Opinion

मोदी सरकार की गलत नीति के कारण अब वह दिन आ गया- “घर में शादी है, पैसे नहीं हैं”

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Girish Malviya

‘घर में शादी है, पैसे नहीं हैं’….. जब भी मुझे नोटबंदी के दो दिन बाद जापान में दिया गया मोदी जी का भाषण याद आता है, तब याद आता है 8 नवम्बर 2016 की शाम 8 बजे से भारत के दुर्भाग्य की शुरुआत हुई. 28 जुलाई को उसके प्रभाव को सरकार ने स्वीकार किया है.

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वित्त सचिव अजय भूषण पांडे ने मंगलवार को संसदीय स्थायी समिति (वित्त) को बताया कि सरकार मौजूदा राजस्व बंटवारे के फार्मूले के अनुसार राज्यों को उनकी जीएसटी हिस्सेदारी का भुगतान करने की स्थिति में नहीं है.

वित्त सचिव के ऐसा कहे जाने पर सदस्यों ने सवाल किया कि सरकार राज्यों की प्रतिबद्धता पर किस तरह से अंकुश लगा सकती है. नाम न जाहिर करने की शर्त पर एक सदस्य ने बताया कि इसके जवाब में अजय भूषण पांडे ने कहा, ‘अगर राजस्व संग्रह एक निश्चित सीमा से नीचे चला जाता है तो जीएसटी एक्ट में राज्य सरकारों को मुआवजा देने के फार्मूले को फिर से लागू करने के प्रावधान हैं.’

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दरअसल, GST कानून में साफ है कि राज्यों को 14 प्रतिशत वृद्धि दर के हिसाब से पांच वर्षों तक राजस्व कमी की भरपाई की जायेगी. लेकिन अब मोदी सरकार इससे मुकर रही है. जनवरी, 2019 से मार्च, 2020 की अवधि के दौरान राज्यों को किये जानेवाले मुआवजे का भुगतान करीब 60,000-70,000 करोड़ रुपये है. केंद्र को इसका भुगतान 2020 की पहली तिमाही तक करना था. लेकिन अब तक वह भुगतान नहीं कर सकी है. रेलवे को अपने 15 लाख कर्मचारियों को पेंशन देने के लिए 55 हजार करोड़ की जरूरत है, वो भी नहीं हैं देने के लिए.

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जीएसटी से हासिल केंद्रीय राजस्व की बात करें तो पिछले साल वह तय लक्ष्य से करीब 40 फीसदी कम रहा है. पहले के वर्षों की तुलना में जीएसटी राजस्व घटा है. वहीं उपकर भी जरूरत से कम आया है.

यह कोरोना काल से पहले की बात हो रही है. तो ऐसा क्यों हो रहा है. हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत नोटबंदी के बाद से ही आर्थिक मंदी के जाल में फंस चुका है.

लेकिन सरकार यह स्वीकार ही नहीं करना चाहती कि देश में आर्थिक मंदी है. जीएसटी संग्रह में कमी का कारण भी आर्थिक सुस्ती है. पर, ऐसे कब तक बचा जा सकता है. एक न एक दिन सरकार को असलियत बतानी ही होगी. आज वित्त सचिव अजय भूषण पांडे ने यह स्वीकार किया है.

हालात यह है कि रेलवे की तरह ही जल्द ही वह दिन आनेवाले हैं जब राज्य सरकारों के पास अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं होंगे. क्योंकि राज्य सरकारों ने अपने सारे सोर्स तो केंद्र सरकार के हवाले कर दिये हैं. जल्द ही सरकारी कर्मचारियों और सरकारी पेंशन धारकों को यह दिन देखना पड़ेगा जो मोदी जी ने बोला था – ‘घर में शादी है, पैसे नहीं हैं.’

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