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#ASER : पहली कक्षा के 41.1% और तीसरी के 72.2% प्रतिशत छात्र ही पहचान पाते हैं दो अंकीय संख्या

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  • एनसीईआरटी के अनुसार बच्चे पहली कक्षा में 99 तक की संख्या को पहचानने में सक्षम होने चाहिए
  • असर की ओर से अर्ली ईयर्स (0-8 साल) की रिपोर्ट जारी की गयी
  • 4 प्रतिशत लड़के जाते हैं सरकारी स्कूल
  • 4 से 5 साल के बच्चों में 8 प्रतिशत लड़कियां सरकारी स्कूल जाती है
  • 6 प्रतिशत लड़के प्राइवेट स्कूलों में पढते हैं
  • आंगनबाड़ी में पढ़ने वाले बच्चे प्राइवेट स्कूल के बच्चों से होते हैं कमजोर

Ranchi: असर (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट) की ओर से शुरुआती साल यानी 0 से 8 आयु वर्ष के बच्चों की शिक्षा और महत्वपूर्ण विकास संकेतकों पर रिपोर्ट जारी की गयी. असर की ओर से इस रिपोर्ट को अर्ली ईयर्स का नाम दिया गया है.

यह रिपोर्ट राष्ट्रीय स्तर पर तैयार की गयी है. सर्वे 24 राज्यों में किया गया. रिपोर्ट की मानें तो राज्य के अलग अलग हिस्सों में एडमिशन पैटर्न में काफी भिन्नता है.

जैसे केरल के त्रिशुर में अगर पांच वर्षीय बच्चों में 89.9 प्रतिशत बच्चे प्री प्राइमरी में हैं और बाकी बच्चे पहली कक्षा में हैं तो वहीं मेघालय के खासी हिल्स में इसी उम्र के मात्र 65.8 प्रतिशत बच्चे प्री प्राइमरी में हैं. इनमें 9.8 प्रतिशत पहली कक्षा में और 16 प्रतिशत दूसरी कक्षा में पढ़ते हैं.

मध्य प्रदेश के सतना में 47.7 प्रतिशत बच्चे प्री प्राइमरी में हैं तो इसी उम्र के 40.5 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा में और 4.1 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा में हैं. इस सर्वे में स्कूली शिक्षा के साथ-साथ 4 से 8 आयु वर्ग के छोटे बच्चों के लिए महत्वपूर्ण विकास संकेतकों पर काम किया गया है.

4 या 5 साल के 21.9 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा में

आरटीई के अनुसार पांच साल के बच्चे को पहली कक्षा में होना चाहिए. रिपोर्ट की मानें तो पहली कक्षा में हर दस में से चार बच्चे पांच साल से छोटे या छह साल के हैं. मात्र 21.9 प्रतिशत बच्चे चार या पांच साल के हैं.

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वहीं 41.7 प्रतिशत बच्चे छह साल के और 36.4 प्रतिशत बच्चे सात से आठ साल के हैं. हालांकि कुछ राज्यों में पांच साल में बच्चों को पहली कक्षा में देने का प्रावधान है.

इसी तरह पहली कक्षा में पढ़ने वाले सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के उम्र में काफी अंतर है. यह पाया गया कि सरकारी स्कूल में पहली कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की तुलना में छोटे होते हैं.

सरकारी स्कूलों में एक चौथाई से अधिक छात्र यानी 26.1 प्रतिशत 4 या 5 वर्ष के हैं जबकि प्राइवेट स्कूलों में यह आंकड़ा दस प्रतिशत गिरकर 15.7 प्रतिशत हो जाता है.

दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में पहली कक्षा में 30.4 प्रतिशत छात्र 7 से 8 वर्ष के हैं, जबकि निजी स्कूलों में यह आंकड़ा 45.4 प्रतिशत है.

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पाठ्यक्रम से पीछे रहते हैं बच्चे

असर रिपोर्ट में पाया गया कि बार-बार पाठ्यक्रम में हो रहे बदलाव के कारण बच्चे पाठ्यक्रम से पीछे रहते हैं. सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में तीसरी कक्षा में पढ़ रहे अधिकांश बच्चे 7 से 8 साल के हैं.

तीसरी में पढ़ने वाले आठ साल के 53.4 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा के स्तर के पाठ पढ़ सकते थे जबकि सात साल के 46.1 प्रतिशत बच्चे ही ऐसा कर सकते हैं.

पाठ्यक्रम उद्देश्यों में बड़े बदलावों के कारण कक्षा तीसरी तक उनकी प्रारंभिक भाषा और शुरुआती संख्यात्मक परिणाम पाठ्यक्रम की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं मिलते हैं.

प्रथम स्तर के पाठ को पहली कक्षा के 16.2 प्रतिशत बच्चे ही पढ़ पाते हैं. सुधार के बाद उसी पाठ को कक्षा तीसरी के 50.8 प्रतिशत बच्चे पढ़ पाते हैं.

इसका मतलब यह है कि पाठ्यक्रम के हिसाब से कक्षा तीसरी के आधे बच्चे पहले से ही कम से कम दो साल पीछे होते हैं. इसी तरह, कक्षा पहली के 41.1 प्रतिशत छात्र 2 अंकीय संख्या को पहचान सकते हैं.

जबकि कक्षा तीसरी में 72.2 प्रतिशत छात्र ऐसा कर सकते हैं. लेकिन एनसीईआरटी के उद्देश्यों के अनुसार, बच्चों को पहली कक्षा में 99 तक की संख्या को पहचानने में सक्षम होना चाहिए.

