
Ranchi: गढ़वा के चार अनाथ बच्चे अपने भविष्य की चिंता लिये जी रहे हैं. संकटमय होते जीवन को संवारने के लिए उन्होंने झालसा से न्याय की गुहार लगायी है.
बाल संरक्षण के लिए सरकारी स्तर से किये जा रहे प्रयास पिछले पांच सालों में संभवतः उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके हैं.
यही कारण है कि अब अपनी पहचान बचाने और सुरक्षित जीवन के लिए वे अदालत से शरण मांगने पहुंच चुके हैं.
जुलाई, 2015 में बच्चों के सर से उठ गया पिता का साया
गढ़वा सदर अस्पताल में पांच साल पहले एक पिता बीमारी से ग्रसित होकर 25 जुलाई को चल बसा. उसके चार बच्चे अनाथ हो गये. इन बच्चों की माता पूर्व में ही गुजर चुकी थी.
पिता के देहांत के समय चारो भाई बहनों (दो लड़की, दो लड़का) की आयु क्रमशः 14 वर्ष, 10, 7 और 3 वर्ष की थी. वर्तमान में सबसे बड़ी लड़की लगभग 19 बरस की हो चुकी है जो अपने एक छोटे भाई और एक बहन के साथ पलामू में एक निजी आवासीय विद्यालय में रह रही है.
एक छोटा भाई जो कहीं भाग गया था, अभी तक उसके संपर्क में नहीं आ सका है.
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निजी चिकित्सक के नर्सिंग होम में मिला आसरा
जिला बाल संरक्षण इकाई और बाल कल्याण समिति ने अपनी समझ के आधार पर चारों बच्चों को गढ़वा नर्सिंग होम (आर पी सेवा सदन) के संचालक डॉ पतंजलि कुमार केसरी को सौंप दिया.
हालांकि बाल कल्याण समिति, झारखंड के अनुसार उस दौरान (वर्ष 2017) में समुचित प्रावधानों का कड़ाई से अनुपालन नहीं किया गया था.
जब बच्चों को डॉ केसरी को सुपुर्द किया गया था, उस दौरान गढ़वा में अनाथ बच्चों के लिए निजी या सरकारी, किसी भी स्तर पर बाल आश्रयगृह संचालित नहीं हो रहा था. यह समस्या अब भी बनी हुई है.
चार वर्ष में ही डॉक्टर ने बच्चों को बाल संरक्षण इकाई को सौंपा
डॉ पतंजलि केसरी ने चार वर्षों (जुलाई 2015- अगस्त 2019) तक अपने पास चारों बच्चों को रखा. इस बीच उन्होंने बाल कल्याण समिति के पास एक नाबालिग बच्चे के खिलाफ 1 अगस्त, 2019 को लैपटॉप और कुछ पैसों की चोरी कर भाग जाने की शिकायत दर्ज करायी.
21 अगस्त को बाल कल्याण समिति के समक्ष तीनों बच्चों को प्रस्तुत कर भरण पोषण से हाथ खड़े कर दिये.
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ना शिक्षा अधिकार कानून का लाभ, ना सामाजिक सुरक्षा का
अनाथ बच्चों में सबसे बड़ी नाबालिग बच्ची ने 23 जनवरी, 2020 को पत्र लिखा है कि उसके और उसके भाई-बहनों के समक्ष पिछले पांच सालों से विकट स्थिति और गंभीर सवाल खड़े हैं.
झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार, रांची को लिखे पत्र में कहा है कि सरकार की किसी भी योजना का लाभ किसी भी रूप में हमें नहीं मिल सका है.
शिक्षा सुविधाओं का अभाव है, भरण-पोषण के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता भी हमें नहीं मिल रही. सरकार अब हमें विधिक सहायता उपलब्ध कराये.
इधर बाल कल्याण समिति, गढ़वा ने भी इन अनाथ बच्चों के मामले में वैधानिक निकायों के स्तर से अपनायी गयी लापरवाही पर निराशा जाहिर करते हुए 22 जनवरी को गढ़वा डीसी और अन्य संबंधित विभागीय पदाधिकारियों से कार्रवाई करने का अनुरोध किया है.
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