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गुमलाः 5 किमी पैदल चल पानी लाने को मजबूर आदिम जनजाति, खनन के कारण सूख रहे हैं झरने भी

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पेयजल संकट से जूझ रहा आदिम जनजाति परिवारों का टोला, परिवार का एक सदस्य इसी कार्य में लगा रहता है

पेयजल संकट और रोजगार के साधन न होना इलाके में पलायन का है बड़ा कारण, छ: माह में पलायन कर गये कई परिवार

Pravin Kumar

Gumla: शहरों में भूगर्भ जल का स्तर घटता जा रहा है. पानी की किल्लत से जूझ रहे शहरी आबादी की खबरें तो अक्सर सुर्खियां में रहती है.

लेकिन ग्रामीण अंचल जहां बोरिंग न हो, झरने भी सूख गये हो उन इलाकों में रहने वालों की जिंदगी बिन पानी बद से बदत्तर हो जाती है.

कुछ ऐसी ही स्थिति है गुमला जिला के बिशनपुर प्रखंड स्थित सिरका पंचायत के आदिम जनजाति असुर बहुल कई टोलों की. जहां पाने का पानी लाने के लिए चार से छ: किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है, तब जाकर प्यास बुझती है असुर और विरीजिया टोला में रहने वाले परिवारों की.

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सेरका एवं विशुनपुर पंचायत में आदिम जनजाति समूह के असुर एवं विरीजिया परिवार निवास करते हैं. इनकी अजीविका पहले वन उपज और पशुपालन पर निर्भर थी, जो अब बदलती जा रही है.

इनकी अजीविका का मुख्य स्रोत अब श्रम आधारित हो गया है.
इन परिवार के पास कृषि योग भूमि काफी कम है. पहाड़ी ढलान पर 10 डिसमिल से 2 एकड़ तक कुछ परिवार के पास भूमि जरूर है. लेकिन उस में धान की खेती नहीं होती है.

जलावन की लकड़ी बेचकर पेट की आग बुझाते हैं

मंजिरापाट में रहने वाली ललिता असुर कहती है, पाठ इलाके में पानी की बहुत कमी है. बोरिंग नही होने की वजह से झरने के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है.

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गांव के कुछ परिवार वन से जलावन की लकड़ी लाते हैं और उसे बेचकर अपनी अजीविका चलाते हैं. लेकिन इससे होनेवाली आमदनी, रोजाना श्रम दिवस की मजदूरी से भी कम होती है.

साल में करीब 80 से 90 दिन लकड़ी बेच पाते हैं. वर्षा ऋतु में आदिम जनजाति परिवार के पास अपनी कृषि योग भूमि कम होने के कारण उरांव एवं खेरवार आदिवासी समूह के खेतों में महिला और पुरूष कृषि मजदूर बन कर काम करते हैं.

पलायन को मजबूर आदिम परिवार

गांव के कई परिवार धन कटनी के बाद जल संकट और रोजगार के साधन नही होने की वजह से साल के 6 माह पलायन कर ईंट-भट्टा में काम करने चले गये हैं. जहां वह अपने परिवार के सभी सदस्यों को साथ ले जाते हैं.

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इसमें सबसे अधिक कठिनाई बच्चों को होती है. उनकी पढ़ाई-लिखाई छूट जाती है और विद्यालय से दूर हो जाते है. और वैसे ही बच्चे धीरे-धीरे शिक्षा से वंचित होने लगते हैं.

पूरा पाट इलाका विशेष कर आदिम जनजाति जहां बसे हैं, वह पहाड़ी ढलान है या पहाड़ी के ऊपरी हिस्से पर है. और अपनी रोजमर्रा के पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए 2 से 5 किलोमिटर चलना पड़ता है. परिवार का एक सदस्य इसी कार्य में लगा रहता है.

पानी की कमी पशुपालन की राह में बाधा 

पहाड़ के ढलान पर बसा टोला

कबरापाढ़ के सुधैयन देवी कहती है अब यह इलाका बदल गया है. पहले जंगल से जीने-खाने का साधन मिल जाता था, लेकिन अब नहीं मिलता. पशुपालन भी यहां करना कठिन है, क्योंकि जब हमलोगों को ही पीने का पानी नहीं मिल पाता तो पशुओं को कहा से पानी पीने के लिए देंगे. बॉक्साइड के खनन से इलाके के झरने सूखने लगे हैं.

असुरों का परंपरागत लौह कार्य या लोहा गलाने की कला से अब असुर दूर हो गयी है. दूर हो जाने के कारण उनके पास अपना हुनर नहीं बचा है. कुछ परिवार लौहारी के काम में लगे है, जो किसानों का टांगी, परांपरागत कृषि उपकरण बनाने और उसे तेज करने जैसे कार्य करते हैं.

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राज्य सरकार पिछले एक दशक से इस इलाके के लोगों को पशुपालन से जुड़ने की कोशिश में है. लेकिन पेयजल संकट और योजनाओं का सही से संचालन नही होने से सरकार को भी आशा के अनुरूप सफलता नहीं मिल सकी है.

जब इसका कारण पूछने पर सुधैयन देवी कहती है कि बकरी पालन, मुर्गी पालन, सुअर पालन आदि योजना का लाभ तो मिल रहा है, लेकिन सही ढंग से पलातु पशुओं का उपचार नहीं हो पाता है. जिस कारण घर में मौजूद पशुओं के साथ सरकारी योजना से मिले पशुओं की भी मृत्यु हो जाती है.

इससे उन्हें काफी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है. यातायात एवं सुगम मार्ग नहीं होने के कारण अपनी आजीविका के संबंधी सामग्री को खरीद बिक्री में भी इस क्षेत्र मे रहने वाले परिवार को परेशानी होती है. इलाके में चिकित्सा सुविधा का घोर अभाव है. आदिम जनजाति परिवार अपने परंपरागत ज्ञान के आधार में अपना उपचार करने की कोशिश करते हैं.

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