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टंडवा में #CoalProject से लेवी वसूलीः क्या सिर्फ पर कतरने से खत्म हो जायेगा वसूली तंत्र

  • मगध-आम्रपाली, पिपरवार परियोजना से हो रही करोड़ो की वसूली
  • पुलिस, सीसीएल अफसर, नक्सली संगठनों और गैंगस्टरों तक पहुंचता है वसूली का पैसा

Hazaribag:  एशिया के सबसे बड़ी कोल माइनिंग प्रोजेक्ट चतरा जिले के मगध-आम्रपाली-पिपरवार आदि परियोजनाओं से नक्सली-पुलिस, सीसीएल अफसरों, ट्रांसपोर्टरों की मिलीभगत से करोड़ो रुपये की अवैध वसूली के मामले में हाई कोर्ट के निर्देश,  ईडी, एनआइए जैसी एजेंसियों की कार्रवाई और राज्य पुलिस मुख्यालय द्वारा टेरर फंडिंग पर रोक लगाने के लिए बनी कमिटी के बाद भी लेवी वसूली पर लगाम नही लगायी जा सक रही है .

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इसका खुलासा मंगलवार को चतरा पुलिस द्वारा 70 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करने के बाद हुआ. इस कार्रवाई से फिर एक बार पुष्टि हुई कि अब भी उक्त परियोजनाओं से करोड़ो की लेवी वसूली हो रही है. जिसका हिस्सा ऊपर से नीचे तक नक्सली, पुलिस, गैंगस्टर, पत्रकार और राजनेताओं तक पहुंच रहा है.

तने पर वार, जड़ पर कब होगा प्रहार? जिम्मेवार लोगों पर कब तय होगी जवाबदेही?

टीएसपीसी उग्रवादी प्रदीप राम, विनोद गंझू की करोड़ो की चल-अचल संपत्ति ईडी द्वारा जब्त करने के बाद चतरा पुलिस ने जिस सत्तर लोगों पर लेवी वसूलने के आरोप में केस किया है, इससे सवाल उठ रहे हैं कि तने पर वार करने से क्या लेवी की जड़ पर होगा प्रहार? क्या पुरी तरह से लेवी वसूली पर लगेगी लगाम?

क्योंकि लेवी लेनेवालों पर पहले भी कार्रवाई हुई है. संपति पर जब्त हुई थी. फिर करोड़ो की वसूली कैसे होती रही?

स्थानीय प्रशासन की निगरानी कमिटी और टेरर फंडिंग पर रोक लगाने के लिए बनी कमिटी के बाद भी लेवी की वसूली होते रहने से जिम्मेवार अधिकारियों पर भी संदेह की उंगली उठ रही है.

फिर भी मुख्य सवाल जस का तस बना रहेगा कि आखिर कब तक होगा असली जड़ पर प्रहार? या कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई नही चाहता कि बंद हो लेवी की वसूली?

इस तरह के सवाल उठने की जो मुख्य वजह है, वो यह है कि अब तक लेवी लेने वालों पर कार्रवाई हुई. लेकिन देनेवालों कर क्यों नहीं और कार्रवाई कब तक नहीं होगी?

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नये तरीके से ऐसे हो रहा है करोड़ों की लेवी का खेल

सूचना है कि उक्त परियोजनाओं से लेवी वसूली पर हाई कोर्ट के आदेश के बाद हुई कार्रवाई के बाद “दबंग” कमिटी भंग कर सभी लेनदेन ऑनलाइन कर दिया गया. इसके वसूली का सिंडिकेट बिल्कुल नये तरीके से वसूली में लग गया है.

इस बार “दबंग” कमिटी की जगह ट्रांसपोर्ट यूनियन, ट्रांसपोर्ट कंपनियां और लिफ्टर के माध्यम से पैसे की वसूली हो रही है.

मगध-आम्रपाली-पिपरवार परियोजनाओं से निकलने वाले कोयले की राज्य की विभिन्न साइडिंग में ट्रांपोर्टिंग करने के लिए ट्रांपोर्टिंग कंपनियों-यूनियनों द्वारा एक निश्चित दर तय कर दी गयी है. कांटा घरों में ट्रकों-हाइवा वाहनों को चालान दिया जाता है. जिसमें किस साइडिंग में कोयला गिराना है, टोटल वेट, एडवांस रकम लिखी होती है, लेकिन भाड़े की दर नही लिखी होती है. वाहन मालिकों से भाड़े की दर निश्चित तय दर से भी कम दर पर मौखिक तय होती है. (पहले लिखित तय होता था)

कोयला अनलोड होने के बाद वाहन मालिक चालान लेकर ट्रांसपोर्ट कंपनियों के कार्यालयों में चालान जमा करते हैं. वहां भी पेपर के नाम पर 2200 रुपये प्रति चालान एक्स्ट्रा काट कर उनके खाते में पैसा ट्रांसफर कर दिया जाता है.

प्रति महीने करोड़ो रुपये की वसूली

वाहन मालिकों से औसत दर से भी कम दर पर परिवहन भाड़ा देने के बाद प्रत्येक वाहन से प्रति चालान अतिरिक्त 2200 रुपये काट लिये जाते हैं. बाकी रकम खाते में ट्रांसफर कर दी जाती है. इस प्रकार सिर्फ 2200 रुपये की कटौती की गणना की जाये तो औसतन हर रोज मगध-आम्रपाली-पिपरवार परियोजनाओं से डेढ़ हजार वाहन कोयला निकलता है. इस प्रकार प्रतिदिन लगभग छतीस लाख रुपये प्रतिदिन वसूली होती है. इस तरह यह रकम महीने में करीब दस करोड़ होती है. प्रति टन तय दर से कम दर पर, वाहन मालिकों को एक सौ से डेढ़ सौ रुपये प्रति टन कम भुगतान होता है.

कई जगह पहुंचता है वसूली का पैसा

ट्रांसपोर्टरों-लिफ्टरों के माध्यम से कटौती कर इकट्ठा की गयी करोड़ों की रकम स्थानीय पुलिस-अधिकारी, सीसीएल अधिकारी, नक्सली संगठनो, अपराधी गिरोहों, सफेदपोश नेता पत्रकार आदि के पहुंचा दी जाती है.

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