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ऑक्सफोर्ड में सर आर्थर एडिंगटन ने जिनके शोध की उड़ायी थी खिल्ली, उसी भारतीय ने जीता  नोबेल प्राइज

डॉ॰ सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi :  डॉ॰ सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर आधुनिक भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा के सबसे दिप्तिमान सितारों में से एक हैं. उनका जन्म 19 अक्टूबर 1910 को लाहौर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा मद्रास में हुई. 18 वर्ष की अल्पायु में चंद्रशेखर का पहला शोध पत्र `इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स’ में प्रकाशित हुआ. मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक की उपाधि लेने तक उनके कई शोध पत्र प्रकाशित हो चुके थे.

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तारे के गिरने और लुप्त होने की बारे में दी जानकारी

24 वर्ष की अल्पायु में सन् 1934 में ही उन्होंने तारे के गिरने और लुप्त होने की अपनी वैज्ञानिक जिज्ञासा सुलझा ली थी. कुछ ही समय बाद यानी 11 जनवरी 1935 को लंदन की रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की बैठक में उन्होंने मौलिक शोध पत्र भी प्रस्तुत कर दिया था कि सफेद बौने तारे यानी व्हाइट ड्वार्फ तारे एक निश्चित द्रव्यमान यानी डेफिनेट मास प्राप्त करने के बाद अपने भार में और वृद्धि नहीं कर सकते. अंतत वे ब्लैक होल बन जाते हैं.

उन्होंने बताया कि जिन तारों का द्रव्यमान आज सूर्य से 1.4 गुना होगा, वे अंतत सिकुड़ कर बहुत भारी हो जाएंगे. ऑक्सफोर्ड में उनके गुरु सर आर्थर एडिंगटन ने उनके इस शोध को प्रथम दृष्टि में स्वीकार नहीं किया और उनकी खिल्ली उड़ाई. पर वे हार मानने वाले नहीं थे. वे पुन शोध साधना में जुट गए.

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1953 में अमेरिका की नागरिकता ली

चन्द्रशेखर ने मुख्यतः विदेश में और वहीं काम किया. 1953 में वह अमेरिकी नागरिक बन गये. इसके बाद भी उन्हें भारत की बेहतरी की गहरी चिन्ता थी. भारत में बहुत से विज्ञान संस्थानों और जवान वैज्ञानिकों के साथ उनका गहरा संबंध था. अपने बचपन में उन्हें रामानुजम के विज्ञान के प्रति सम्पूर्ण समपर्ण के उदाहरण से प्रेरणा मिली थी.

1940 के उत्तरार्ध में मद्रास में ‘रामानुजम इंस्टीच्यूट ऑफ मैथिमैटिक्स’ स्थापित करने में सहायक की भूमिका अदा की और जब इंस्टीच्यूट को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा तो उन्होंने इस मामले को नेहरू जी के सामने रखा.

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चन्द्रशेखर लिमिट” सिद्धांत

खगोलिकी के क्षेत्र में उनकी सबसे बड़ी सफलता उनके द्वारा प्रतिपादित “चन्द्रशेखर लिमिट” नामक सिद्धांत से हुई. इसके द्वारा उन्होंने ‘श्वेत ड्वार्फ’ तारों के समूह की अधिकतम आयु सीमा के निर्धारण की विवेचना का मार्ग प्रशस्त किया. सुब्रमन्यन चन्द्रशेखर ने खगोलिकी के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य किये.

इस विश्वविख्यात खगोल वैज्ञानिक ने खगोल भौतिकी के अतिरिक्त खगोलिकीय गणित के क्षेत्र में भी उच्च स्तरीय शोध और कार्य किये. “तारों के ठण्डा होकर सिकुड़ने के साथ केन्द्र में घनीभूत होने की प्रक्रिया” पर किये गये उनके अध्ययन संबंधी शोध कार्य के लिए 1983 में उन्हें भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया. चन्द्रशेखर सीमा के प्रतिपादन के फलस्वरूप न्यूट्रोन तारों और ‘ब्लैक होल्स’ का पता चला.

