
Khunti: शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा. कविता की यह पंक्तियां डोम्बारीबुरू सईल रकब की 65 फीट ऊंचे शहीद स्मारक को देखकर साकार हो उठती हैं. रणबांकुड़ों की धरती खूंटी के इसी डोम्बारीबुरू सईलरकब में पत्थर, गुलेल, तीर-धनुष, ढ़ेलकुसी, टांगी जैसे पारंपरिक हथियारों के बल पर नौ जनवरी 1900 को बिरसा के अनुयाईयों ने अंग्रेजों की पुलिस की बंदूकों की गोलियों से मुकाबला किया था. इसमें लगभग 400 आदिवासी रणबांकुड़े अंग्रेजों की गोलियों के शिकार हो गए थे. हर बरस डोम्बारीबुरू सईलरकब में उन 400 शहीदों को श्रद्धांजलि देने हजारों लोग जुटते हैं. दूर-दूर से लोग यहां आकर श्रद्धांजलि देते हैं. आसपास के जगहों पर वीरों की वीरता से जुड़े स्थलों की कहानियां सुनते हैं. जानकारी के अनुसार, इस वर्ष मेला आयोजन समिति ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को डोम्बारी के शहीद मेले में आमंत्रित किया है. विधायक राम सूर्या मुंडा समेत कई अन्य नेता और विभिन्न गांवों के दस हजार से ज्यादा लोग शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने जुटेंगे.
सेवानिवृत्त अपरसमार्हता बिरसा ओड़ेया कहते हैं कि क्या हम साईल रकब बुरु के उन शहीदों को भूल रहे हैं, जिन्होंने हमारे भविष्य की बेहतरी के लिए अपना जीवन कुर्बान किया था. वे कहते हैं कि इस पहाड़ पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध मुंडाओं के बेमेल युद्ध में 400 से ज्यादा मुंडा वीरगति को प्राप्त हुए थे. युद्ध के दूसरे दिन मंगलवार को पुलिस दारोगा ने हताहतों को जंगल से खोज-खोज कर टोपोटे बुरु (साईल रकब बुरु) की तलहटी पर इकट्ठा किया. दो बड़े-बड़े गड्ढे खुदवाए और महिलाओं को एक और पुरुषों को दूसरे गड्ढे में फेंक कर दफना दिया. इस जगह को स्थानीय लोग कुड़िको तोपा बदी कहते हैं. ये गुमनाम शहीद भी नमन के हकदार हैं. शहीद दिवस के अवसर पर इन वीरांगनओं और योद्धाओं के लिए कुड़िको तोपा बदी पर श्रद्धासुमन के साथ एक दीप जलाते हैं. वे बताते हैं कि बिरसा मुंडा के राजनीतिक प्रधान डोंका मुंडा के परपोते पोदो मुंडा और पोदो का पुत्र मोसो मुंडा हैं. बिरसा ओड़ेया कहते हैं कि हमारे युवाओं को इन वीरों के योगदान को याद रखना चाहिए.




