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#ConsumerForum में डेढ़ सालों से पसरा है सन्नाटा, रांची के उपभोक्ताओं पर बढ़ रहा ठगों का शिकंजा

Ranchi: हर नागरिक अपने आप में एक उपभोक्ता है. उसके हितों की रक्षा के लिए उपभोक्ता संरक्षण कानून है. पर रांची जिले में यह अधिनियम मजाक बन कर रह गया है.

दुकानदारों, विक्रेताओं द्वारा ठगी किये जाने के मामले में उपभोक्ताओं की आवाज सुननेवाला रांची उपभोक्ता फोरम अपने लिए ही अधिकार मांगता फिर रहा है.

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फोरम को मजबूत करने को लोग न्यायालय की शरण में पहुंच चुके हैं. ऐसे में रांची के उपभोक्ताओं के लिए प्रदत्त अधिकारों का हनन निरंतर हो रहा है.

स्थिति यह है कि इस साल जनवरी से लेकर अब तक एक भी केस फोरम में दर्ज नहीं हुआ है.

उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए है उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम

दुकानदारों, कंपनियों, उद्योगपतियों एवं अन्य व्यवसायियों द्वारा लगातार उपभोक्ताओं का शोषण किये जाने को लेकर उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण हेतु सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 संसद से पास करा कर लागू किया था.

इस अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को अधिकार दिया गया कि उनके द्वारा खरीदे गये सामान की रसीद देना किसी भी तरह के व्यवसायियों के लिए जरूरी होगा. वहीं यदि कोई व्यवसायी निर्धारित मूल्य से अधिक दाम लेता है, तो उसके विरुद्ध उपभोक्ता कानूनी कार्रवाई कर सकता है.

वहीं सेवा में त्रुटि होने पर भी उपभोक्ता को इस अधिनियम के द्वारा अधिकार दिया गया है कि वह इसके विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई कर सकता है. यदि दुकानदार द्वारा नकली सामान दिया जाता है, तो वह भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में आयेगा.

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उपभोक्ता फोरम में 20 लाख रुपये तक का दर्ज होता है मामला

जिले में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत जिला उपभोक्ता फोरम का गठन किया गया है जो उपभोक्ताओं के प्रति हुए अन्याय की शिकायतों की सुनवाई करता है.

जिला उपभोक्ता फोरम में  20 लाख तक का मामला दायर होता है. वहीं राज्य स्तर पर राज्य उपभोक्ता आयोग गठित है जहां 20 लाख से एक करोड़ तक की राशि का मामले की सुनवाई की जाती है.

राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का गठन किया गया है. जहां एक करोड़ से अधिक का मामला दायर किया जाता है.

रांची के उपभोक्ता फोरम का रास्ता  लोग गये भूल

रांची जिला क्षेत्र में रहने वाले सभी जन उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए बने उपभोक्ता फोरम से डेढ़ साल से निराश हैं. जुलाई 2018 में फोरम के प्रमुख अजीत कुमार वर्मा सेवानिवृत्त हो गये.

दो सदस्यों में से एक संध्या सेन गुप्ता उनसे 6 माह पूर्व ही रिटायर्ड हो चुकी थीं. एक सदस्य जयप्रकाश अग्रवाल को सितम्बर, 2019 में दूसरे जिले के फोरम में स्थानांतरित कर दिया गया.

नतीजा यह कि पूर्व में जहाँ साल भर में 250 से अधिक मामले फोरम में आते थे, 2018-20 आते आते आंकड़ा 100 से भी कम हो गया. बड़ी संख्या में मामले लंबित पड़े रह गये. ऐसे में लोगों के आस की डोर कमजोर पड़ती चली गयी है.

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6 वर्षों में 1000 से भी अधिक मामले फोरम में पहुंचे

पिछले पांच बरस के आंकड़े को ही देखें. वर्ष 2014 से 2019 के मध्य 1000 से अधिक मामले रांची उपभोक्ता फोरम में दर्ज किये गये थे. 2014  में 208 मामले यहां आये जिनमें से 152 को निष्पादित किया गया और 56 लंबित रह गये.

इसी तरह 2015 में 255 मामलों में से 149 का समाधान हुआ. 106 पर फैसला नहीं हो सका था. 2016 में 204 मामलों की तुलना में 93 पर फैसला आया, शेष पेंडिंग में रहे.

2017 में 153 केस आये. 63 को छोड़ 141 पर फैसला नहीं लिया जा सका. 2018 में कुल 154 दर्ज मामलों में से 141 पर कोई फैसला नहीं हो सका. इस साल मात्र 12 केस में ही निर्णय आया.

2019 में दिसंबर तक कुल 98 मामले रजिस्टर में दर्ज हुए. प्रेसिडेंट और सदस्यों के अभाव में एक पर भी सुनवाई तक संभव नहीं हुई.

इस साल जनवरी से लेकर फ़रवरी के तीसरे सप्ताह तक एक भी मामला दर्ज कराने कोई भी नहीं पहुंच सका है. जाहिर है, रांची के उपभोक्ता के अधिकारों को बचाने में ना तो कोई कानून अमल में दिख रहा है.

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Nayika

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