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बाबूलाल मरांडी का दावाः रांची में 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक की जमीन की हुई महालूट

Ranchi: पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी के मुताबिक रांची में 10 हजार करोड़ से भी अधिक के जमीन लूट का खेला हुआ है. सोशल मीडिया के जरिये उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को जमीन महाघोटाले की गहराई से जांच करने को कहा है. उनके मुताबिक इस सरकार में रांची में जबर्दस्त तरीके से जमीन लूट का कारोबार हुआ है. इडी निदेशक को ज़मीन महाघोटाले में कई अहम बिंदुओं पर जवाबदेह लोगों से विस्तार से पूछताछ करनी चाहिये. पर्दे के पीछे रिमोट कंट्रोल से इस धंधे में शामिल चेहरों को भी बेनक़ाब करना होगा. उनकी गर्दन पकड़नी होगी जिनके चलते आज झारखंड की देश-दुनिया में बदनामी हो रही है. दावा करते कहा कि अगर राँची ज़मीन गोरखधंधे के षड्यंत्र की गहराई से जाँच होगी तो साहिबगंज का चर्चित 1000 करोड़ का पत्थर खान लूट घोटाला इसके सामने बौना दिखने लगेगा. रांची जमीन घोटाले में 10,000 करोड़ से भी ज़्यादा का घोटाला हुआ है.

सत्ता के संरक्षण में गड़बड़ी

बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि हेमंत राज में राँची में हुए ज़मीन महाघोटाले के बारे में कई लोगों से उन्होंने बातचीत की. इस गोरखधंधे के बारे में विस्तार से समझने का प्रयास किया है. सत्ता के संरक्षण में दलालों, कुछ धन लोभी प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों ने मिलकर भ्रष्टाचार का ऐसा काम किया है, जिसकी गूंज लम्बे समय तक सुनायी देगी. इसकी जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे कई बड़े सरकारी-ग़ैर सरकारी लुटेरे लाईन लगाकर जेल जाते देखे जायेंगे. लोग बताते हैं कि हेमंत सरकार बनने के चंद महीने बाद ही कोविड लॉकडाउन लग गया. सरकारी-ग़ैर सरकारी कामकाज, रोज़गार ठप पड़ गये. बेईमानों ने इस अवधि में इजी मनी मेकिंग का सबसे आसान रास्ता ज़मीन की हेराफेरी को बनाया. राँची में इस गोरखधंधे को अच्छे से चलाने के लिये “सर्टिफ़ाइड भ्रष्ट” अफ़सर की प्रेम से खोज हुई.

कोडरमा में सरकारी पेड़ तक कटवा कर बेच खाने के मामले में हाईकोर्ट से ज़मानत प्राप्त चार्जशीटेड आईएएस छवि रंजन को इस “काम” के लिये सही आदमी समझ कर लाया गया. “तुम मन माफ़िक़ धंधा चलाओ-बदले में गाछ काटने के केस से बचाने में मदद लो”, इस तर्ज़ पर ज़मीन लूट योजना का नियंत्रण ओर डायरेक्शन सत्ता के मशहूर उस दलाल ने संभाला, जो अभी जेल में बंद है. पहला शिकार मेडिका अस्पताल के बग़ल वाली ज़मीन को बनाया गया. भारी संख्या में पुलिस के बल पर ज़मीन क़ब्ज़ा करवाया गया. बाबूलाल के अनुसार उन्हें यह भी बताया जा रहा है कि इस गोरखधंधे को अंजाम देने के लिये दो सीनियर अफ़सरों ने तो उस दिन छुट्टी लेकर ज़मीन क़ब्ज़ाने का नियंत्रण किया ताकि हंगामा हो. लोग पूछताछ करें तो बता सकें कि वे तो छुट्टी पर हैं, कुछ पता ही नहीं है.
रात के अंधेरे में काला कालोबार
ज़मीन क़ब्ज़ाने की योजना की सफलता से बेईमानों का मनोबल बढ़ा. यह इतना बढ़ गया कि इन लोगों ने कागजातों में हेराफेरी कर ज़मीन क़ब्ज़ाने के धंधे को मोटी कमाई का ज़रिया ही बना लिया. कोविड जैसे संकट के बाद भी नियम के विपरित इस गिरोह ने रात में पुलिस लाईन से बसों में ठूँस कर ले जाये गये फ़ोर्स के साथ ज़मीन क़ब्ज़ाने में आतंक का राज क़ायम कर दिया. बजरा की ज़मीन भी इनके निशाने पर रही. 75 सालों की लगान रसीद एक दिन में काटकर भारी संख्या में पुलिस के दम पर दिन-रात ज़मीन क़ब्ज़ा कराने का ऐसा काम हुआ जिसकी दूसरी मिसाल नहीं मिल सकती. हाईकोर्ट ने ज़िला प्रशासन के अंधा क़ानून की इस कार्रवाई को अभी रद्द कर दिया है. ज़मीन के विवाद में जांच या क़ब्ज़ा के लिये रात में पुलिस को भेजने का नियम नहीं है. लेकिन कई ऐसे वीडियो हमें देखने को मिले हैं जिसमें रात में पुलिस लाइन से बसों में भरकर पंहुचे फ़ोर्स और अफ़सर आतंक क़ायम करने के लिये गेट तोडकर कई जगहों पर घुसने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं. सुना है कि “ज़मीन लूटो” गोरखधंधा रात में इसलिये किया जाता था कि पब्लिक की भीड़ और हंगामा न हो. कम से कम पत्रकार मौक़े पर पंहुचें. पीड़ित पक्ष अगर फ़रियाद लेकर किसी जनप्रतिनिधि के माध्यम से सीनियर अफ़सरों से सम्पर्क करना चाहें तो, रात का बहाना बना कर कोई अफ़सर मिले ही नहीं. दिन के उजाले से पहले गोरखधंधा हो जाय. सीएम हेमंत सोरेन से सवाल करते बाबूलाल ने कहा है कि उन्हें बताना चाहिए कि ये सब काम किसके आदेश पर किसके शह पर होता था? क्या ये संभव है कि बिना मुख्यमंत्री की जानकारी के राज्य की राजधानी में इतना बड़ा गोरखधंधा हो जाय? ये कैसे संभव है कि कोई अफ़सर ऐसे धंधों को अंजाम देने के लिये किसी दलाल से सीधे डायरेक्शन ले और अपने किये की रिपोर्ट दलाल को ही करें?

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