
सिस्टम की मार फरवरी माह से नहीं मिला मानदेय
हाथों में चॉक और कलम नहीं, ईंट और छड़ ढोते दिखें पारा
शिक्षक धनेश्वर, गर्मी की छुट्टियों में मजदूरी करने को विवश
दुर्गा पूजा की छुट्टियों में घर रंग-रोगन का काम कर रहे थे
धनेश्वर के दो बच्चे हैं लेकिन आर्थिक तंगी के कारण एक बच्चे को पाल रहा भाई
एक साल से किराया नहीं दिया, अधिक उधार के कारण राशन नहीं मिल पा रहा
आर्थिक के साथ मानसिक परेशानी से जुझ रहे, गांव में शिक्षक होने का सम्मान नहीं मिलता
Ranchi: आप उम्मीद करते हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले आपके बच्चे बेहतर करें. आप उम्मीद करते हैं कि उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक तन-मन से मेहनत करें और आपके बच्चे डॉक्टर और इंजीनियर बनें.
न्यूज विंग आपके लिए एक ऐसी सीरीज लेकर आ रहा है. जिससे आपके मन में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए पाले हुए सारे मुगालते दूर हो जाएंगे. जब आपके बच्चे को स्कूल में पढ़ाने वाला शिक्षक अगर अपने छुट्टियों के दिनों में दिहाड़ी करें, मेहनत मजदूरी करें. तो आपको अपने बच्चों से किसी भी तरह की कोई उम्मीद रखने का कोई हक नहीं. जी हां बिलकुल सही सुना आपने.
जिन पारा शिक्षकों के हवाले हमारे नोनिहालों का मुस्तकबिल है. उनका आखिर क्या हाल है. सरकार जिन नीतियों का इस्तेमाल इन पारा शिक्षकों के लिए कर रही है, उन नीतियों ने पारा शिक्षकों का हाल क्या कर दिया है. पढ़िए न्यूज विंग संवाददाता छाया की स्पेशल रिपोर्ट.
पेशे से ये शिक्षक है, पारा शिक्षक… लेकिन छुट्टियों में ये मजदूरी करते है. जिस हाथ में कलम और चॉक होती है, उन हाथों में कुल्हाड़ी देखी जा रही है. ये हैं रांची नामकुम के पारा शिक्षक धनेश्वर प्रसाद, जो वर्तमान में नामकुम से आठ किलोमीटर की दूरी में स्थित नवसृजित प्राथमिक विद्यालय जामुन टोली में पढ़ाते हैं.
इनकी नियुक्ति ऐसे तो गर्वमेंट मध्य स्कूल सरवल में की गई थी, लेकिन स्थानांतरण कर इन्हें जामुन टोली भेज दिया गया. सिदरौल में किराये के मकान में रह कर ये स्कूल में पढ़ाते हैं.
फरवरी माह से पारा शिक्षकों को मानदेय नहीं मिलने का असर धनेश्वर पर देखा जा सकता है. धनेश्वर की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वे मजदूरी कर रहे हैं.
इससे सिर्फ एक शिक्षक की आर्थिक स्थिति की ही नहीं बल्कि समाज में उनके मानसिक स्थिति का भी अंदाजा लगाया जा सकता है.
कोई विकल्प नहीं, घर रंगने का काम भी किया
अपने बारे में बताते हुए धनेश्वर ने कहा कि सिर्फ इसी फरवरी में नहीं पारा शिक्षकों के आंदोलन के पूर्व दुर्गा पूजा की छुट्टियों के दौरान भी उन्होंने घर रंग रोगन का काम किया. क्योंकि परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं. जिनका भरण पोषण धनेश्वर पर निर्भर करता है.
2009 से धनेश्वर पारा शिक्षक की नौकरी कर रहे हैं. खुद धनेश्वर बीएसी और टेट पास हैं. उन्होंने कहा कि पहले स्थिति इस हद तक बदहाल नहीं होती थी. लेकिन 2014 के बाद से लगातार पारा शिक्षकों का मानदेय चार से पांच माह के लिए रोक दिया जा रहा है.
