
Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि काम में लापरवाही, प्रक्रियात्मक गलती या अधीनस्थ कर्मचारियों से सख्ती जैसे आरोपों के लिए किसी कर्मचारी को बर्खास्त करना बहुत कठोर सजा है. हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा. दरअसल, यह मामला मीना कुमारी राय से जुड़ा है, जो 1988 से बिहार शिक्षा सेवा में कार्यरत थीं और राज्य पुनर्गठन के बाद झारखंड कैडर में आ गईं. पलामू में जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) के रूप में काम करते हुए उन पर आरोप लगे कि उन्होंने काम में लापरवाही की. अधीनस्थों का वेतन रोका और सरकारी आदेशों का पालन ठीक से नहीं किया. हालांकि जांच में कुछ आरोप सही पाए गए, जिसके बाद विभाग ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया. मीना कुमारी राय ने इस सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी. इस पर सुनवाई के बाद एकलपीठ ने माना कि आरोप इतने गंभीर नहीं थे कि उन्हें नौकरी से बर्खास्त किया जाए. अदालत ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए विभाग को सजा पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया था. राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट की खंडपीठ में अपील की. लेकिन खंडपीठ ने कहा कि अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है. जब सजा आरोपों के अनुपात में बहुत अधिक हो. कोर्ट ने माना कि 31 साल की बेदाग सेवा के बाद बर्खास्तगी देना और पेंशन जैसे लाभों से वंचित करना बहुत कठोर कदम है.




