
Ranchi: दिव्यांगता को भी अवसर के रूप में बदला जा सकता है. कुछ दिव्यांगों ने इसे साकार भी किया है. झारखंड की राजधानी रांची स्थिति नामकुम के आठ दिव्यांगों ने अपनी दिव्यांगता को खुद पर हावी नहीं बनने दिया और आज वे ना सिर्फ आत्मनिर्भर हुए हैं बल्कि दूसरे जरूरतमंदों के लिये मददगार बन रहे हैं.
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ऐसे कर रहे हैं काम:
इन दिव्यांगों ने अपना एक समूह बनाया और उस समूह के माध्यम से जन वितरण प्रणाली की दुकान खोल लोगों की सेवा में जुट गए हैं. हालांकि इस पहल के बाद भी प्रत्येक दिव्यांगों के पास प्रति माह 500 से 1000 रुपए ही आ पाते हैं. फिर भी इन लोगों का मानना है कि इस तरह से लोगों की सेवा कर उन्हें आत्मसंतुष्टि मिलती है जो सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है.
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लॉकडाउन में गरीब व बेसहारा लोगों के यहां अनाज पहुंचाया:
लॉकडाउन में इन लोगों ने सामूहिक चंदा कर गरीब व बेसहारा लोगों के यहां अनाज पहुंचाया. साथ ही उन लोगों के लिए सब्जी से लेकर राशन भी उपलब्ध कराया. इन दिव्यांगों ने थ्री व्हीलर स्कूटर से ऐसे लोगों के घर पहुंचे और समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है.
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क्या कहते हैं मुकेश:
पैरों से दिव्यांग मुकेश बताते हैं कि उन सभी में कुछ भी कर आत्मनिर्भर बनने की इच्छा थी. सबसे पहले एक समूह बनाया और उस समूह को पीडीएस चलाने के लिए लाईसेंस मिला. हालांकि पीडीएस से उतनी आमदनी नहीं होती है, जिसके लिए उन्हें खेती-बारी में भी समय देना पड़ता है. लेकिन समाज में जो इज्जत व सम्मान आज उन्हें मिल रहा है उससे वे काफी खुश हैं. गरीबों को हरसंभव राशन देने व जरूरत पड़ने पर खुद समूह के दिव्यांग सदस्य बुजूर्गों के घर तक राशन पहुंचाते हैं.
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सदस्यों में दो नेत्रहीन, चार पैर से, एक कान से और दो हाथ से दिव्यांग:
इन सभी दिव्यांगों में दो नेत्रहीन हैं. जबकि चार ऐसे सदस्य हैं जो पैर से दिव्यांग हैं. साथ ही एक सदस्य कान व दो सदस्य हाथ से दिव्यांग हैं. लेकिन इनमें काम करने की क्षमता किसी आम इंसान से कम नहीं है. ये अपने काम में इस तरह से माहिर हो चुके हैं कि नाम-तौल से लेकर सही अनाज लोगों को बड़ी आसानी से दे रहे हैं. काम के वक्त राशन लाभुक भी इन लोगों की हरसंभव मदद के लिए तत्पर भी रहते हैं. ताकि इन्हें कोई अधिक परेशानी ना हो सके.
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पहले परेशानी होती थी पर अब नहीं:
दिव्यांग मनोज व अनिल नायक बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा था. समाज में भी उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता था. लेकिन धीरे-धीरे व्यवस्था दुरुस्त हुई और जैसे उन लोगों ने काम करना शुरू किया लोगों की सहानुभूति भी मिलती गई. मनोज ने बताया कि अभी कुछ दिन पहले ही देवड़ी मंदिर के पास एक दिव्यांग लड़की की सड़क हादसे में मौत हो गई जिसके बाद उन सभी ने उसके परिवार को मदद करने के लिए काम कर रहे हैं.
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