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झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने कहा- विरोधी कुछ भी कह लें, मैं राजनीति के मैदान में डेड पॉलिटिशियन नहीं हूं (देखें इंटरव्यू))

  • बीजेपी ने दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा कर ठगने का काम किया

Ranchi: हमेशा संयमित रहने वाले बाबूलाल मरांडी ने आज विरोधियों पर कटाक्ष किया. उन्होंने राजनीति में डेड पॉलिटिशियन कहने वालों को दो टुक जवाब भी दिया. कहा कि विरोधी कुछ भी कह लें, मैं राजनीति के मैदान में डेड पॉलिटिशियन नहीं हूं. चुनाव में हार-जीत होती ही रहती है. इससे राजनेताओं को घबराना नहीं चाहिये. बीजेपी के बड़े नेता भी चुनाव हारते हैं. न्यूज विंग वरीय संवाददाता प्रवीण कुमार और कुमार गौरव ने बाबूलाल मरांडी से लंबी बातचीत की. पेश है बातचीत के प्रमुख अंश-

 

महागठबंधन का चुनावी मुद्दा सिर्फ भाजपा को आउट करना है या कुछ अपने भी चुनावी मुद्दे होंगे?

ऐसा नहीं है. महागठबंध का अपना चुनावी मुद्दा होगा. केंद्र और राज्य सरकार ने जो वादा किया था उसे पूरा करने में दोनों सरकारें नाकाम रहीं. जनता झूठे आश्वासनों से ऊब चुकी है. बीजेपी ने दो करोड़ नौजवानों को रोजगार देने का भूठा वादा किया. विदेशी बैंकों से काला धन भी वापस नहीं आया. सरकार की इन नाकामियों को जनता के समक्ष रखा जायेगा. साथ ही महागठबंधन शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, गरीबी निवारण कार्यक्रम को मजबूती से लागू कराने जैसे मुद्दों के साथ चुनावी आखाड़े में उतरेगा.

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 विरोधी दल आपको राजनीति में डेड पॉलिटिशियन की संज्ञा दे रहे हैं?

देखिये, चुनाव में हार-जीत होती ही रहती है. बीजेपी के बड़े नेता भी चुनाव हारते रहते हैं. तो क्या वे डेड पॉलिटिशियन हैं. हार से मैं घबराता नहीं हूं. चुनाव का परिणाम ही साबित कर देगा कि कौन डेड पॉलिटिशियन है. राज्य में महागठबंधन को भी लेकर कई तरह के कयास लगाये जा रहे थे. लेकिन अब हकीकत सामने है.  महागठबंधन अपना स्वरूप धारण कर चुका है.

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महागठबंधन में शामिल दल सोशल मीडिया में मोदी विरोधी बातों को लिख रहे हैं, क्या दूसरे और एजेंडे नहीं हैं?

एक बात मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि देश में पिछले पांच साल में मोदी सरकार ने सामाजिक  भाईचारा और बंधुत्व को तार-तार करने का काम किया है. 2014 में देश की जनता के समक्ष जो वायदे किये गये, वो पूरे नहीं हुए. उल्टे जाति-धर्म के नाम पर एक समुदाय को दूसरे समुदाय से लड़ाने का काम किया गया. धर्म, मंदिर, मस्जिद के नाम पर पर तनाव का वातावरण उत्पन्न कराया गया. मॉब लिंचिंग में कई लोगों की जानें गयीं. झारखंड भी इससे अछूता नहीं रहा.

आपको लगता है कि भाजपा के शासन काल में संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं?

जवाब: आप खुद ही देखिये न. इसके कई उदाहरण सामने आये. भाजपा के शासनकाल में निश्चित रूप से संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश की गयी. चाहे चुनाव आयोग हो, सीबीआई हो या सीबीसी. प्रत्येक के अधिकार क्षेत्र में अडंगा लगाने की कोशिश की गयी. यहां तक कि बीजेपी वालों ने अदालत पर भी सवाल खड़े किये. इन कारणों से बीजेपी को हटाना जरूरी है. अगर बीजेपी की सरकार रहेगी, तो लोकतंत्र और कमजोर होता चला जायेगा. अब संविधान को बचाना है. समाज में सांप्रदायिक सद्भाव को बनाये रखना है.

क्या वजह है कि आप दुमका छोड़कर कोडरमा से चुनाव लड़ रहे हैं?

जब महागठबंधन आकार ले रहा था तब ही यह बात सामने आयी थी कि दुमका से झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन चुनाव लड़ते रहे हैं. तो ऐसी स्थिति में महागठबंधन के दूसरे नेता उनके समक्ष नहीं आयेंगे. पूरे झारखंड में जयपाल सिंह के बाद अगर कोई बड़ा नेता हुआ है, तो वह शिबू सोरेन हैं. ऐसे यह उचित नहीं होता कि मैं दुमका से चुनाव लड़ूं. इस वजह से मैंने कोडरमा से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है.

क्या कोडरमा में अन्नपूर्णा देवी आपके सामने बड़ी चुनौती पेश करेंगी?

(हंसते हुए) चुनाव खुद में एक चुनौती है. हम किसी व्यक्ति के विरोध में चुनाव नहीं लड़ते हैं. और न ही किसी तरह कटाक्ष करते हैं. हम मुद्दों पर चुनाव लड़ते हैं. मेरे विरोधी कौन हैं, यह फैक्टर नहीं. हम अपने मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं. राष्ट्रीय मुद्दे के साथ कोडरमा का मुख्य मुद्दा अबरख खादानों पर आश्रित लोगों की आजीविका है. अबरख खदानों और वन क्षेत्र में रहने के कारण स्थानीय लोगों को काफी कठिनाई हो रही है. पत्थर खदानों की लीज को राज्य सरकार के द्वारा धीरे-धीरे रद्द कर दिया जा रहा है. यह एक बड़ा मामला है. राज्य सरकार पत्थर खदानों की नीलामी पर आमादा है. जिससे स्थानीय लोगों को लीज नहीं मिल सकेगी. इसके अलावा इलाके में सिंचाई सुविधा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी समस्यायों के मद्दों के साथ मैदान में जायेंगे.

डॉक्टर अजय पर आरोप लग रहा है कि जेवीएम को प्रमोट करने के लिए गोड्डा सीट दी गयी है?

ऐसा नहीं है, जहां कहीं भी गठबंधन किया जाता है सभी पार्टियों को कुछ न कुछ त्याग करना पड़ता है. जहां तक फुरकान अंसारी का सवाल है उनका नाराज होना स्वाभाविक है. वह पिछली बार दूसरे स्थान पर रहे थे. उनकी स्वभाविक इच्छा थी कि वह चुनाव लड़े. लेकिन चुनाव में जीत की संभावना पर विचार-विमर्श करने के बाद ही प्रदीप यादव को गोड्डा लोकसभा से चुनाव लड़ाया जा रहा है.

महागठबंधन ने अल्पसंख्यकों के साथ न्याय नहीं किया है, एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं दिया?

जवाब: चुनाव के समय गठबंधन एक रणनीति के तहत की जाती है. अल्पसंख्यकों पर महागठबंधन ने विशेष ध्यान रखा है. सीटों की घोषणा के समय महागठबंधन में शामिल नेता ने संयुक्त घोषणा की थी कि 2020 के राज्यसभा चुनाव में मुस्लिम अल्पसंख्यक को महागठबंधन का उम्मीदवार बनाया जायेगा. यह बात कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में तय हुई है.

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