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों और लड़कों की संख्या में भेद

इस सर्वे में पाया गया कि सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले लड़के और लड़कियों की संख्या में काफी भेद है. 4 से 5 साल के बच्चों में 56.8 प्रतिशत लड़कियां सरकारी स्कूल जाती है. जबकि 50.4 प्रतिशत लड़के सरकारी स्कूल जाते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक संख्या यह दर्शाती है कि इन छोटे बच्चों के बीच भी लड़कों और लड़कियों के मामले में अलग अलग एडमिशन पैटर्न हैं. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, यह अंतर बड़ा होता जाता है.

इस सर्वे में 43.2 प्रतिशत लड़कियां और 49.6 प्रतिशत लड़के प्राइवेट स्कूलों में पढते पाये गये. 6 से 8 साल के सभी बच्चों में 61.1 प्रतिशत लड़कियां और 52.1 प्रतिशत लड़के सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं.

पांच साल के 21.6 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा में दाखिल

सर्वे रिपोर्ट से जानकारी हुई कि 4 से 8 आयु वर्ग के 90 प्रतिशत से अधिक बच्चे किसी न किसी प्रकार के शैक्षणिक संस्थान में दाखिल हैं. यह अनुपात उम्र के साथ बढ़ता है.

सैम्पल जिलों में 4 वर्ष के 91.3 प्रतिशत और 8 वर्ष के 99.5 प्रतिशत बच्चे शिक्षण संस्थानों में दाखिल हैं. बच्चों के दाखिले के मामले में उम्र में काफी अंतर है.

जैसे पांच साल के 70 प्रतिशत बच्चे आंगनबाड़ियों या प्री प्राइमरी कक्षाओं में है. जबकि इसी उम्र के 21.6 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा में दाखिल हैं.

6 वर्ष की आयु में 32.8 प्रतिशत बच्चे आंगनबाड़ियों या प्री-प्राइमरी कक्षाओं में हैं. जबकि 46.4 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा और 18.7 प्रतिशत दूसरी कक्षा या उससे बड़ी कक्षा में पढ़ रहे हैं.

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आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों का कौशल और नींव काफी कमजोर

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पांच साल से अधिक उम्र के बच्चों को टुकड़ी पहेली हल करने में सक्षम होना चाहिए. लेकिन एक बड़ा अनुपात ऐसा करने में असमर्थ है.

चार साल के बच्चों में लगभग आधे और पांच साल के लगभग एक चौथाई बच्चे आंगनबाड़ियों में भेजे जाते हैं. लेकिन प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले उनके हम उम्रबच्चों की तुलना में आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों की नींव और संज्ञानात्मक कौशल कमजोर पाये गये.

जबकि बाल विकास विशेषज्ञों के अनुसार चार से पांच साल के बच्चों में कार्य करने की क्षमता में काफी सुधार होता है. बच्चों के कमजोर होने पर उनका घरेलू परिवेश भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिनकी माताएं आठवीं तक या उससे कम पढ़ी लिखी होती है, वे अपने बच्चों को आंगनबाड़ी में देती हैं.

जबकि इससे अधिक पढ़ी-लिखी महिलाएं प्राइवेट स्कूलों में देती हैं. राष्ट्रीय नीति की सिफारिश है कि 4 और 5 साल के बच्चों को प्री-प्राइमरी कक्षाओं में होना चाहिए जिससे उनका समग्र विकास हो.

क्या है असर की रिपोर्ट

साल 2005 से असर की ओर से स्कूलिंग की स्थिति और ग्रामीण भारत में 5-16 आयु वर्ग के बच्चों की बुनियादी पढ़ने और अंकगणितीय कार्यों को करने की क्षमता पर रिपोर्ट तैयार की है.

वार्षिक रिपोर्ट तैयार करने के दस साल बाद 2016 में, असर एक वैकल्पिक वर्ष चक्र में बदल गया जिसके तहत असर अपनी रिपोर्ट हर दो साल के अंतराल में तैयार करता है.

2018 में आयी रिपोर्ट 14 से 18 आयु वर्ग में युवाओं की क्षमताओं, अनुभवों और आकांक्षाओं पर केंद्रित थी. इस साल 0 से 8 साल के बच्चों के स्कूलिंग और सांकेतिक विकास पर सर्वे किया. क्योंकि इस आयुवर्ग को दुनियाभर में मानव जीवन चक्र में संज्ञानात्मक, शारीरिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है.

यह सर्वे भारत के 24 राज्यों के 26 जिलों में किया गया जिसमें कुल 1,514 गांवों के 30,425 घरों और 4-8 साल के आयु वर्ग के 36,930 बच्चों को शामिल किया गया.

निष्कर्ष

आंगनबाड़ी केंद्रों में में पठन-पाठन के लिए उपयुक्त सुविधाएं और गतिविधियां हों. कम उम्र के बच्चों को प्राथमिक ग्रेड में दाखिला देना, उनके सीखने के क्रम में बाधा उत्पन्न करता है जिसे दूर करना मुश्किल है.

प्रारंभिक वर्षों में विषय सीखने के बजाय संज्ञानात्मक कौशल को मजबूत करने वाली गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने से बच्चों के भविष्य की शिक्षा में कई लाभ हो सकते हैं.

4 से 8 तक के पूरे आयु समूह को एक निरंतरता और पाठ्यक्रम की प्रगति के रूप में देखा जाना चाहिए, ताकि स्कूलिंग की योजनाएं तैयार की जा सकें.

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