
Ranchi: झारखंड में पेसा नियमावली को जल्द से जल्द धरातल पर उतारे जाने का प्रयास होगा. गुरुवार को रांची के एक होटल में ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज विभाग, झारखंड की ओर से आयोजित पेसा विचार गोष्ठी पर आयोजित एकदिवसीय कार्यशाला में सरकार की ओर से इसका आश्वासन दिया गया. कार्यशाला का उद्देश्य पेसा अधिनियम के तैयार ड्राफ्ट पर चर्चा का रहा. इसमें कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन, मंत्री दीपक बिरुआ,
झारखण्ड विधान सभा के कई सदस्य, पंचायतीराज विभाग के प्रधान सचिव विनय कुमार चौबे, राज्य सरकार के वरीय पदाधिकारी एवं राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से निर्वचित प्रतिनिधि, गैर सरकारी संस्थाओं के प्रतिनिधि और समाज के अगुआ, सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य भी उपस्थित थे. कार्यक्रम के प्रारंभ में पचायती राज विभाग के प्रथान सचिव के द्वारा पेसा की पृष्टभूमि और झारखण्ड के संदर्भ में इसकी महत्ता पर प्रकाश डाला गया. उन्होंने झारखण्ड में पेसा अधिनियम से आच्छादित क्षेत्रों का भी विस्तृत रूप से वर्णन किया. खूंटी के जिला पंचायतीराज पदाधिकारी शिशिर कुमार ने झारखण्ड सरकार के द्वारा तैयार किये गए ड्राफ्ट पेसा नियमावली, 2024 पर विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया. कार्यक्रम के दूसरे सत्र में अलग अलग पैनल में शामिल प्रतिनिधियों से पेसा अधिनियम के ड्राफ्ट पर चर्चा करते हुए उनके द्वारा दिये गये कई महत्वपूण सुझाव पर प्रकाश डाले गए. इसके बाद पूर्व अपर सचिव, राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के राजू द्वारा झारखंड की पारंपरिक ग्राम सभा के अलग-अलग पहलूओं की तारीफ की गयी. कुछ उपयोगी सुझाव देते कहा कि विमर्श के आधार पर ही पेसा नियमावली तैयार करेंI नियमावली तैयार करने में ग्राम स्तर के अंतिम व्यक्ति तक से विचार करने की भी बात कही. साथ ही JPRA एक्ट 2001 के संशोधन पर भी चर्चा करते हुए schedule area के लिए नया एक्ट बनाने का सुझाव दिया. दूसरे राज्यों में क्रियान्वित पेसा नियमावली के अनुभवों से सीखते हुए झारखण्ड राज्य के अपने पेसा नियमावली को तैयार करने पर भी जोर दिया. उनके द्वारा इस अधिनियम को आदिवासियों के अधिकार को देखते हए बनाने पर चर्चा की गयी.
नियमावली बनाने में सामूहिकता पर जोर
मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की द्वरा पेसा नियमावली में सामृहिकता पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई. कहा कि आज आदिवासी की पहचान उनके जल, जंगल, जमीन, नाला, आम के पेड़ से पहचान हो रही है जिसके संरक्षण की अति आवश्यकता है.आज हम सबों की अपनी एकाउंटेबिलिटी एवं रेस्पोंसिबिलिटी परं सबसे जयादा महत्व देने की जरुरत है. साथ’ही इससे संबंधित कार्य में ट्राइबल डेवलपमेंट बोर्ड के प्रतिनिधियों को भी शामिल
करने की बात कही. वर्तमान पेसा कानून को लेकर जो उलझनें हैं, उसे सुलझा पाना इतना आसान नहीं है. लेकिन सरकार ने सकारात्मक सोच के साथ आलोचनाओं को आमंत्रित किया है. आज जब पेसा कानून पर राज्य में गंभीर चर्चा हो रही है तब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के उस कथन को याद करने की जरूरत है. उन्होंने कहा था कि देश विकास कर रहा है और आगे भी करता रहेगा. लेकिन परंपरा, सभ्यता और संस्कृति धूमिल हो गई तो इस विकास का कोई फायदा नहीं होगा. आदिवासी समाज के विकास के लिए बजट का प्रावधान होता है लेकिन उस पैसे का सही उपयोग कैसे हो, ये सबसे बड़ी चुनौती है. इस विकास में आदिवासी, मूलवासी की परंपरा और संस्कृति का संरक्षण भी शामिल होना चाहिए. आज दिलीप सिंह भूरिया समिति की रिपोर्ट को अध्ययन करने की जरूरत है. उस रिपोर्ट में राज्य सरकार और ग्राम सभा के बीच बेहतर समन्वय जानकारी मिलेगी. ये बहुत जरूरी है. किसका क्या अधिकार हो, ये सुनिश्चित करना होगा. पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों में आदिवासी समाज के संरक्षण के लिए पहले से कानून बने हुए हैं. इस कानून में आदिवासी और मूलवासी के संरक्षण को तय किया गया है. आदिवासी समाज में सामूहिकता की भावना होती है. आज जरूरत है तो अपने दायित्व और जिम्मेवारी को समझने की. पंचायती राज विभाग ने बेहतर पहल की है इस पहल का परिणाम भी बेहतर होगा.
मंत्री रामदास सोरेन एवं मंत्री दीपक बिरुआ द्वारा इस कार्यशाला के आयोजन की सराहना की गयी.
उनके द्वरा सभी प्रतिभागियों के सुझाव पर विचार करते हुए जल्द से जल्द संशोधन करते हुए पेसा कानून को लागू करने का भरोसा भी दिया. कार्यक्रम के आखिरी सत्र के बाद मंत्री दीपिका पाण्डेय सिंह ने कार्यशाला में सभी सुझावों पर समेकन करते कहा कि सभी के प्रयास से स्वशासन व्यवस्था को सशक्त किया जायेगा. आश्वस्त करते कहा कि पेसा नियमावली की लागू करने से पहले सभी नियमसंगत सुझावों को नियमावली में समावेशित किया जाएगा. विश्वास जताते कहा कि यह एक ऐसी नियमावली बनायी जाएगी जो पूरे देश में नजीर बनेगा.



