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एकलव्य की श्रद्धा बनाम द्रोणाचार्य की क्षुद्रता ! (संदर्भ मोदी का देवघर में भाषण)

एकलव्य की श्रद्धा बनाम द्रोणाचार्य की क्षुद्रता ! (संदर्भ मोदी का देवघर में भाषण)
Sri Nivas

गत 15 मई को देवघर (झारखंड) में महाभारत के चर्चित पात्र एकलव्य को याद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन में जनजातीय समुदायों या आदिवासियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान बढ़ गया. उनके मुताबिक, जब वे एक आदिवासी फिल्म की शूटिंग देख रहे थे (कब और कौन-सी फिल्म, यह नहीं बताया), तब उनको पता चला कि आज भी आदिवासी तीर चलाने में अंगूठे का इस्तेमाल नहीं करते. इसलिए कि एकलव्य ने अपना अंगूठा काटकर गुरु दक्षिणा के रूप में दान कर दिया था !

श्री मोदी ने यह भी नहीं बताया कि उन्हें गुरु द्रोणाचार्य (जन्मना ब्राह्मण) द्वारा एकलव्य से अंगूठा  मांग लेने की बात जानकर कैसा महसूस होता है? या कि वह प्रसंग वे जानते ही नहीं, या उसे याद नहीं करना चाहते हैं?

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महाभारत की कथा के मुताबिक, कौरव और पांडव राजकुमारों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देनेवाले द्रोणाचार्य ने एकलव्य को उसकी जनजातीय पहचान के कारण शिक्षा देने से मना कर दिया था. ऐसा ही उन्होंने ‘शूद्र’ कर्ण के साथ भी किया था.

लेकिन द्रोण को गुरू मान उनकी प्रतिमा के सामने स्वतः अभ्यास कर एकलव्य धनुर्विद्या में पारंगत हो गया. वन में अपने राजकुमार शिष्यों के साथ विचरण करते हुए अनायास उसका कौशल देखकर उसे पहचाने बिना द्रोण ने पूछा- तुम किनके शिष्य हो?

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एकलव्य ने उन्हें प्रणाम करने के बाद उनकी प्रतिमा दिखाते हुए बताया कि वह तो उनका ही शिष्य है. इसपर भी शर्मिंदा होने के बजाय द्रोण इस चिंता में पड़ गये कि यह तो उनके अपने प्रिय शिष्य अर्जुन से भी आगे जा सकता है, जबकि वे अर्जुन को ही बड़ा धनुर्धर बनाना चाहते थे. उन्होंने कहा- तब तो तुमको मुझे गुरु दक्षिणा भी देनी होगी.

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एकलव्य ने कहा- आदेश करें. और द्रोणाचार्य ने बिना हिचक उसका अंगूठा मांग लिया. एकलव्य ने बिना देर किये अपना अंगूठा काटकर उनके चरणों में अर्पित कर दिया.

इस कथा में जहां एकलव्य की महानता दिखती है, वहीं द्रोणाचार्य की कुटिलता और उनका स्वार्थ भी नजर आता है. लेकिन वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक और उसके लाभुक ‘विद्वानों’ ने इसमें भी द्रोण की ‘महानता’ ढूंढ निकाली.

एक व्याख्या यह की गयी कि द्रोण ने एकलव्य को अंगूठे के बिना तीर चलाने का अभ्यास देकर उसे और भी बड़ा धनुर्धर बनाने के लिए ऐसा किया था ! और यह भी प्रचारित कर दिया कि एकलव्य के उस कृत्य को याद करते हुए आज भी जनजातीय समुदायों के युवा तीर चलाने में अंगूठे का प्रयोग नहीं करते, बल्कि ऐसा करना गलत मानते हैं. और यही जानकर श्री मोदी अभिभूत हो गये. अद्भुत!

कुछ ऐसे ही तर्क पति के प्रति समर्पित पतिव्रता नारी/पत्नी के लिए भी दिया जाता है. दावा किया जाता है कि अपने पति का निधन होने पर हिन्दू पत्नी पति की चिता के साथ ‘स्वेच्छा’ से जल मरती थी ! वह अपने पति को परमेश्वर तो मानती ही है.

और ऐसे ही तर्क मालिक के प्रति नौकर की वफादारी के लिए भी दिया जाता है. वह भी स्वेच्छा और समर्पित भाव से गुलामी करता है!

क्या पति, मालिक या गुरु के प्रति एकलव्य का ऐसा समर्पण भाव सचमुच स्वेच्छा से उपजता है या यह उस अनुकूलन का परिणाम है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी, सदियों से उनको सिखाया जाता है?

महाभारत की कहानी तो काल्पनिक भी हो सकती है, लेकिन यह तो सच है ही कि अपवादों को छोड़ कर हमारे जनजातीय/आदिवासी और अन्य वंचित तबके लगातार द्रोण-नुमा छल के शिकार होते आये हैं,

मगर हमारा समाज आज भी द्रोणाचार्य का सम्मान करता है. उनके नाम पर खेल शिक्षक के लिए सबसे बड़े सम्मान का नामकरण भी किया गया है. हां, हम एकलव्य को भी याद कर लेते हैं, जब उस समुदाय के प्रति अपने लगाव का दिखावा करना जरूरी होता है.

इसलिए जब मोदी जनजातीय युवाओं द्वारा बिना अंगूठे के तीर चलने की बात पर मुग्ध होते हैं और एकलव्य के प्रति उनके मन में सम्मान बढ़ जाता है, तब वे जाने-अनजाने द्रोणाचार्य (या शोषण पर टिकी ब्राह्मणवादी व्यवस्था) के उस दुष्कृत्य को सही बता रहे होते हैं.

क्या श्री मोदी; और हम भी, चाहते हैं कि जनजातीय समुदाय के युवा एकलव्य जैसे ‘श्रद्धा भाव’ से आधुनिक द्रोणाचार्यों के छल का शिकार और हम उसपर अभिभूत होते रहें !

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(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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