (SARS) वायरस के इलाज में भी किया गया था. दरअसल उस वक़्त इस बात के सबूत मिले थे कि एचआईवी के मरीज़ जो ये दवाएं ले रहे थे और उन्हें सार्स से पीड़ित थे, उनका स्वास्थ्य जल्द बेहतर हो रहा था.

यह बात जरूर हैरान करती है कि 2002 में जिस वायरस की पहचान कर ली गयी थी, उससे मिलते जुलते वायरस की दवाई अब तक नहीं खोजी गयी. यहां हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि यह वायरस जल्दी-जल्दी अपने रूप में बदलाव ला रहा है. लेकिन हमें अपने वैज्ञानिकों पर भी पूरा भरोसा है वह जल्द ही इस समस्या से पार पा लेंगे.

इसे भी पढ़ें – #Covid-19 से दुनिया भर में मरने वाले की संख्या एक लाख के पार

नोटः ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Back to top button