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तारों के संरचना और विकास से सम्बंधित शोध के लिए भौतिकी का नोबेल

चंद्रशेखर लिमिट की खोज के अलावा सुब्रमन्यन चंद्रशेखर द्वारा किये गए प्रमुख कार्यों में शामिल है: थ्योरी ऑफ़ ब्राउनियन मोशन (1938-1943); थ्योरी ऑफ़ द इल्लुमिनेसन एंड द पोलारिजेसन ऑफ़ द सनलिट स्काई (1943-1950); सापेक्षता और आपेक्षिकीय खगोल भौतिकी (1962-1971) के सामान्य सिद्धांत और ब्लैक होल के गणितीय सिद्धांत (1974-1983). प्रोफेसर एस चंद्रशेखर को वर्ष 1982 में तारों के संरचना और विकास से सम्बंधित उनके शोध और कार्यों के लिए भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

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एडम्स पुरस्कार’ से सम्मानित

चंद्रशेखर ने प्लाज्मा भौतिक पर भी महत्वपूर्ण अनुसंधान किया था. उनके इस अनुसंधान को अमेरिका की क्लेरेंडन प्रेस ने प्रकाशित किया है. उस पुस्तक का नाम ‘हाइड्रो डायनामिक एन्ड हाइड्रो मैग्नेटिक स्टैबिलीटी’ है. सन 1968 में येल विश्वविद्यालय प्रेस व्दारा प्रकाशित की गई थी. उस पुस्तक का नाम ‘एलिप्साइडल फिगर्स ऑफ इक्विलिब्रियम’ है. इसमें न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिध्दांत और मशीन संबंधी सिध्दांतों पर चंद्रशेखर व्दारा किए गए अनुसंधानों का विवरण दिया गया है.

सन 1987 में चंद्रशेखर की एक और पुस्तक ‘ट्रुथ एन्ड ब्यूटी’ ओक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस से प्रकाशित हुई थी. इसमें न्यूटन, शेक्सपियर और विथोवन पर दिए गए चंद्रशेखर के भाषणों तथा कई महत्वपूर्ण निबंधों की रचना की गई है.

गणित में महत्वपूर्ण खोज के लिए उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने ‘एडम्स पुरस्कार’ से सम्मानित किया था. वे भारत सरकार के ‘पदम् विभूषण’ पुरस्कार से भी नवाजे गए थे. इतना ही नहीं, भारतीय विज्ञान अकादमी ने सन 1961 में ‘रामानुजन पदक’ से उन्हें सम्मानित किया था. चंद्रशेखर अपने सिध्दांत ‘चंद्रशेखर लिमिट’ के जरिए पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गए थे. उन्हें उस खोज के लिए सन 1982 में ‘नोबेल पुरस्कार’ प्रदान करने की घोषणा की गई. 10 दिसंबर, सन 1982 को उन्होंने यह पुरस्कार प्राप्त किया था. वे भारत के पांचवे नोबेल पुरस्कार विजेता हैं.

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विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए संदेश

जो विज्ञान की खोज में लगे हैं या ऐसा करने की योजना बना रहे हैं उनके लिए चन्द्रशेखर कहते थे कि “ विज्ञान की खोज की तुलना कई बार पर्वतों ऊँचे लेकिन ज्यादा ऊँचें नहीं, के आरोहण के साथ की गई है. लेकिन हममें से कौन आशा, या कल्पना ही, कर सकता है कि असीम तक फैली एवरेस्ट पर चढ़ाई करे और उसके शीर्ष पर पहुंचे जब कि आकाश नीला हो और हवा रूकी हुई हो और हवा की स्तब्धता में बर्फ के सफे़द चमकीलेपन में समस्त हिमालय घाटी का सर्वेक्षण करे. हम में से कोई अपने इर्द गिर्द विश्व और प्रकृति के तुलनात्मक दृष्टि के लिए आशा नहीं कर सकता. लेकिन नीचे घाटी में खड़े होना और कंचनजंगा के ऊपर सूर्योदय होने की प्रतीक्षा करने में कुछ भी बुराई या हीनता नहीं है”.

चन्द्रशेखर का निधन 21 अगस्त, 1995 को हुआ.

पुरस्कार व सम्मान

    1. 1944 रॉयल सोसाइटी के फेलो बने.
    2. 1949 हेनरी नोर्रिस रुस्सेल लेक्चररशिप.
    3. 1952 ब्रूस पदक.
    4. 1953 रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी के स्वर्ण पदक से सम्मानित.
    5. 1957 अमेरिकन अकादमी ऑफ़ आर्ट्स एंड साइंसेज के रमफोर्ड पुरस्कार से सम्मानित.
    6. 1966 राष्ट्रीय विज्ञान पदक , संयुक्त राज्य अमेरिका.
    7. 1968 भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित.
    8. 1971 नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा हेनरी ड्रेपर मेडल.
    9. 1983 भौतिक विज्ञान में नोबेल पुरस्कार

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