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कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों के स्थायीकरण में ‘सृजित पद’ का पेंच: 8 माह बीते, सिर्फ दो कर्मी योग्य, एक हुआ नियमित

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Kumar Gaurav

Ranchi: झारखंड में दस साल पूरा कर चुके अस्थायी कर्मियों को स्थायी किया जाना है. सरकार के निर्णय के हिसाब से 20 जून 2019 तक 10 साल पूरा कर चुके कर्मियों का नियमितीकरण करना है.

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पर इस निर्णय में एक लाइन यह जुड़ा है कि सृजित पद के विरुद्ध नौकरी कर रहे अस्थायी कर्मी को ही स्थायी किया जायेगा. मामला यहीं फंस गया है. इतने दिनों में सिर्फ दो कर्मी योग्य पाये गये हैं और उसमें एक कर्मी को स्थायी किया गया है.

11 फरवरी को हुई कैबिनेट की बैठक में स्वर्णरेखा परियोजना में कार्यरत सुरेंद्र कुमार को निम्नवर्गीय लिपिक के पद पर नियमित करने की स्वीकृति दी गयी.

सवाल यह उठता है कि सरकार ने जिन्हें अस्थायी तौर पर रखा उन्हें सृजित पद के विरुद्ध क्यों नहीं रखा. सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर पद सृजित ही नहीं था तो फिर किस काम के लिए नौकरी पर रखा. और अगर काम जरूरी था तो पद का सृजन क्यों नहीं किया गया.

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जिन कर्मियों ने दस साल पूरा कर लिया है और सृजित पद पर कार्यरत नहीं हैं, उन्हें नियम के तहत स्थायी नहीं किया जायेगा, पर सच्चाई यह भी है कि उस पद से हो रहे कामों के बिना विभागीय काम हो पाना मुश्किल है.

अधिकतर कार्यरत कर्मी कंप्यूटर ऑपरेटर हैं. अगर इन्हें स्थायी न कर बाहर कर दिया जाता है तो फिर से विभाग को इन पदों पर नियुक्ति करनी होगी. या फिर अनुबंध के आधार पर बहाल करना पड़ेगा.

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अनुबंधकर्मियों के साथ किसने किया अन्याय

इस नियम के तहत अनुबंधकर्मियों को अस्थायी नहीं किया जायेगा. अब सवाल यह उठता है कि जिन अनुबंधकर्मियों ने दस साल तक की सेवा दे दी है उनमें अधिकतर लोगों की उम्र 35 से अधिक है और अब वे किसी बहाली के योग्य ही नहीं हैं.

ऐसी स्थिति में यह सवाल लाजिमी है कि उनकी इस बदहाली का जिम्मेवार कौन है? सरकार जिसने उन्हें नियुक्त किया, विभाग जिसमें वे कार्यरत हैं या इस नियमावली का यह टर्म जिसके वजह से ये स्थायी होने के योग्य नहीं हैं?

अब सवाल यह भी उठता है कि इनका क्या होगा? इस मामले को लेकर विधानसभा में भी चर्चा हुई थी पर तत्कालीन मंत्री अमर कुमार बाउरी ने जवाब देते हुए कहा था कि वे कर्मियों की मजबूरी को समझते हैं पर नियम को दरकिनार नहीं किया जा सकता.

राजस्व विभाग इस काम के लिए नोडल विभाग है. राजस्व विभाग की ओर से सभी जिलों को नोटिस किया गया कि ऐसे कर्मियों की सूची तैयार कर भेजें जिन्होंने दस साल की सेवा पूरी कर ली है.

विभाग ने चार बार सभी जिलों को रिमाइंडर भेजा पर किसी भी जिले ने 10 साल पूरा कर चुके अस्थायी कर्मियों की सूची नहीं सौंपी.

विभाग की ओर से सभी जिलों को सबसे पहले 23 जुलाई, दूसरा 16 सितंबर, तीसरा रिमाइंडर 25 अक्टूबर और चौथा रिमाइंडर 16 दिसंबर को भेजा गया. लेकिन इसके बाद भी किसी भी जिले ने रिपोर्ट नहीं भेजी है.

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हाइकोर्ट में दायर हुई थी याचिका

इस मामले पर परिवहन विभाग के अस्थायी कर्मचारी नरेंद्र कुमार तिवारी समेत अन्य ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की. हाइकोर्ट ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि सरकार ने सेवा नियमितीकरण की जो व्यवस्था बनायी है वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये निर्णय के आलोक में सही है. इसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट चले गये.

इसके बाद नरेंद्र कुमार तिवारी समेत नौ अन्य कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी और पंचायती राज के दो अस्थायी कर्मचारियों की सिविल अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि झारखंड के बने दस साल नहीं हुए थे, तो वो फैसला कैसे लागू होगा.

इसके बाद झारखंड सरकार द्वारा 13 फरवरी 2015 में लागू की गयी सेवा नियमितीकरण सिविल एप्लीकेशन नंबर 7423-7429 2018 नियमावली 2015 को भी निरस्त कर दिया.

जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की डबल बेंच ने फैसला देते हुए कहा था कि सभी को चार माह में स्थायी करें. पर सृजित पद के विरुद्ध अनियमित तरीके से रखे गये कर्मियों की संख्या ना के बराबर है.

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