नामकुम से लगभग 21 किलोमीटर की दूरी पर इनका गांव (लाली) है. जहां इनकी पत्नी और बच्चे रहते है. इन्होंने बताया कि परिवार का खर्च कम नहीं हो सकता. दैनिक खर्च भी है. ऐसे में कितना मैनेज करें. मजदूरी के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
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एक साल से घर का किराया नहीं दिया, विश्वास पर मालिक ने छोड़ा
अपनी स्थिति के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि जामुन टोली में स्कूल में पढ़ाने के लिए वे सिदरौल में एक कमरा किराया में लेकर है. लेकिन इस कमरे का किराया भी वो पिछले एक साल से नहीं दे पाये हैं. जो महज 2500 रूपया प्रति माह है.
उन्होंने बताया कि किरायेदार ने सिर्फ शिक्षक है, इसी विश्वास पर छोड़ दिया है. लेकिन कब तक. अब तो स्थिति इस हद तक है कि राशन दुकानदार भी उधार नहीं दे रहे.
पहले का जो उधार है वो धनेश्वर चुका नहीं पाये हैं. वहीं फिर से खरीदारी करने पर बातें सुननी पड़ती है. गांवों में सहभागिता की भावना होती है. ऐसे में कुछ लोग मदद कर देते हैं.
लेकिन खुद के आत्मसम्मान को यह चोटिल करता है. उन्होंने बताया कि साल 2009 में गांव में जो मुझे सम्मान मिलता है एक शिक्षक होने के नाते, अब वो सम्मान नहीं मिलता. क्योंकि हर तरह से कर्ज में डूबे होने के कारण गांव वालों को भी मेरी स्थिति की जानकारी हो गई है.
परिवार की जरूरत पूरी नहीं हो पाती
सरकार एक बार मे चार-पांच माह का मानदेय रोक देती है. जबकि देती मुश्किल से दो माह का है. अखबारों में लिख दिया जाता है कि पारा शिक्षकों को मानदेय मिल गया. लेकिन असलियत यहीं है कि नवंबर में पंद्रह दिनों का और जनवरी का मानदेय मार्च में होली के बाद दिया गया.
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नवंबर में अन्य पंद्रह दिन और दिसंबर में पारा शिक्षक आंदोलनरत थे. जिनका मानदेय उन्हें नहीं दिया गया. ऐसे में समझ ही सकते है कि जो पैसा आता है वह उधार चुकाने में चले जाते है. परिवार और बच्चों की जरूरत तो क्या कपड़ा तक नहीं खरीद पा रहे.
उन्होंने बताया कि मेरे परिवार की स्थिति को देखकर मेरे भाई ने एक बच्चे को अपने पास रख लिया, क्योंकि मेरे से सही भरण-पोषण बच्चे की नहीं हो रहा था.
उन्होंने आंखें नम करते हुए कहा कि इससे अधिक और क्या बताएं. जब शिक्षक होकर हम अपने बच्चे का भरण पोषण नहीं कर पा रहे तो और समाज में तो सम्मान कम होगा ही.
पेट में अन्न का दाना नहीं रहता और सरकार करती है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात
बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि सरकार ने कहने को पारा शिक्षकों का मानदेय तो बढ़ा दिया, लेकिन उसे नियमित नहीं कर रही. 2010 में 4,500 मानदेय मिलता था.
लेकिन यह नियमित था. कम से कम इस हद तक मानसिक परेशानी नहीं होती थी. जैसे-जैसे मानदेय बढ़ता गया अनियमितता भी शुरू हो गई. अपनी स्थिति से परेशान होकर उन्होंने कहा कि इससे बेहतर होता कि सरकार नियमित ही लेकिन 4,500 ही देती. कम से कम कर्ज का बोझ तो नहीं होता.
बच्चों की उम्मीदों को मरते तो नहीं देखते. उन्होंने कहा कि कभी-कभी तो स्थिति ऐसी होती है कि पेट में अन्न का एक दाना नहीं होता है. ऐसे में आठ किलोमीटर दूरी तय करके धूप बारिश में स्कूल जाते हैं.
जब शिक्षक संतुष्ट नहीं होंगे तो बेहतर शिक्षा कैसी मिलेगी. वहीं नए-नए नियम बनाकर परेशान भी किया जाता है. जबकि सरकार इतनी सुविधाएं पारा शिक्षकों को नहीं देती. जबकि काम ये भी सरकारी शिक्षकों के समान करते है.
इधर पलामू में पांच सालों से मानदेय नहीं मिलने से परेशान पारा शिक्षक ने आत्मदाह करने की कोशिश की. हालांकि उसे बचा लिया गया.




