
Ranchi : झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, असम और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के कई क्षेत्रों के पेयजल में आर्सेनिक पाया जाना एक गंभीर समस्या है.
अपने राज्य की बात करें तो राजधानी रांची के पथलकुदुवा और साहिबगंज जिले के दीआरी पंचायत में आर्सेनिकोसिक बीमारी काफी लंबे समय से पांव जमाए हुए है. इसके पीछे की मुख्य वजह आर्सेनिक प्रदूषित भूजल होना और उसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर करना है.
लोगों को यह आर्सेनिकोसिक बीमारी न हो. लोग स्वच्छ पानी पी सकें इसके लिए बीआईटी मेसरा ने काफी किफायती आर्सेनिक फिल्ट्रेशन सिस्टम डेवलप किया है. इसे डेवलप करने वाली टीम की माने तो इस आर्सेनिक फिल्ट्रेशन सिस्टम की मदद से केवल तीन पैसे की न्यूनतम खर्च पर एक लीटर पानी फिल्टर किया जा सकता है.
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टीम में शामिल हैं ये लोग
बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी की ओर से रिसर्च स्कॉलर डॉ संजय कुमार स्वेन की लीडरशिप में इसे डेवलप किया गया है. टीम के अन्य सदस्यों में संस्थान के केमिस्ट्री डिपार्टमेंट की प्रोफ़ेसर डॉ उषा झा, रिसर्च स्कॉलर अमूल्य प्रसाद पांडा और बीएआरसी, मुंबई की वैज्ञानिक डॉ संजुक्ता ए कुमार हैं. इस रिसर्च वर्क को सफल बनाने के लिए बीआरएनएस (बीएआरसी) द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की गयी है.
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प्रति दिन 200-240 लीटर तक पानी फिल्टर
विकसित किया फिल्टर आसानी से मिलने वाले पदार्थों से बना है. रिसर्च टीम के मुताबिक इसकी क्षमता की पूरी जांच बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी मेसरा के लैब में की जा चुकी है. इसे स्थानीय लोगों द्वारा कम लागत एवं मूल्य पर बनाया जा सकता है.
इसके साथ ही फिल्टर को स्थापित करना भी कठिन नहीं है. इसे चलने के लिए बिजली की आवश्यकता नहीं पड़ती है. जिससे ये स्थानीय लोगों के लिए काफी सस्ता है.
यह फिल्टर सिस्टम आर्सेनिक के अलावा आइरन, फौस्फेट, मैंगनीज जैसे रसायनों को भी डब्ल्यूएचओ के मानक के अनुरूप लाता है. रिसर्च टीम की माने तो यह फिल्टर प्रति दिन 200-240 लीटर तक पानी को साफ़ कर सकता है. वहीं खर्च की बात करें तो एक लीटर पानी को फिल्टर करने में केवल तीन पैसे का खर्च आयेगा.
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पेटेंट कराने लिए दिया है एप्लीकेशन
बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी मेसरा की टीम की ओर से इसे पेटेंट कराने के लिए आवेदन भी किया जा चुका है. भविष्य में इस विकसित टेक्नॉलोजी को व्यवसायिक बाजार में प्रवेश के लिए भी तैयार किया जायेगा.
रिसर्च टीम का मुख्य लक्ष्य इस सिस्टम को झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के सभी आर्सेनिक प्रदूषित क्षेत्रों में पहुंचाना है.
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