
Fisal Anurag
हाशिए पर धकेल दिये गये भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी ने अपनी लंबी चुप्पी तोड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व के लिए परेशानी खड़ी करने वाली बात कही है. डा. जोशी ने कहा है देश को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो प्रधानमंत्री के साथ सिद्धांतों के आधार पर तीखी बहस कर सके और प्रधानमंत्री की खुशी और नाराजगी की चिंता किये बगैर निडर होकर अपने विचारों को व्यक्त कर सके.
अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि विचारों पर अंत समय तक जमे रहकर बहस करना जरूरी है. उन्होंने कहा कि सदस्य चाहे फोरम के हों, भारतीय जनता पार्टी के हों सबको मुद्दों से समझौता नहीं करने के रूख पर दृढ़ता से चलना चाहिए.
डा. जोशी कांग्रेस के नेता और पूर्व सांसद और मंत्री रह चुके दिवगंत एस जयपाल रेड्डी की समृति में यह सब कह रहे थे. उन्होंने दिवगंत रेड्डी के साहस का उल्लेख करते हुए सच और विचारों के प्रति उनकी दृढ़ता का हवाला भी दिया है. हालांकि आमतौर पर इस तरह के कार्यक्रम में कही गयी बातों का कोई राजनीतिक निहितार्थ तो नहीं माना जाता है, बल्कि दिवगंत के प्रति उसे गहरे सम्मान के रूप में ही देखा जाता है.
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लेकिन डा. जोशी का कथन सामान्य नहीं माना जा रहा है. आज के राजनीतिक माहौल में इस तरह की बात कोई भाजपा का वफादार नेता कह रहा है तो उसे कोई सामान्य तरीके से ग्रहण करना भी आसान नहीं है. राजनीतिक माहौल में जिस तरह की खामोशी ओर बेचैनी है, उसमें यह कथन बेहद अलग है.
लोकतंत्र में असमत विचारों की अहमियत है. लोकतंत्र उसके बिना निष्प्रभावी होता है. भारत में यह एक नई परिकल्पना देखी गयी है कि सरकार या प्रधानमंत्री की साधारण आलोचना करने वालों को भी न केवल ट्रोल का शिकार बनाया जाता है, बल्कि उसे देशद्रोही कहने वालों की होड़ दिखने लगती है.
इस तथ्य को नजरअंदाज करना संभव भी नहीं है कि भारत का लोकतंत्र जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसमें सबसे प्रमुख सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति असहमत होना भी है. लोकतंत्र को लेकर जिस तरह की सजगता आम नागरिकों में होनी चाहिए, उसका अभाव भी दिखता है.
एक मजबूत नेतृत्व के नाम पर भारत में तमाम किस्म के फेडरल स्ट्रक्चर को कमजोर किये जाने के प्रति किसी तरह की आम नाराजगी का प्रकट नहीं होना भी बताता है कि देश में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो रही हैं. लोकतंत्र केवल चुनाव प्रक्रिया नहीं है बल्कि वह उन आमजनों के अधिकारों और भागीदारी भी है. इसमें हर तरह के विचारों को पल्लवित होने की गारंटी जरूरी है.
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डा. जोशी ने जो कुछ भी कहा है, उससे इतना तो जाहिर हो ही रहा है कि राजनीतिक निडरता की जरूरत है. इसका यह भी अर्थ है कि सरकार की नीतियों पर खुली बहस और उसके प्रति असहति के व्यक्त किये जाने के अधिकार की हिफाजत होना ही चाहिए.
यह धारणा पुष्ट हुई है कि भारतीय जनता पार्टी पर एक समूह विशेष का नियंत्रण मजबूत हुआ है और वह विपक्ष को लगातार कमजोर करने का साजिश को अंजाम दे रहा है. भारत के विपक्षी दलों के अस्तित्व ही खत्म किये जाने की प्रक्रिया देखी जा रही है. विपक्ष की कर्नाटक की सरकार जिस तरह गिरायी गयी, वो इसका बड़ा सबूत है.
विधायकों सांसदों की खरीद-फरोख्त को तो एक प्रवृति-सा बना दिया गया है. राज्यसभा से जिस तरह विपक्ष के बहुमत को कम करने के लिए विभिन्न पार्टी के सदस्यों का इस्तीफा दिलाया गया और उन्हें भाजपा ने टिकट देकर फिर राज्यसभा भेजने का सिलसिला शुरू किया.
वह बेहद संगीन मामला है. किसी भी लोकतंत्र के लिए यह एक अमान्य बात होनी चाहिए. चुनावों के पहले तो पार्टी के भीतर से तोड़ने और उसके मजबूत व आधार वाले नेताओं का अभियान भी जिस तरह अंजाम दिया गया है, वह भी एक अमान्य लोकतांत्रिक प्रवृति मानी जाएगी.
झाखंड में विधानसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही विपक्षी दलों के बीच अपने आधार नेताओं को दलबदल से रोकने की चुनौती है. देशभर में सत्तापक्ष के दल को विपक्ष को डिमोनाइज करने के अभियान के बजाय उस लोकतांत्रिक माहौल को याद करना चाहिए.
जिसमें विपक्ष का स्वर लोकतंत्र का प्राणवायु जैसा है. डा. जोशी ने जिन खतरों की ओर इशारा करते हुए निडरता के साथ बात कहने के लिए प्रेरणा दी है, उसे भाजपा के नेताओं को अपने दायित्व को याद रखते हुए ज्यादा गहराई से अमल में लाने की कोशिश करने की जरूरत है. झारखंड जैसे राज्या में तो मुख्यमंत्रियों के सामने भी सच कहने का साहस अगर नहीं दिख रहा है तो बीमारी की गंभीरता को समझना होगा.
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