न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

क्या आपके अखबारों ने 1.70 लाख करोड़ के आंकड़ों के अंतर की खबर बतायी, नहीं तो यहां पढ़ें

2,853

Fisal Anurag

तथ्यों को छुपाने के खेल में मीडिया जिस तरह संलग्न  है, वह हालात की गंभीरता को ही रेखांकित करता है. ताजा मामला है, मीडिया ने आर्थिक सर्वे और बजट के अंतर के आंकड़े को जिस तरह नजरअंदाज किया है, वह बेहद गंभीर मामला है. अंग्रेजी के अखबार हों या हिंदी शायद ही किसी के लिए यह एक बड़ी खबर बनी हो. रांची आने वाले किसी भी अखबार में यह खबर नहीं दिखी. यहां तक कि रांची से प्रकाशित दैनिकों और चैनलों में भी.

खबर यह है कि प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहाकर परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने आंकड़ों का अध्ययन कर यह बताया है कि आर्थिक सर्वे और बजट के आंकड़ों में भारी अंतर है. यह कोई मामूली खबर नहीं है. लेकिन मीडिया ने इसे नजरअंदाज कर दिया. जबकि मंगलवार को ही अखबार इकोनॉमिक्स टाइम्स, राजस्थान पत्रिका और एनडीटीवी ने इसपर चर्चा की. न्यूजविंग सहित एकाध अन्य पोर्टल ने भी इसे प्रमुखता दी. इससे जुड़ी खबरें जो अन्य पोर्टलों पर प्रकाशित हुई हैं. हम उनका लिंक इस टिप्पणी के नीचे लगा रहे हैं.  

इसे भी पढ़ें – मोदी सरकार की किरकिरी : आर्थिक सर्वे 2019 और बजट 2019-20 में आमदनी के आंकड़े में 1.7 लाख करोड़ का अंतर

लेकिन इस मामले में मीडिया में अपवाद हैं. राय ने बताया है कि सरकार की कमाई को लेकर बजट और आर्थिक सर्वे के आंकड़ों में एक प्रतिशत का अंतर है. बजट से 1.70 लाख करोड़ का हिसाब ही गायब है. यह खबर बेहद गंभीर है. यह मानना कठिन है कि यह खबर किसी भी मीडिया संस्थान की जानकारी में न रहा हो. लेकिन मीडिया ने इसे छापने और दिखाने में दिलचस्पी नहीं दिखायी है, तो यह बीमारी की गंभीरता ही बताता है.

भारत की मीडिया की स्वतंत्र भूमिका पहले से ही संदेह के घेरे में है. मीडिया स्वतंत्रता के वैश्विक आंकड़ों में भारत के लगातार पिछड़ते जाने के कारण भी यही हैं. दरअसल मीडिया का यह घुठनाटेकू रवैया बताता है कि वह न केवल भारत की आर्थिक हालात की वास्तविकताओं से नजर चुरा रहा है, बल्कि वह मीडिया के बुनियादी दायित्व से भी खुद को अलग कर रहा है.

भारत को अमेरिकी मीडिया से सीखना चाहिए, जैसे ट्रंप की नीतियों के खिलाफ वहां का मीडिया खुलकर लिखता है और ट्रंप के विरोध के बावजूद अपनी भूमिका और दायित्व का निर्वाह करता है. इमरजेंसी के समय जबकि सेंसरशिप लागू था, मीडिया विरोधी के रचनात्मकता का परिचय देता था, लेकिन इस समय तो खुलेतौर पर सेंसरशिप लागू भी नहीं है.

Related Posts

हेमंत ने सीएम को भेजा लीगल नोटिस, कहा – “सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे सीएम“

सीएम ने जेएमएम कार्यकारी अध्यक्ष पर लगाया था 500 करोड़ की जमीन खरीदने का आरोप

बावजूद मीडिया में सरकार का प्रचार प्रमुख हथियार बन गया है और सरकार की नीतियों पर वह किसी भी तरह का विमर्श खड़ा नहीं कर पा रहा है. हो सकता है कि तत्काल उसके प्रसार में इस कारण दिक्कत नहीं आ रही हो, लेकिन उसकी साख बेहद नीचे है. भारत की मीडिया के बारे में माना जाता रहा है कि उसने अपनी स्वतंत्रता की हिफाजत करना सीख लिया है. लेकिन यह धारणा टूट सी गयी है.

इसे भी पढ़ें –LED बल्ब बेचने वाली EESL कंपनी अब 36 हजार की AC 41 हजार में बेचेगी

राजस्थान पत्रिका की खबर का लिंक – बजट में 1.7 लाख करोड़ रुपये का ‘गड़बड़झाला’, आखिर क्या छिपाना चाहती हैं वित्त मंत्री

एनडीटीवी की खबर का लिंक – आर्थिक सर्वे और बजट के आंकड़ों में अंतर कैसे?

इकोनॉमिक्स टाइम्स की खबर का लिंक – Budget, Economic survey show divergent numbers 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
क्या आपको लगता है कि हम स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे हैं. अगर हां, तो इसे बचाने के लिए हमें आर्थिक मदद करें. आप हर दिन 10 रूपये से लेकर अधिकतम मासिक 5000 रूपये तक की मदद कर सकते है.
मदद करने के लिए यहां क्लिक करें. –
%d bloggers like this: