
Political Editor
Ranchi : झारखंड में कांग्रेस पार्टी तो सत्ता में साझीदार है लेकिन अपनी ही सरकार के फैसले से पार्टी के विधायक और नेता हलकान हैं. इनका हाल सांप छुछुन्दर वाला हो गया है. आलम यह है कि न तो कांग्रेस पार्टी सरकार के फैसले का विरोध कर पा रही है और न ही खुलकर समर्थन. कह सकते हैं कि कांग्रेस के विधायक सरकार में रहते हुए असहज महसूस कर रहे हैं.
कई ऐसे मामले हैं जैसे झारखंड विधानसभा भवन में नमाज कक्ष का आवंटन करने, राज्य की नई नियोजन नीति में मगही, अंगिका व भोजपुरी सहित कई अन्य भाषाओं को हटाने, स्थानीय नीति पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के रुख आदि जिन्हें लेकर गठबंधन सरकार में सहयोगी कांग्रेस के विधायक खुद को बहुत सहज नहीं पा रहे हैं. ये किसी मुद्दे पर सरकार का खुलकर विरोध तो नहीं कर रहे हैं, लेकिन इन मुद्दों के कारण पार्टी को भविष्य में होने वाले संभावित नफा-नुकसान को लेकर उलझन में हैं.
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पार्टी में अब विरोध के स्वर फूटने लगे
भाजपा ने जिस तरह से इन मुद्दों पर खासकर नमाज कक्ष के आवंटन को लेकर आंदोलन छेड़ दिया, उससे भी कांग्रेस दबाव में है. कांग्रेस के अंदर भी अब विरोध के स्वर फूटने लगे हैं. कांग्रेसी विधायक व स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता कह रहे हैं कि विधानसभा भवन में आवंटित कमरा नमाज कक्ष नहीं, बल्कि सभी धर्मो के लोगों के लिए प्रार्थना कक्ष है और वह खुद भी उसमें जाकर प्रार्थना करेंगे.
मानसून सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ जैसे मुखर रहे, उससे इस मुद्दे पर टकराव बढ़ेगा. विधायक दीपिका पाण्डेय सिंह हों या पूर्णिमा नीरज सिंह सभी भाषा के मामले पर सरकार के फैसले का विरोध कर चुकी हैं. दीपिका पाण्डेय सिंह ने तो खुलकर भाषाई मामले की खिलाफत की थी.
पूर्णिमा नीरज सिंह का भी कहना है कि झारखंड में भोजपुरी, मैथिली सहित अन्य भाषाओं के बोलनेवाले लोग हैं सरकार को इनकी भी चिंता करनी चाहिए.
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नमाज कक्ष विवाद की भेंट चढ़ गया मानसून सत्र
विधानसभा का मानसून सत्र नमाज कक्ष की भेंट चढ़ गया. पूरे सत्र में किसी भी मुद्दे पर कोई सार्थक बहस नहीं हो सकी. भारी हंगामे के बावजूद सत्ता पक्ष ने कुछ महत्वपूर्ण विधेयक जरूर पास करवा लिए हैं.
इसके लिए वह अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन भाजपा विधायकों के विधानसभा के बाहर भजन-कीर्तन और अंदर हनुमान चालीसा के पाठ से ये सवाल तो उठना शुरू हो ही गया है कि क्या नमाज कक्ष आवंटन का विधानसभा अध्यक्ष का आदेश संविधान सम्मत है?
क्या विधानसभा में किसी संप्रदाय विशेष के लिए इबादत की व्यवस्था की जा सकती है? विधानसभा सावर्जनिक भवन है और क्या वहां ऐसा करना उचित है?
