Opinion

जेपी और अमिताभ के नायकत्व में अंतर

Faisal Anurag

जय प्रकाश नारायण और अमिताभ बच्चन का आज जन्म दिन है. दोनों के व्यक्तित्व या विचारों में कोई समानता नहीं है. बावजूद इसके कुछ ऐसे तत्व हैं जिसकी अपनी खासियत है. जेपी ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में तानाशाही विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया और देश भर के युवाओं को राजनीतिक तौर पर सक्रिय किया.

जेपी ने विचारों के आधार पर एक बड़े जनांदोलन के माध्यम से आजादी के बाद से आये राजनीतिक ग्रामर में नया चैप्टर संलग्न किया. जेपी आंदोलन का ही असर है कि पूरे हिंदी इलाके की राजनीति प्रभावित हुई. 80 की राजनीति में अनेक बदलावों की पृष्ठभूमि इस आंदोलन ने ही तैयार की है. जेपी के आंदोलन में शामिल राजनीतिक धड़ों के भारतीय राजनीति पर बढ़े प्रभाव में इस आंदोलन की भूमिका रही है.

जेपी केवल राजनीतिक बदलाव ही नहीं चाहते थे बल्कि सामाजिक परिवर्तन पर उनका जोर था. हालांकि उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका है. जेपी जोर देते थे कि बिना सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन के क्रांति की मंजिल  हासिल नहीं की जा सकती.

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अमिताभ बच्चन भी इसी दौर के एंग्री यंगमैन की छवि से स्थापित हुए. जंजीर और शोले जैसी उनकी फिल्में जिन्होंने उनके स्टरडम को उभरा इसी दौर की हैं. वरिष्ठ पत्रकार अरूण रंजन ने अपने एक विश्लेषण में जेपी ओर अमिताभ के सामाजिक बदलावों पर असर को ले कर टिप्पणी की है. एंग्री यंगमैन की छवि ने भारत में उस युवासक्रियता को बांझ-सा बनाने का प्रयास किया जिसने कभी वसंत की गर्जना के साथ 1997 में दस्तक दिया था या नया बिहार और भारत बनाने के जेपी आंदोलन के संपर्क से उभरा था.

जेपी ने युवाओं को एक ऐसे मूल्यबांध से लैस करने का प्रयास किया जो आजादी की लड़ाई के सपनों और मूल्यों से जुड़ा हो. जब कि अमिताभ का नायकत्व इसके ठीक विपरीत एक ऐसी युवा पीढ़ी का स्वप्न गढ़ गया जो मूल्यों से परहेज करते हुए अपने गुस्से को तो उतारता है लेकिन इसके लिए तमाम अनैतिक प्रक्रिया और संसाधनों का भी इस्तेमाल करता है.

जेपी का गांधीवाद मूल्यों और संसाधनों की शुचिता पर जोर देता है और सामाजिक आर्थिक कुरीतियों के खिलाफ जनसमुदाय की सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सेदार बनने का आग्रह करता है. जेपी आंदोलन ने विचारों से लैस युवाओं का समूह बनाया जबकि अमिताभ का फिल्मी नायक इसके निषेध में खड़ा किया गया. अमिताभ के अधिकतर फिल्मों के डायलॉग लेखक सलीम जावेद के डायलॉग की इसमें बड़ी भूमिका रही. जावेद तो विचारों से वामपंथ के माने जाते हैं लेकिन उनके डायलॉग समूह की प्रक्रिया के बजाय किसी खास के नायकत्व को असरदार बनाने का उपक्रम साबित हुआ.

भारत में एक तरफ जहां जेपी के बाद की राजनीति और समाज में वंचित जनों की हिस्सेदारी के आंदोलन और राजनीतिक वर्चस्व का दौर खड़ा हुआ वहीं दूसरी ओर युवाओं के एक बड़े तबके में गहरी निराशा ने फिल्मी नायकत्व के प्रतिकार से ही अपने को आत्मसात कर लिया.

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मुख्यधारा की राजनीति में बाद के दिनों में तो जेपी को भी केवल अधिनायकवादी के प्रतिरोध आंदोलन का ही प्रतीक बना दिया. जेपी के उन सारे विचारों का भी उसी तरह निषेध करने का प्रयास किया गया जैसा गांधी या पटेल के साथ हो रहा है. गांधी को केवल स्वच्छता की छवि में कैद कर दिया गया है और पटेल की बड़ी प्रतिमा खड़ी कर उनके सामाजिक राजनीतिक विचारों को गौण करने का प्रयास किया गया है.

आज कश्मीर में 370 हटाये जाने के बाद भारी बेचैनी है. जेपी, गांधी ओर पटेल तीनों के कश्मीर संबंधी विचारों को चर्चा में लाने से जिस तरह से परहेज हो रहा है, वह सामान्य नहीं है. भारत की मुख्यधारा नेतृत्व में जेपी को कश्मीर में जिस इज्जत से देखा जाता रहा है उसके ठोस कारण हैं. जेपी, नेहरू दोनों के लिए कश्मीर के लोग महत्वपूर्ण थे. जेपी ने कश्मीर के लोगों के साथ जीवंत संवाद बनाया था. जेपी ने इसी तरह नागालैंड में भी शांतिस्थापना के जो कार्य किये थे, उसे नागाजन याद करते हैं. अमिताभ बच्चन 370 हटाये जाने का समर्थन कर चुके हैं. इसलिए अमिताभ बच्चन एक तरह से जेपी आंदोलन के दौर में एक प्रतिक्रियावादी ही दिखते हैं.

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जेपी के उन विचारों की अब चर्चा भी नहीं की जाती है जो उन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ व्यक्त की है. जेपी ने अपनी एक कविता में स्वयं ही जीवन को एक प्रयोग बताया है. इसका बेहद गहरा अर्थ है. हालांकि जेपी पर यह आरोप भी है कि 1974 में उन्होंने आरएसएस को सामाजिक मान्यता दिलायी. हालांकि इसे लेकर विवाद भी है. लेकिन यह तथ्य है कि लोहिया ने 1967 में जिस गैर कांग्रेसवाद की नींव डाली उसके बाद से ही जनसंघ का राजनीतिक विस्तार और समर्थन बढ़ा. 12 अक्तूबर को उनका स्मृति दिवस है. अभी दो दिनों पहले ही कांशीराम का स्मृति दिवस भी गुजरा है. कांशीराम ने बहुजन राजनीति का एक ऐसा ग्रामर गढ़ा जो आज सोशल इंजीनियरिंग के नाम से बीजेपी तक इस्तेमाल कर रही है. कांशीराम ने बहुजनों के राजनीतिक स्वतंत्रतापूर्ण भागीदारी की जोरदार अगुवाई की है.

गांधी की 150वीं जयंती के इस अवसर पर जेपी की स्मृति के निहितार्थ हैं, जब लोकतंत्र, संविधान और आजादी के मूल्यों की हिफजत के साथ जनसक्रियता को वैज्ञानिक चेतना प्रदान की जाये. जो संविधान की प्रस्तावना की समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों से लैस हो. साथ ही एकाधिकारवादी राजनीतिक प्रवृतियों और व्यक्तिवादी नायकत्व को खारिज किया जाये जैसे जेपी ने इमरजेंसी को खारिज किया.

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