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हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल
विधानसभा अध्यक्ष के आदेश के खिलाफ झारखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की गई है, जिसमें नमाज कक्ष के आवंटन आदेश को निरस्त करने की मांग की गई है. याचिका में कहा गया है कि विधानसभा परिसर में किसी धर्म विशेष के लिए कक्ष आवंटित करना विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. याचिका में 42वें संविधान संशोधन का हवाला दिया गया है.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता का कहना है कि विधानसभा भवन जनता के पैसों से बना है, ऐसे में वहां किसी धर्म विशेष के लिए कक्ष आवंटित करना असंवैधानिक है. इस बीच भाजपा के प्रबल विरोध को देखते हुए एक सवर्दलीय समिति भी बना दी गई है, जो यह तय करेगी कि विधानसभा भवन में नमाज कक्ष होना चाहिए या नहीं.
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भाजपा ने बनाया मुद्दा, विरोध प्रदर्शन किया
उच्च न्यायालय का निर्णय जो भी हो, लेकिन राज्य की राजनीति में नमाज कक्ष एक बड़ा मुद्दा बन चुका है और आने वाले चुनावों में भाजपा इसे जोर-शोर से उठाएगी. भाजपा ने इस मुद्दे पर पांच दिनों तक सदन बाधित करने के साथ ही राज्यभर में प्रदर्शन और विधानसभा का घेराव कर आंदोलन का बिगुल फूक दिया है.
भाजपा के कुछ नेता विधानसभा परिसर में ही हनुमान मंदिर बनवाने या हर मंगल को पूजा करने के लिए अलग जगह के आवंटन की भी मांग कर रहे हैं.
कहा जा सकता है कि सत्ता पक्ष ने खुद ही काफी दिनों से सुस्त पड़ी भाजपा को उनके मनमाफिक मुद्दा पकड़ा दिया है.
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बिहार विधानसभा में नमाज कक्ष होने का हवाला
इधर सत्ता पक्ष बिहार विधानसभा में नमाज कक्ष होने का हवाला देकर भाजपा पर हमलावर है. झामुमो और कांग्रेस के नेता पूछ रहे हैं कि बिहार में तो एनडीए की सरकार है. भाजपा वहां इस व्यवस्था को खत्म करवाए.
हालांकि बिहार में भी नमाज कक्ष के आवंटन का कोई लिखित आदेश सामने नहीं आया है. झामुमो और कांग्रेस यह भी तर्क दे रहे हैं कि राज्य गठन के बाद भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी के समय से यह व्यवस्था चली आ रही है और भाजपा बेवजह इसे तूल देकर सांप्रदायिक राजनीति कर रही है.
झामुमो और कांग्रेस के नेता भाजपा को पूरी तरह मुद्दाविहीन भी बता रहे हैं. जबकि सदन में ही झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री और भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने यह साफ़ कर दिया कि उनके समय में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हुई थी.
हालांकि सत्ता पक्ष विधानसभा में पहले से ही नमाज कक्ष की व्यवस्था के तर्क के समर्थन में उस समय के नोटिफिकेशन की कापी उपलब्ध नहीं करा सका है.
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कांग्रेस ऊहापोह में
अब कांग्रेस के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिन मुद्दों को लेकर भाजपा विरोध कर रही है उसको लेकर वह सरकार का समर्थन करे या नहीं. कांग्रेस पार्टी का बड़ा वोट बैंक उन इलाके में है जहाँ भोजपुरी, अंगिका, मैथिली और मगही भाषाएँ बोली जाती हैं. महागामा से कांग्रेस की विधायक दीपिका पाण्डेय सिंह हैं. इ
नके क्षेत्र में अंगिका और भोजपुरी बोलनेवालों की संख्या काफी है. इसी तरह झरिया से पूर्णिमा नीरज सिंह विधायक हैं यहाँ भोजपुरी और मैथिली बोलनेवालों की अच्ची संख्या है. मंत्री बादल पत्रलेख के क्षेत्र में अंगिका भाषा का प्रचलन है.
यही वजह है कि पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी ने पार्टी लाइन से बाहर जाकर भाषा मामले पर सरकार के विरोध में बयान दिया था.
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